भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1139, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1139

तदुग्रमतिरौद्रं च दृष्ट्वा युद्धं नराधिपाः । तनयास्तव कर्णश्च व्यथिताः प्राद्रवन् दिशः ॥ ७१ ॥ उस अत्यन्त भयंकर और उग्र संग्रामको देखकर समस्त नरेश, आपके पुत्र और कर्ण—ये सभी पीड़ित हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ ७१ ॥

तत्रैकोऽस्त्रबलश्लाघी द्रौणिर्मानी न विव्यथे । व्यधमच्च शरैर्मायां घटोत्कचविनिर्मिताम् ॥ ७२ ॥ उस समय वहाँ अपने अस्त्र-बलपर अभिमान करनेवाला एकमात्र द्रोणकुमार स्वाभिमानी अश्वत्थामा तनिक भी व्यथित नहीं हुआ। उसने घटोत्कचकी रची हुई माया अपने बाणोंद्वारा नष्ट कर दी ॥ ७२ ॥

विहतायां तु मायायाममर्षी स घटोत्कचः । विससर्ज शरान् घोरांस्तेऽश्वत्थामानमाविशन् ॥ ७३ ॥ माया नष्ट हो जानेपर अमर्षमें भरे हुए घटोत्कचने बड़े भयंकर बाण छोड़े। वे सभी बाण अश्वत्थामाके शरीरमें घुस गये ॥ ७३ ॥

भुजङ्गा इव वेगेन वल्मीकं क्रोधमूर्च्छिताः । ते शरा रुधिराक्ताङ्गा भित्त्वा शारद्वतीसुतम् ॥ ७४ ॥ विविशुर्धरणीं शीघ्रा रुक्मपुङ्खाः शिलाशिताः । जैसे क्रोधातुर सर्प बड़े वेगसे बाँबीमें घुसते हैं, उसी प्रकार शिलापर तेज किये हुए वे सुवर्णमय पंखवाले शीघ्रगामी बाण कृपीकुमारको विदीर्ण करके खूनसे लथपथ हो धरतीमें घुस गये ॥ ७४ १/२ ॥

अश्वत्थामा तु संक्रुद्धो लघुहस्तः प्रतापवान् ॥ ७५ ॥ घटोत्कचमभिक्रुद्धं बिभेद दशभिः शरैः । इससे अश्वत्थामाका क्रोध बहुत बढ़ गया। फिर तो शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले उस प्रतापी वीरने क्रोधी घटोत्कचको दस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ७५ १/२ ॥

घटोत्कचोऽतिविद्धस्तु द्रोणपुत्रेण मर्मसु ॥ ७६ ॥ चक्रं शतसहस्रारमगृह्णाद् व्यथितो भृशम् । क्षुरान्तं बालसूर्याभं मणिवज्रविभूषितम् ॥ ७७ ॥ द्रोणपुत्रके द्वारा मर्मस्थानोंमें गहरी चोट लगनेके कारण घटोत्कच अत्यन्त व्यथित हो उठा और उसने एक ऐसा चक्र हाथमें लिया, जिसमें एक लाख अरे थे। उसके प्रान्तभागमें छुरे लगे हुए थे। मणियों तथा हीरोंसे विभूषित वह चक्र प्रातःकालके सूर्यके समान जान पड़ता था ॥ ७६-७७ ॥

अश्वत्थाम्नि च चिक्षेप भैमसेनिर्जिघांसया । वेगेन महताऽऽगच्छद् विक्षिप्तं द्रौणिना शरैः ॥ ७८ ॥ अभाग्यस्येव संकल्पस्तन्मोघमपतद् भुवि ।