महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
प्रलयकालमें दण्डधारी यमराजके समान विशाल धनुष उठाये घटोत्कचको देखकर समस्त राजा व्यथित हो उठे ।। ६२ ½ ।।
ततस्तं गिरिशृङ्गाभं भीमरूपं भयावहम् ।। ६३ ।।
दंष्ट्राकरालोग्रमुखं शङ्कुकर्णं महाहनुम् ।
ऊर्ध्वकेशं विरूपाक्षं दीप्तास्यं निम्नितोदरम् ।। ६४ ।।
महाश्वभ्रगलद्वारं किरीटच्छन्नमूर्धजम् ।
त्रासनं सर्वभूतानां व्यात्ताननमिवान्तकम् ।। ६५ ।।
वीक्ष्य दीप्तमिवायान्तं रिपुविक्षोभकारिणम् ।
तमुद्यतमहाचापं राक्षसेन्द्रं घटोत्कचम् ।। ६६ ।।
भयार्दिता प्रचुक्षोभ पुत्रस्य तव वाहिनी ।
वायुना क्षोभितावर्ता गङ्गेवोर्ध्वतरङ्गिणी ।। ६७ ।।
वह देखनेमें पर्वत-शिखरके समान जान पड़ता था। उसका रूप भयानक होनेके कारण वह सबको भयंकर प्रतीत होता था। उसका मुख यों ही बड़ा भीषण था; किंतु दाढ़ोंके कारण और भी विकराल हो उठा था। उसके कान कील या खूँटेके समान जान पड़ते थे। ठोढ़ी बहुत बड़ी थी। बाल ऊपरकी ओर उठे हुए थे। आँखें डरावनी थीं। मुख आगके समान प्रज्वलित था, पेट भीतरकी ओर धँसा हुआ था। उसके गलेका छेद बहुत बड़े गड़ढेके समान जान पड़ता था। सिरके बाल किरीटसे ढके हुए थे। वह मुँह बाये हुए यमराजके समान समस्त प्राणियोंके मनमें त्रास उत्पन्न करनेवाला था। शत्रुओंको क्षुब्ध कर देनेवाले प्रज्वलित अग्निके समान राक्षसराज घटोत्कचको विशाल धनुष उठाये आते देख आपके पुत्रकी सेना भयसे पीड़ित एवं क्षुब्ध हो उठी, मानो वायुसे विक्षुब्ध हुई गंगामें भयानक भँवरें और ऊँची-ऊँची लहरें उठ रही हों ।। ६३—६७ ।।
घटोत्कचप्रयुक्तेन सिंहनादेन भीषिताः ।
प्रसुस्रुवुर्गजा मूत्रं विव्यथुश्च नरा भृशम् ।। ६८ ।।
घटोत्कचके द्वारा किये हुए सिंहनादसे भयभीत हो हाथियोंके पेशाब झड़ने लगे और मनुष्य भी अत्यन्त व्यथित हो उठे ।। ६८ ।।
ततोऽश्मवृष्टिरत्यर्थमासीत् तत्र समन्ततः ।
संध्याकालाधिकबलैः प्रयुक्ता राक्षसैः क्षितौ ।। ६९ ।।
तदनन्तर उस रणभूमिमें चारों ओर संध्याकालसे ही अधिक बलवान् हुए राक्षसोंद्वारा की हुई पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी ।। ६९ ।।
आयसानि च चक्राणि भुशुण्ड्यः प्रासतोमराः ।
पतन्त्यविरताः शूलाः शतघ्न्यः पट्टिशास्तथा ।। ७० ।।
लोहेके चक्र, भुशुण्डी, प्रास, तोमर, शूल, शतघ्नी और पट्टिश आदि अस्त्र अविराम गतिसे गिरने लगे ।। ७० ।।
तदुग्रमतिरौद्रं च दृष्ट्वा युद्धं नराधिपाः । तनयास्तव कर्णश्च व्यथिताः प्राद्रवन् दिशः ॥ ७१ ॥ उस अत्यन्त भयंकर और उग्र संग्रामको देखकर समस्त नरेश, आपके पुत्र और कर्ण—ये सभी पीड़ित हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ ७१ ॥
