भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1111

भारत! पाण्डव-सैनिकों तथा दुर्योधनका वह भयंकर संग्राम समस्त सेनाओंका महान् विनाश करनेवाला था ।।

(धृतराष्ट्र उवाच

द्रोणः कर्णः कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः । नावारयन् कथं युद्धे राजानं राजकाङ्क्षिणः ।। धृतराष्ट्रने पूछा—द्रोण, कर्ण, कृप तथा सात्वतवंशी कृतवर्मा—ये तो राजाके चाहनेवालोंमेंसे हैं, इन्होंने उसे युद्धमें जानेसे रोका क्यों नहीं? सर्वोपायैर्हि युद्धेषु रक्षितव्यो महीपतिः । एषा नीतिः परा युद्धे दृष्टा तत्र महर्षिभिः ।। युद्धमें सभी उपायोंसे राजाकी रक्षा करनी चाहिये। महर्षियोंने युद्धविषयक इसी सर्वोत्तम नीतिका साक्षात्कार किया है। प्रविष्टे वा मम सुते परेषां वै महद् बलम् । मामका रथिनां श्रेष्ठाः किमकुर्वत संजय ।। संजय! जब मेरा पुत्र शत्रुओंकी विशाल सेनामें घुस गया, उस समय मेरे पक्षके श्रेष्ठ रथियोंने क्या किया?

संजय उवाच

राजन् संग्राममाश्चर्यं पुत्रस्य तव भारत । एकस्य च बहूनां च शृणु मे ब्रुवतोऽद्भुतम् ।। संजयने कहा—भारतवंशी नरेश! आपके पुत्रके आश्चर्यजनक एवं अद्भुत संग्रामका, जो एकका बहुत-से योद्धाओंके साथ हुआ था, वर्णन करता हूँ, सुनिये। द्रोणेन वार्यमाणोऽसौ कर्णेन च कृपेण च । प्राविशत् पाण्डवीं सेनां मकराः सागरं यथा ।। द्रोणाचार्य, कर्ण और कृपाचार्यके मना करनेपर भी जैसे मगर समुद्रमें प्रवेश करता है, उसी प्रकार दुर्योधन पाण्डव-सेनामें घुस गया था। किरन्त्रिषुसहस्राणि तत्र तत्र तदा तदा । पञ्चालान् पाण्डवांश्चैव विव्याध निशितैः शरैः ।। जहाँ-तहाँ सब ओर सहस्रों बाणोंकी वर्षा करते हुए उसने तीखे बाणोंद्वारा पांचालों और पाण्डवोंको घायल कर दिया। यथोद्यन् विततं सूर्यो रश्मिभिर्नाशयेत् तमः । तथा पुत्रस्तव बलं नाशयत् तन्महाबलः ।।) जैसे उदयकालका सूर्य अपनी किरणोंद्वारा सर्वत्र फैले हुए अंधकारका नाश कर देता है, उसी प्रकार आपके महाबली पुत्रने शत्रुसेनाका विनाश कर दिया।