महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1103, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमम व्यायच्छमानस्य द्रोणस्य च महात्मनः ॥ ५ ॥ अल्पावशेषं सैन्यं मे कृतं शक्रात्मजेन ह । 'मेरे और महात्मा द्रोणके परिश्रमपूर्वक युद्ध करते रहनेपर भी इन्द्रपुत्र अर्जुनने मेरी सेनाको अल्प-मात्रामें ही जीवित छोड़ा है (अधिकांश सेनाको तो मार ही डाला है) ।। ५१/२ ।।
कथं नियच्छमानस्य द्रोणस्य युधि फाल्गुनः ॥ ६ ॥ भिन्द्यात् सुदुर्भिदं व्यूहं यतमानोऽपि संयुगे । प्रतिज्ञाया गतः पारं हत्वा सैन्धवमर्जुनः ॥ ७ ॥ 'यदि इस युद्धमें आचार्य द्रोण अर्जुनको रोकनेकी पूरी चेष्टा करते तो प्रयत्न करनेपर भी वे समरांगणमें उस दुर्भेद्य व्यूहको कैसे तोड़ सकते थे? सिंधुराजको मारकर अर्जुन अपनी प्रतिज्ञाके भारसे मुक्त हो गये ।।
पश्य राधेय पृथ्वीशान् पृथिव्यां पातितान् बहून् । पार्थेन निहतान् संख्ये महेन्द्रोपमविक्रमान् ॥ ८ ॥ 'राधाकुमार! संग्रामभूमिमें पार्थके मारे और पृथ्वीपर गिराये हुए इन बहुसंख्यक भूपतियोंको देखो, ये सब-के-सब देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी थे ।। ८ ।।