तत्रैकोऽस्त्रबलश्लाघी द्रौणिर्मानी न विव्यथे । व्यधमच्च शरैर्मायां घटोत्कचविनिर्मिताम् ॥ ७२ ॥ उस समय वहाँ अपने अस्त्र-बलपर अभिमान करनेवाला एकमात्र द्रोणकुमार स्वाभिमानी अश्वत्थामा तनिक भी व्यथित नहीं हुआ। उसने घटोत्कचकी रची हुई माया अपने बाणोंद्वारा नष्ट कर दी ॥ ७२ ॥
विहतायां तु मायायाममर्षी स घटोत्कचः । विससर्ज शरान् घोरांस्तेऽश्वत्थामानमाविशन् ॥ ७३ ॥ माया नष्ट हो जानेपर अमर्षमें भरे हुए घटोत्कचने बड़े भयंकर बाण छोड़े। वे सभी बाण अश्वत्थामाके शरीरमें घुस गये ॥ ७३ ॥
भुजङ्गा इव वेगेन वल्मीकं क्रोधमूर्च्छिताः । ते शरा रुधिराक्ताङ्गा भित्त्वा शारद्वतीसुतम् ॥ ७४ ॥ विविशुर्धरणीं शीघ्रा रुक्मपुङ्खाः शिलाशिताः । जैसे क्रोधातुर सर्प बड़े वेगसे बाँबीमें घुसते हैं, उसी प्रकार शिलापर तेज किये हुए वे सुवर्णमय पंखवाले शीघ्रगामी बाण कृपीकुमारको विदीर्ण करके खूनसे लथपथ हो धरतीमें घुस गये ॥ ७४ १/२ ॥
अश्वत्थामा तु संक्रुद्धो लघुहस्तः प्रतापवान् ॥ ७५ ॥ घटोत्कचमभिक्रुद्धं बिभेद दशभिः शरैः । इससे अश्वत्थामाका क्रोध बहुत बढ़ गया। फिर तो शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले उस प्रतापी वीरने क्रोधी घटोत्कचको दस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ७५ १/२ ॥
घटोत्कचोऽतिविद्धस्तु द्रोणपुत्रेण मर्मसु ॥ ७६ ॥ चक्रं शतसहस्रारमगृह्णाद् व्यथितो भृशम् । क्षुरान्तं बालसूर्याभं मणिवज्रविभूषितम् ॥ ७७ ॥ द्रोणपुत्रके द्वारा मर्मस्थानोंमें गहरी चोट लगनेके कारण घटोत्कच अत्यन्त व्यथित हो उठा और उसने एक ऐसा चक्र हाथमें लिया, जिसमें एक लाख अरे थे। उसके प्रान्तभागमें छुरे लगे हुए थे। मणियों तथा हीरोंसे विभूषित वह चक्र प्रातःकालके सूर्यके समान जान पड़ता था ॥ ७६-७७ ॥
अश्वत्थाम्नि च चिक्षेप भैमसेनिर्जिघांसया । वेगेन महताऽऽगच्छद् विक्षिप्तं द्रौणिना शरैः ॥ ७८ ॥ अभाग्यस्येव संकल्पस्तन्मोघमपतद् भुवि ।
भीमसेनकुमारने अश्वत्थामाका वध करनेकी इच्छासे वह चक्र उसके ऊपर चला दिया, परंतु अश्वत्थामाने अपने बाणोंद्वारा बड़े वेगसे आते हुए उस चक्रको दूर फेंक दिया। वह भाग्यहीनके संकल्प (मनोरथ)-की भाँति व्यर्थ होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ७८ १/२ ॥ घटोत्कचस्ततस्तूर्णं दृष्ट्वा चक्रं निपातितम् ॥ ७९ ॥ द्रौणिं प्राच्छादयद् बाणैः स्वर्भानुरिव भास्करम् । तदनन्तर अपने चक्रको धरतीपर गिराया हुआ देख घटोत्कचने अपने बाणोंकी वर्षासे अश्वत्थामाको उसी प्रकार ढक दिया, जैसे राहु सूर्यको आच्छादित कर देता है ॥ घटोत्कचसुतः श्रीमान् भिन्नाञ्जनचयोपमः ॥ ८० ॥ रुरोध द्रौणिमायान्तं प्रभञ्जनमिवाद्रिराट् । घटोत्कचके तेजस्वी पुत्र अंजनपर्वाने, जो कटे हुए कोयलेके ढेरके समान काला था, अपनी ओर आते हुए अश्वत्थामाको उसी प्रकार रोक दिया, जैसे गिरिराज हिमालय आँधीको रोक देता है ॥ ८० १/२ ॥ पौत्रेण भीमसेनस्य शरैरञ्जनपर्वणा ॥ ८१ ॥ बभौ मेघेन धाराभिर्गिरिर्मेरुरिवावृतः । भीमसेनके पौत्र अंजनपर्वाके बाणोंसे आच्छादित हुआ अश्वत्थामा मेघकी जलधारासे आवृत हुए मेरु पर्वतके समान सुशोभित हो रहा था ॥ ८१ १/२ ॥ अश्वत्थामा त्वसम्भ्रान्तो रुद्रोपेन्द्रेन्द्रविक्रमः ॥ ८२ ॥ ध्वजमेकेन बाणेन चिच्छेदाञ्जनपर्वणः । रुद्र, विष्णु तथा इन्द्रके समान पराक्रमी अश्वत्थामाके मनमें तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उसने एक बाणसे अंजनपर्वाकी ध्वजा काट डाली ॥ ८२ १/२ ॥ द्वाभ्यां तु रथयन्तारौ त्रिभिश्चास्य त्रिवेणुकम् ॥ ८३ ॥ धनुरेकेन चिच्छेद चतुर्भिश्चतुरो हयान् । फिर दो बाणोंसे उसके दो सारथियोंको, तीनसे त्रिवेणुको, एकसे धनुषको और चारसे चारों घोड़ोंको काट डाला ॥ ८३ १/२ ॥ विरथस्योद्यतं हस्ताद्धेमबिन्दुभिराचितम् ॥ ८४ ॥ विशिखेन सुतीक्ष्णेन खड्गमस्य द्विधाकरोत् । तत्पश्चात् रथहीन हुए राक्षसपुत्रके हाथसे उठे हुए सुवर्ण-बिन्दुओंसे व्याप्त खड्गको उसने एक तीखे बाणसे मारकर उसके दो टुकड़े कर दिये ॥ ८४ १/२ ॥ गदा हेमाङ्गदा राजंस्तूर्णं हैडिम्बिसूनुना ॥ ८५ ॥ भ्राम्योत्क्षिप्ता शरैः साऽपि द्रौणिनाभ्याहताऽपतत् ।
राजन्! तब घटोत्कचपुत्रने तुरंत ही सोनेके अंगदसे विभूषित गदा घुमाकर अश्वत्थामापर दे मारी; परंतु अश्वत्थामाके बाणोंसे आहत होकर वह भी पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ८५ १/२ ॥
ततोऽन्तरिक्षमुत्प्लुत्य कालमेघ इवोन्नदन् ॥ ८६ ॥
ववर्षाञ्जनपर्वा स द्रुमवर्षं नभस्तलात् ।
तब आकाशमें उछलकर प्रलयकालके मेघकी भाँति गर्जना करते हुए अंजनपर्वाने आकाशसे वृक्षोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ८६ १/२ ॥
ततो मायाधरं द्रौणिर्घटोत्कचसुतं दिवि ॥ ८७ ॥
मार्गणैरभिविव्याध घनं सूर्य इवांशुभिः ।
तदनन्तर द्रोणपुत्रने आकाशमें स्थित हुए मायाधारी घटोत्कचकुमारको अपने बाणोंद्वारा उसी तरह घायल कर दिया, जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा मेघोंकी घटाको गला देते हैं ॥ ८७ १/२ ॥
सोऽवतीर्य पुरस्तस्थौ रथे हेमविभूषिते ॥ ८८ ॥
महीगत इवात्युग्रः श्रीमानञ्जनपर्वतः ।
इसके बाद वह नीचे उतरकर अपने स्वर्णभूषित रथपर अश्वत्थामाके सामने खड़ा हो गया। उस समय वह तेजस्वी राक्षस पृथ्वीपर खड़े हुए अत्यन्त भयंकर कज्जलगिरिके समान जान पड़ा ॥ ८८ १/२ ॥
तमयस्मयवर्माणं द्रौणिर्भीमात्मजात्मजम् ॥ ८९ ॥
