महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1141, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! तब घटोत्कचपुत्रने तुरंत ही सोनेके अंगदसे विभूषित गदा घुमाकर अश्वत्थामापर दे मारी; परंतु अश्वत्थामाके बाणोंसे आहत होकर वह भी पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ८५ १/२ ॥
ततोऽन्तरिक्षमुत्प्लुत्य कालमेघ इवोन्नदन् ॥ ८६ ॥
ववर्षाञ्जनपर्वा स द्रुमवर्षं नभस्तलात् ।
तब आकाशमें उछलकर प्रलयकालके मेघकी भाँति गर्जना करते हुए अंजनपर्वाने आकाशसे वृक्षोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ८६ १/२ ॥
ततो मायाधरं द्रौणिर्घटोत्कचसुतं दिवि ॥ ८७ ॥
मार्गणैरभिविव्याध घनं सूर्य इवांशुभिः ।
तदनन्तर द्रोणपुत्रने आकाशमें स्थित हुए मायाधारी घटोत्कचकुमारको अपने बाणोंद्वारा उसी तरह घायल कर दिया, जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा मेघोंकी घटाको गला देते हैं ॥ ८७ १/२ ॥
सोऽवतीर्य पुरस्तस्थौ रथे हेमविभूषिते ॥ ८८ ॥
महीगत इवात्युग्रः श्रीमानञ्जनपर्वतः ।
इसके बाद वह नीचे उतरकर अपने स्वर्णभूषित रथपर अश्वत्थामाके सामने खड़ा हो गया। उस समय वह तेजस्वी राक्षस पृथ्वीपर खड़े हुए अत्यन्त भयंकर कज्जलगिरिके समान जान पड़ा ॥ ८८ १/२ ॥
तमयस्मयवर्माणं द्रौणिर्भीमात्मजात्मजम् ॥ ८९ ॥
जघानाञ्जनपर्वाणं महेश्वर इवान्धकम् ।
उस समय द्रोणकुमारने लोहेके कवच धारण करके आये हुए भीमसेनपौत्र अंजनपर्वाको उसी प्रकार मार डाला, जैसे भगवान् महेश्वरने अन्धकासुरका वध किया था ॥ ८९ १/२ ॥
अथ दृष्ट्वा हतं पुत्रमश्वत्थाम्ना महाबलम् ॥ ९० ॥
द्रौणेः सकाशमभ्येत्य रोषात् प्रज्वलिताङ्गदः ।
प्राह वाक्यमसम्भ्रान्तो वीरं शारद्वतीसुतम् ॥ ९१ ॥
दहन्तं पाण्डवानीकं वनमग्निमिवोच्छ्रितम् ।
अपने महाबली पुत्रको अश्वत्थामाद्वारा मारा गया देख चमकते हुए बाजूबंदसे विभूषित घटोत्कच बड़े रोषके साथ द्रोणकुमारके समीप आकर बढ़े हुए दावानलके समान पाण्डव-सेनारूपी वनको दग्ध करते हुए उस वीर कृपीकुमारसे बिना किसी घबराहटके इस प्रकार बोला ॥ ९०-९१ १/२ ॥
घटोत्कच उवाच
तिष्ठ तिष्ठ न मे जीवन् द्रोणपुत्र गमिष्यसि ॥ ९२ ॥