भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1110, कुल 3237 में से

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उस भयंकर युद्धमें महान् यशकी अभिलाषा रखते हुए घुड़सवार घुड़सवारोंको प्रास, शक्ति और फरसोंद्वारा घायल कर रहे थे ॥ ६ ॥ पत्तयश्च महाबाहो शतशः शस्त्रपाणयः । अन्योन्यमर्दयन् राजन् नित्यं यत्ताः पराक्रमे ॥ ७ ॥ राजन्! हाथोंमें शस्त्र लिये सैकड़ों पैदल सैनिक सदा पराक्रमके लिये प्रयत्नशील हो एक-दूसरेपर चोट कर रहे थे ॥ ७ ॥ गोत्राणां नामधेयानां कुलानां चैव मारिष । श्रवणाद्धि विजानीमः पञ्चालान् कुरुभिः सह ॥ ८ ॥ आर्य! नाम, गोत्र और कुलोंका परिचय सुनकर ही हमलोग उस समय कौरवोंके साथ युद्ध करनेवाले पांचालोंको पहचान पाते थे ॥ ८ ॥ तेऽन्योन्यं समरे योधाः शरशक्तिपरश्वधैः । प्रैषयन् परलोकाय विचरन्तो ह्यभीतवत् ॥ ९ ॥ उस समरांगणमें वे समस्त योद्धा निर्भय-से विचरते हुए बाण, शक्ति और फरसोंकी मारसे एक-दूसरेको परलोक भेज रहे थे ॥ ९ ॥ शरा दश दिशो राजंस्तेषां मुक्ताः सहस्रशः । न भ्राजन्ते यथातत्त्वं भास्करेऽस्तंगतेऽपि च ॥ १० ॥ राजन्! सूर्यास्त हो जानेके कारण उन योद्धाओंके छोड़े हुए सहस्रों बाण दसों दिशाओंमें फैलकर अच्छी तरह प्रकाशित नहीं हो पाते थे ॥ १० ॥ तथा प्रयुध्यमानेषु पाण्डवेयेषु भारत । दुर्योधनो महाराज व्यवागाहत तद् बलम् ॥ ११ ॥ भरतवंशी महाराज! जब इस प्रकार पाण्डवसैनिक युद्ध कर रहे थे, उस समय दुर्योधनने उस सेनामें प्रवेश किया ॥ सैन्धवस्य वधेनैव भृशं दुःखसमन्वितः । मर्तव्यमिति संचिन्त्य प्राविशच्च द्विषद्बलम् ॥ १२ ॥ वह सिंधुराजके वधसे बहुत दुःखी हो गया था। अतः मरनेका ही निश्चय करके उसने शत्रुओंकी सेनामें प्रवेश किया ॥ १२ ॥ नादयन् रथघोषेण कम्पयन्निव मेदिनीम् । अभ्यवर्तत पुत्रस्ते पाण्डवानामनीकिनीम् ॥ १३ ॥ अपने रथकी घरघराहटसे दिशाओंको प्रतिध्वनित करता और पृथ्वीको कँपाता हुआ-सा आपका पुत्र पाण्डव-सेनाके सम्मुख आया ॥ १३ ॥ स संनिपातस्तमुलस्तस्य तेषां च भारत । अभवत् सर्वसैन्यानामभावकरणो महान् ॥ १४ ॥

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