जघानाञ्जनपर्वाणं महेश्वर इवान्धकम् ।
उस समय द्रोणकुमारने लोहेके कवच धारण करके आये हुए भीमसेनपौत्र अंजनपर्वाको उसी प्रकार मार डाला, जैसे भगवान् महेश्वरने अन्धकासुरका वध किया था ॥ ८९ १/२ ॥
अथ दृष्ट्वा हतं पुत्रमश्वत्थाम्ना महाबलम् ॥ ९० ॥
द्रौणेः सकाशमभ्येत्य रोषात् प्रज्वलिताङ्गदः ।
प्राह वाक्यमसम्भ्रान्तो वीरं शारद्वतीसुतम् ॥ ९१ ॥
दहन्तं पाण्डवानीकं वनमग्निमिवोच्छ्रितम् ।
अपने महाबली पुत्रको अश्वत्थामाद्वारा मारा गया देख चमकते हुए बाजूबंदसे विभूषित घटोत्कच बड़े रोषके साथ द्रोणकुमारके समीप आकर बढ़े हुए दावानलके समान पाण्डव-सेनारूपी वनको दग्ध करते हुए उस वीर कृपीकुमारसे बिना किसी घबराहटके इस प्रकार बोला ॥ ९०-९१ १/२ ॥
घटोत्कच उवाच
तिष्ठ तिष्ठ न मे जीवन् द्रोणपुत्र गमिष्यसि ॥ ९२ ॥
त्वामद्य निहनिष्यामि क्रौञ्चमग्निसुतो यथा ।
**घटोत्कचने कहा—**द्रोणपुत्र! खड़े रहो, खड़े रहो। आज तुम मेरे हाथसे जीवित बचकर नहीं जा सकोगे। जैसे अग्निपुत्र कार्तिकेयने क्रौंच पर्वतको विदीर्ण किया था, उसी प्रकार आज मैं तुम्हारा विनाश कर डालूँगा ।।
अश्वत्थामोवाच
गच्छ वत्स सहान्यैस्त्वं युध्यस्वामरविक्रम ।। ९३ ।।
न हि पुत्रेण हैडिम्बे पिता न्याय्यः प्रबाधितुम् ।
**अश्वत्थामाने कहा—**देवताओंके समान पराक्रमी पुत्र! तुम जाओ, दूसरोंके साथ युद्ध करो। हिडिम्बानन्दन! पुत्रके लिये यह उचित नहीं है कि वह पिताको भी सताये ।। ९३१/२ ।।
कामं खलु न रोषो मे हैडिम्बे विद्यते त्वयि ।। ९४ ।।
किं तु रोषान्वितो जन्तुर्हन्यादात्मानमप्युत ।
हिडिम्बाकुमार! अभी मेरे मनमें तुम्हारे प्रति तनिक भी रोष नहीं है, परंतु यदि रोष हो जाय तो तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि रोषके वशीभूत हुआ प्राणी अपना भी विनाश कर डालता है (फिर दूसरेकी तो बात ही क्या है? अतः मेरे कुपित होनेपर तुम सकुशल नहीं रह सकते) ।। ९४१/२ ।।
संजय उवाच
श्रुत्वैतत् क्रोधताम्राक्षः पुत्रशोकसमन्वितः ।। ९५ ।।
अश्वत्थामानमायस्तो भैमसेनिरभाषत ।
**संजय कहते हैं—**राजन्! पुत्रशोकमें डूबे हुए भीमसेनकुमारने अश्वत्थामाकी यह बात सुनकर क्रोधसे लाल आँखें करके रोषपूर्वक उससे कहा— ।। ९५१/२ ।।
किमहं कातरो द्रौणे पृथग्जन इवाहवे ।। ९६ ।।
यन्मां भीषयसे वाग्भिरसदेतद् वचस्तव ।
‘द्रोणकुमार! क्या मैं युद्धस्थलमें नीच लोगोंके समान कायर हूँ, जो तू मुझे अपनी बातोंसे डरा रहा है। तेरी यह बात नीचतापूर्ण है ।। ९६१/२ ।।
भीमात् खलु समुत्पन्नः कुरूणां विपुले कुले ।। ९७ ।।
पाण्डवानामहं पुत्रः समरेष्वनिवर्तिनाम् ।
रक्षसामधिराजोऽहं दशग्रीवसमो बले ।। ९८ ।।
