भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1137

सौमदत्तिवधात् क्रुद्धो दृष्ट्वा सात्यकिमाहवे ।। ५५ ।। द्रौणिरभ्यद्रवद् राजन् वधाय कृतनिश्चयः । नरेश्वर! द्रोणपुत्र अश्वत्थामा सोमदत्तकुमार भूरिश्रवाके वधसे अत्यन्त कुपित हो उठा था। उसने युद्धस्थलमें सात्यकिको देखकर उनके वधका दृढ़ निश्चय करके उनपर आक्रमण किया ।। ५५ १/२ ।।

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य शैनेयस्य रथं प्रति ।। ५६ ।। भैमसेनिः सुसंक्रुद्धः प्रत्यमित्रमवारयत् । अश्वत्थामाको शिनिपौत्रके रथकी ओर जाते देख अत्यन्त कुपित हुए भीमसेनके पुत्र घटोत्कचने अपने उस शत्रुको रोका ।। ५६ १/२ ।।

कार्ष्णायसं महाघोरमृक्षचर्मपरिच्छदम् ।। ५७ ।। महान्तं रथमास्थाय त्रिंशन्नल्वान्तरान्तरम् । विक्षिप्तयन्त्रसंनाहं महामेघौघनिःस्वनम् ।। ५८ ।। युक्तं गजनिभैर्वाहैर्न हयैर्नापि वारणैः । विक्षिप्तपक्षचरणविवृताक्षेण कूजता ।। ५९ ।। ध्वजेनोच्छ्रितदण्डेन गृध्रराजेन राजितम् । लोहितार्द्रपताकं तु अन्त्रमालाविभूषितम् ।। ६० ।। घटोत्कच जिस विशाल रथपर बैठकर आया था, वह काले लोहेका बना हुआ और अत्यन्त भयंकर था। उसके ऊपर रीछकी खाल मढ़ी हुई थी। उसके भीतरी भागकी लंबाई-चौड़ाई तीस नल्व* (बारह हजार हाथ) थी। उसमें यन्त्र और कवच रखे हुए थे। चलते समय उससे मेघोंकी भारी घटाके समान गम्भीर शब्द होता था। उसमें हाथी-जैसे विशालकाय वाहन जुते हुए थे, जो वास्तवमें न घोड़े थे और न हाथी। उस रथकी ध्वजाका डंडा बहुत ऊँचा था। वह ध्वज पंख और पंजे फैलाकर आँखें फाड़-फाड़कर देखने और कूकनेवाले एक गृध्रराजसे सुशोभित था। उसकी पताका खूनसे भीगी हुई थी और उस रथको आँतोंकी मालासे विभूषित किया गया था ।। ५७–६० ।।

अष्टचक्रसमायुक्तमास्थाय विपुलं रथम् । शूलमुद्गरधारिण्या शैलपादपहस्तया ।। ६१ ।। रक्षसां घोररूपाणामक्षौहिण्या समावृतः । ऐसे आठ पहियोंवाले विशाल रथपर बैठा हुआ घटोत्कच भयंकर रूपवाले राक्षसोंकी एक अक्षौहिणी सेनासे घिरा हुआ था। उस समस्त सेनाने अपने हाथोंमें शूल, मुद्गर, पर्वत-शिखर और वृक्ष ले रखे थे ।। ६१ १/२ ।।

तमुद्यतमहाचापं निशम्य व्यथिता नृपाः ।। ६२ ।। युगान्तकालसमये दण्डहस्तमिवान्तकम् ।