भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1140

भीमसेनकुमारने अश्वत्थामाका वध करनेकी इच्छासे वह चक्र उसके ऊपर चला दिया, परंतु अश्वत्थामाने अपने बाणोंद्वारा बड़े वेगसे आते हुए उस चक्रको दूर फेंक दिया। वह भाग्यहीनके संकल्प (मनोरथ)-की भाँति व्यर्थ होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ७८ १/२ ॥ घटोत्कचस्ततस्तूर्णं दृष्ट्वा चक्रं निपातितम् ॥ ७९ ॥ द्रौणिं प्राच्छादयद् बाणैः स्वर्भानुरिव भास्करम् । तदनन्तर अपने चक्रको धरतीपर गिराया हुआ देख घटोत्कचने अपने बाणोंकी वर्षासे अश्वत्थामाको उसी प्रकार ढक दिया, जैसे राहु सूर्यको आच्छादित कर देता है ॥ घटोत्कचसुतः श्रीमान् भिन्नाञ्जनचयोपमः ॥ ८० ॥ रुरोध द्रौणिमायान्तं प्रभञ्जनमिवाद्रिराट् । घटोत्कचके तेजस्वी पुत्र अंजनपर्वाने, जो कटे हुए कोयलेके ढेरके समान काला था, अपनी ओर आते हुए अश्वत्थामाको उसी प्रकार रोक दिया, जैसे गिरिराज हिमालय आँधीको रोक देता है ॥ ८० १/२ ॥ पौत्रेण भीमसेनस्य शरैरञ्जनपर्वणा ॥ ८१ ॥ बभौ मेघेन धाराभिर्गिरिर्मेरुरिवावृतः । भीमसेनके पौत्र अंजनपर्वाके बाणोंसे आच्छादित हुआ अश्वत्थामा मेघकी जलधारासे आवृत हुए मेरु पर्वतके समान सुशोभित हो रहा था ॥ ८१ १/२ ॥ अश्वत्थामा त्वसम्भ्रान्तो रुद्रोपेन्द्रेन्द्रविक्रमः ॥ ८२ ॥ ध्वजमेकेन बाणेन चिच्छेदाञ्जनपर्वणः । रुद्र, विष्णु तथा इन्द्रके समान पराक्रमी अश्वत्थामाके मनमें तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उसने एक बाणसे अंजनपर्वाकी ध्वजा काट डाली ॥ ८२ १/२ ॥ द्वाभ्यां तु रथयन्तारौ त्रिभिश्चास्य त्रिवेणुकम् ॥ ८३ ॥ धनुरेकेन चिच्छेद चतुर्भिश्चतुरो हयान् । फिर दो बाणोंसे उसके दो सारथियोंको, तीनसे त्रिवेणुको, एकसे धनुषको और चारसे चारों घोड़ोंको काट डाला ॥ ८३ १/२ ॥ विरथस्योद्यतं हस्ताद्धेमबिन्दुभिराचितम् ॥ ८४ ॥ विशिखेन सुतीक्ष्णेन खड्गमस्य द्विधाकरोत् । तत्पश्चात् रथहीन हुए राक्षसपुत्रके हाथसे उठे हुए सुवर्ण-बिन्दुओंसे व्याप्त खड्गको उसने एक तीखे बाणसे मारकर उसके दो टुकड़े कर दिये ॥ ८४ १/२ ॥ गदा हेमाङ्गदा राजंस्तूर्णं हैडिम्बिसूनुना ॥ ८५ ॥ भ्राम्योत्क्षिप्ता शरैः साऽपि द्रौणिनाभ्याहताऽपतत् ।