‘देख, मैं कौरवोंके विशाल कुलमें भीमसेनसे उत्पन्न हुआ हूँ, समरांगणमें कभी पीठ न दिखानेवाले पाण्डवोंका पुत्र हूँ, राक्षसोंका राजा हूँ और दशग्रीव रावणके समान बलवान् हूँ ।। ९७-९८ ।।
तिष्ठ तिष्ठ न मे जीवन् द्रोणपुत्र गमिष्यसि ।
युद्धश्रद्धामहं तेऽद्य विनेष्यामि रणाजिरे ।। ९९ ।।
‘द्रोणपुत्र!’ खड़ा रह, खड़ा रह, तू मेरे हाथसे छूटकर जीवित नहीं जा सकेगा। आज इस रणांगणमें मैं तेरा युद्धका हौसला मिटा दूँगा’ ॥ ९९ ॥
इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्षो राक्षसः सुमहाबलः ।
द्रौणिमभ्यद्रवत् क्रुद्धो गजेन्द्रमिव केसरी ॥ १०० ॥
ऐसा कहकर क्रोधसे लाल आँखें किये महाबली राक्षस घटोत्कचने द्रोणपुत्रपर रोषपूर्वक धावा किया, मानो सिंहने गजराजपर आक्रमण किया हो ॥ १०० ॥
रथाक्षमात्रैरिषुभिर्अभ्यवर्षद् घटोत्कचः ।
रथिनामृषभं द्रौणिं धाराभिरिव तोयदः ॥ १०१ ॥
जैसे बादल पर्वतपर जलकी धारा बरसाता है, उसी प्रकार घटोत्कच रथियोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामापर रथकी धुरीके समान मोटे बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ १०१ ॥
शरवृष्टिं शरैर्द्रौणिरप्राप्तां तां व्यशातयत् ।
ततोऽन्तरिक्षे बाणानां संग्रामोऽन्य इवाभवत् ॥ १०२ ॥
परंतु द्रोणपुत्र अश्वत्थामा अपने पास आनेसे पहले ही उस बाण-वर्षाको बाणोंद्वारा नष्ट कर देता था। इससे आकाशमें बाणोंका दूसरा संग्राम-सा मच गया था ॥
अथास्त्रसम्मर्दकृतैर्विस्फुलिङ्गैस्तदा बभौ ।
विभावरीमुखे व्योम खद्योतैरिव चित्रितम् ॥ १०३ ॥
अस्त्रोंके परस्पर टकरानेसे जो आगकी चिनगारियाँ छूटती थीं, उससे रात्रिके प्रथम प्रहरमें आकाश जुगनुओंसे चित्रित-सा प्रतीत होता था ॥ १०३ ॥
निशाम्य निहतां मायां द्रौणिना रणमानिना ।
घटोत्कचस्ततो मायां ससर्जार्न्तहितः पुनः ॥ १०४ ॥
युद्धाभिमानी अश्वत्थामाके द्वारा अपनी माया नष्ट हुई देख घटोत्कचने अदृश्य होकर पुनः दूसरी मायाकी सृष्टि की ॥ १०४ ॥
सोऽभवद् गिरिरत्युच्चः शिखरैस्तरुसंकटैः ।
शूलप्रासासिमुसलजलप्रस्रवणो महान् ॥ १०५ ॥
वह वृक्षोंसे भरे हुए शिखरोंद्वारा सुशोभित एक बहुत ऊँचा पर्वत बन गया। वह महान् पर्वत शूल, प्रास, खड्ग और मूसलरूपी जलके झरने बहा रहा था ॥ १०५ ॥
तमञ्जनगिरिप्रख्यं द्रौणिर्दृष्ट्वा महीधरम् ।
प्रपतद्भिश्च बहुभिः शस्त्रसंघैर्न विव्यथे ॥ १०६ ॥
अंजनगिरिके समान उस काले पहाड़को देखकर और वहाँसे गिरनेवाले बहुतेरे अस्त्र-शस्त्रोंसे घायल होकर भी द्रोणकुमार अश्वत्थामा व्यथित नहीं हुआ ॥ १०६ ॥
ततो हसन्निव द्रौणिर्वज्रमस्त्रमुदैरयत् ।
स तेनास्त्रेण शैलेन्द्रः क्षिप्तः क्षिप्रं व्यनश्यत ॥ १०७ ॥
