महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1142, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्वामद्य निहनिष्यामि क्रौञ्चमग्निसुतो यथा ।
**घटोत्कचने कहा—**द्रोणपुत्र! खड़े रहो, खड़े रहो। आज तुम मेरे हाथसे जीवित बचकर नहीं जा सकोगे। जैसे अग्निपुत्र कार्तिकेयने क्रौंच पर्वतको विदीर्ण किया था, उसी प्रकार आज मैं तुम्हारा विनाश कर डालूँगा ।।
अश्वत्थामोवाच
गच्छ वत्स सहान्यैस्त्वं युध्यस्वामरविक्रम ।। ९३ ।।
न हि पुत्रेण हैडिम्बे पिता न्याय्यः प्रबाधितुम् ।
**अश्वत्थामाने कहा—**देवताओंके समान पराक्रमी पुत्र! तुम जाओ, दूसरोंके साथ युद्ध करो। हिडिम्बानन्दन! पुत्रके लिये यह उचित नहीं है कि वह पिताको भी सताये ।। ९३१/२ ।।
कामं खलु न रोषो मे हैडिम्बे विद्यते त्वयि ।। ९४ ।।
किं तु रोषान्वितो जन्तुर्हन्यादात्मानमप्युत ।
हिडिम्बाकुमार! अभी मेरे मनमें तुम्हारे प्रति तनिक भी रोष नहीं है, परंतु यदि रोष हो जाय तो तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि रोषके वशीभूत हुआ प्राणी अपना भी विनाश कर डालता है (फिर दूसरेकी तो बात ही क्या है? अतः मेरे कुपित होनेपर तुम सकुशल नहीं रह सकते) ।। ९४१/२ ।।
संजय उवाच
श्रुत्वैतत् क्रोधताम्राक्षः पुत्रशोकसमन्वितः ।। ९५ ।।
अश्वत्थामानमायस्तो भैमसेनिरभाषत ।
**संजय कहते हैं—**राजन्! पुत्रशोकमें डूबे हुए भीमसेनकुमारने अश्वत्थामाकी यह बात सुनकर क्रोधसे लाल आँखें करके रोषपूर्वक उससे कहा— ।। ९५१/२ ।।
किमहं कातरो द्रौणे पृथग्जन इवाहवे ।। ९६ ।।
यन्मां भीषयसे वाग्भिरसदेतद् वचस्तव ।
‘द्रोणकुमार! क्या मैं युद्धस्थलमें नीच लोगोंके समान कायर हूँ, जो तू मुझे अपनी बातोंसे डरा रहा है। तेरी यह बात नीचतापूर्ण है ।। ९६१/२ ।।
भीमात् खलु समुत्पन्नः कुरूणां विपुले कुले ।। ९७ ।।
पाण्डवानामहं पुत्रः समरेष्वनिवर्तिनाम् ।
रक्षसामधिराजोऽहं दशग्रीवसमो बले ।। ९८ ।।
‘देख, मैं कौरवोंके विशाल कुलमें भीमसेनसे उत्पन्न हुआ हूँ, समरांगणमें कभी पीठ न दिखानेवाले पाण्डवोंका पुत्र हूँ, राक्षसोंका राजा हूँ और दशग्रीव रावणके समान बलवान् हूँ ।। ९७-९८ ।।
तिष्ठ तिष्ठ न मे जीवन् द्रोणपुत्र गमिष्यसि ।
युद्धश्रद्धामहं तेऽद्य विनेष्यामि रणाजिरे ।। ९९ ।।