भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1138, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1138

प्रलयकालमें दण्डधारी यमराजके समान विशाल धनुष उठाये घटोत्कचको देखकर समस्त राजा व्यथित हो उठे ।। ६२ ½ ।।

ततस्तं गिरिशृङ्गाभं भीमरूपं भयावहम् ।। ६३ ।।
दंष्ट्राकरालोग्रमुखं शङ्कुकर्णं महाहनुम् ।
ऊर्ध्वकेशं विरूपाक्षं दीप्तास्यं निम्नितोदरम् ।। ६४ ।।
महाश्वभ्रगलद्वारं किरीटच्छन्नमूर्धजम् ।
त्रासनं सर्वभूतानां व्यात्ताननमिवान्तकम् ।। ६५ ।।
वीक्ष्य दीप्तमिवायान्तं रिपुविक्षोभकारिणम् ।
तमुद्यतमहाचापं राक्षसेन्द्रं घटोत्कचम् ।। ६६ ।।
भयार्दिता प्रचुक्षोभ पुत्रस्य तव वाहिनी ।
वायुना क्षोभितावर्ता गङ्गेवोर्ध्वतरङ्गिणी ।। ६७ ।।

वह देखनेमें पर्वत-शिखरके समान जान पड़ता था। उसका रूप भयानक होनेके कारण वह सबको भयंकर प्रतीत होता था। उसका मुख यों ही बड़ा भीषण था; किंतु दाढ़ोंके कारण और भी विकराल हो उठा था। उसके कान कील या खूँटेके समान जान पड़ते थे। ठोढ़ी बहुत बड़ी थी। बाल ऊपरकी ओर उठे हुए थे। आँखें डरावनी थीं। मुख आगके समान प्रज्वलित था, पेट भीतरकी ओर धँसा हुआ था। उसके गलेका छेद बहुत बड़े गड़ढेके समान जान पड़ता था। सिरके बाल किरीटसे ढके हुए थे। वह मुँह बाये हुए यमराजके समान समस्त प्राणियोंके मनमें त्रास उत्पन्न करनेवाला था। शत्रुओंको क्षुब्ध कर देनेवाले प्रज्वलित अग्निके समान राक्षसराज घटोत्कचको विशाल धनुष उठाये आते देख आपके पुत्रकी सेना भयसे पीड़ित एवं क्षुब्ध हो उठी, मानो वायुसे विक्षुब्ध हुई गंगामें भयानक भँवरें और ऊँची-ऊँची लहरें उठ रही हों ।। ६३—६७ ।।

घटोत्कचप्रयुक्तेन सिंहनादेन भीषिताः ।
प्रसुस्रुवुर्गजा मूत्रं विव्यथुश्च नरा भृशम् ।। ६८ ।।

घटोत्कचके द्वारा किये हुए सिंहनादसे भयभीत हो हाथियोंके पेशाब झड़ने लगे और मनुष्य भी अत्यन्त व्यथित हो उठे ।। ६८ ।।

ततोऽश्मवृष्टिरत्यर्थमासीत् तत्र समन्ततः ।
संध्याकालाधिकबलैः प्रयुक्ता राक्षसैः क्षितौ ।। ६९ ।।

तदनन्तर उस रणभूमिमें चारों ओर संध्याकालसे ही अधिक बलवान् हुए राक्षसोंद्वारा की हुई पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी ।। ६९ ।।

आयसानि च चक्राणि भुशुण्ड्यः प्रासतोमराः ।
पतन्त्यविरताः शूलाः शतघ्न्यः पट्टिशास्तथा ।। ७० ।।

लोहेके चक्र, भुशुण्डी, प्रास, तोमर, शूल, शतघ्नी और पट्टिश आदि अस्त्र अविराम गतिसे गिरने लगे ।। ७० ।।