तदनन्तर द्रोणकुमारने हँसते हुए-से वज्रास्त्रको प्रकट किया। उस अस्त्रका आघात होते ही वह पर्वतराज तत्काल अदृश्य हो गया ॥ १०७ ॥
ततः स तोयदो भूत्वा नीलः सेन्द्रायुधो दिवि । अश्मवृष्टिभिरत्युग्रो द्रौणिमाच्छादयद् रणे ॥ १०८ ॥
तत्पश्चात् वह आकाशमें इन्द्रधनुषसहित अत्यन्त भयंकर नील मेघ बनकर पत्थरोंकी वर्षासे रणभूमिमें अश्वत्थामाको आच्छादित करने लगा ॥ १०८ ॥
अथ संधाय वायव्यमस्त्रमस्त्रविदां वरः । व्यधमद् द्रोणतनयो नीलमेघं समुत्थितम् ॥ १०९ ॥
तब अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ द्रोणकुमारने वायव्यास्त्रका संधान करके वहाँ प्रकट हुए नील मेघको नष्ट कर दिया ॥
स मार्गणगणैर्द्रौणिर्दिशः प्रच्छाद्य सर्वशः । शतं रथसहस्राणां जघान द्विपदां वरः ॥ ११० ॥
मनुष्योंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामाने अपने बाणसमूहोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित करके शत्रुपक्षके एक लाख रथियोंका संहार कर डाला ॥ ११० ॥
स दृष्ट्वा पुनरायान्तं रथेनायातकार्मुकम् । घटोत्कचमसम्भ्रान्तं राक्षसैर्बहुभिर्वृतम् ॥ १११ ॥ सिंहशार्दूलसदृशैर्मत्तद्विरदविक्रमैः । गजस्थैश्च रथस्थैश्च वाजिपृष्ठगतैरपि ॥ ११२ ॥ विकृतास्यशिरोग्रीवैर्हिडिम्बानुचरैः सह । पौलस्त्यैर्यातुधानैश्च तामसैश्चेन्द्रविक्रमैः ॥ ११३ ॥ नानाशस्त्रधरैर्वीरैर्नानाकवचभूषणैः । महाबलैर्भीमरवैः संरम्भोद्वृत्तलोचनैः ॥ ११४ ॥ उपस्थितैस्ततो युद्धे राक्षसैर्युद्धदुर्मदैः । विषण्णमभिसम्प्रेक्ष्य पुत्रं ते द्रौणिरब्रवीत् ॥ ११५ ॥
तत्पश्चात् अश्वत्थामाने देखा कि घटोत्कच बिना किसी घबराहटके बहुत-से राक्षसोंसे घिरा हुआ पुनः रथपर आरूढ़ होकर आ रहा है। उसने अपने धनुषको खींचकर फैला रखा है। उसके साथ सिंह, व्याघ्र और मतवाले हाथियोंके समान पराक्रमी तथा विकराल मुख, मस्तक और कण्ठवाले बहुत-से अनुचर हैं, जो हाथी, घोड़ों तथा रथपर बैठे हुए हैं। उसके अनुचरोंमें राक्षस, यातुधान तथा तामस जातिके लोग हैं, जिनका पराक्रम इन्द्रके समान है। नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले, भाँति-भाँतिके कवच और आभूषणोंसे विभूषित, महाबली, भयंकर सिंहनाद करनेवाले तथा क्रोधसे घूरते हुए नेत्रोंवाले बहुसंख्यक रणदुर्मद राक्षस घटोत्कचकी ओरसे युद्धके लिये उपस्थित हैं। यह सब देखकर दुर्योधन
विषादग्रस्त हो रहा है। इन सब बातोंपर दृष्टिपात करके अश्वत्थामाने आपके पुत्रसे कहा— ।। १११—११५ ।। तिष्ठ दुर्योधनाद्य त्वं न कार्यः सम्भ्रमस्त्वया । सहैभिर्भ्रातृभिर्वीरैः पार्थिवैश्चेन्द्रविक्रमैः ।। ११६ ।। 'दुर्योधन! आज तुम चुपचाप खड़े रहो। तुम्हें इन्द्रके समान पराक्रमी इन राजाओं तथा अपने वीर भाइयोंके साथ तनिक भी घबराना नहीं चाहिये ।। ११६ ।। निहनिष्याम्यमित्रांस्ते न तवास्ति पराजयः । सत्यं ते प्रतिजानामि पर्याश्वासय वाहिनीम् ।। ११७ ।। 'राजन्! मैं तुम्हारे शत्रुओंको मार डालूँगा, तुम्हारी पराजय नहीं हो सकती; इसके लिये मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ। तुम अपनी सेनाको आश्वासन दो' ।।
दुर्योधन उवाच
न त्वेतदद्भुतं मन्ये यत् ते महदिदं मनः । अस्मासु च परा भक्तिस्तव गौतमीनन्दन ।। ११८ ।। **दुर्योधन बोला—**गौतमीनन्दन! तुम्हारा यह हृदय इतना विशाल है कि तुम्हारे द्वारा इस कार्यका होना मैं अद्भुत नहीं मानता। हमलोगोंपर तुम्हारा अनुराग बहुत अधिक है ।। ११८ ।।
संजय उवाच
अश्वत्थामानमुक्त्वैवं ततः सौबलमब्रवीत् । वृतं रथसहस्रेण हयानां रणशोभिनाम् ।। ११९ ।। **संजय कहते हैं—**राजन्! अश्वत्थामासे ऐसा कहकर दुर्योधन संग्राममें शोभा पानेवाले घोड़ोंसे युक्त एक हजार रथोंद्वारा घिरे हुए शकुनिसे इस प्रकार बोला— ।। ११९ ।। षष्ट्या रथसहस्रैश्च प्रयाहि त्वं धनंजयम् । कर्णश्च वृषसेनश्च कृपो नीलस्तथैव च ।। १२० ।। उदीच्याः कृतवर्मा च पुरुमित्रः सुतापनः । दुःशासनो निकुम्भश्च कुण्डभेदी पराक्रमः ।। १२१ ।। पुरंजयो दृढरथः पताकी हेमकम्पनः । शल्यारुणीन्द्रसेनाश्च संजयो विजयो जयः ।। १२२ ।। कमलाक्षः परक्राथी जयवर्मा सुदर्शनः । एते त्वामनुयास्यन्ति पत्तीनामयुतानि षट् ।। १२३ ।। 'मामा! तुम साठ हजार रथियोंकी सेना साथ लेकर अर्जुनपर आक्रमण करो। कर्ण, वृषसेन, कृपाचार्य, नील, उत्तर दिशाके सैनिक, कृतवर्मा, पुरुमित्र, सुतापन, दुःशासन, निकुम्भ, कुण्डभेदी, पराक्रमी, पुरंजय, दृढरथ, पताकी, हेमकम्पन, शल्य, आरुणि,
इन्द्रसेन, संजय, विजय, जय, कमलाक्ष, परक्राथी, जयवर्मा और सुदर्शन—ये सभी महारथी वीर तथा साठ हजार पैदल सैनिक तुम्हारे साथ जायँगे ॥ १२०—१२३ ॥
जहि भीमं यमौ चोभौ धर्मराजं च मातुल ।
असुरानिव देवेन्द्रो जयाशा मे त्वयि स्थिता ॥ १२४ ॥
‘मामा! जैसे देवराज इन्द्र असुरोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार तुम भीमसेन, नकुल, सहदेव तथा धर्मराज युधिष्ठिरका भी वध कर डालो। मेरी विजयकी आशा तुमपर ही अवलम्बित है ॥ १२४ ॥
दारितान् द्रौणिना बाणैर्भृशं विक्षतविग्रहान् ।
जहि मातुल कौन्तेयानसुरानिव पावकिः ॥ १२५ ॥
‘मातुल! द्रोणकुमार अश्वत्थामाने कुन्तीकुमारोंको अपने बाणोंद्वारा विदीर्ण कर डाला है; उनके शरीरोंको क्षत-विक्षत कर दिया है। इस अवस्थामें असुरोंका वध करनेवाले कुमार कार्तिकेयकी भाँति तुम कुन्तीपुत्रोंको मार डालो' ॥ १२५ ॥
एवमुक्तो ययौ शीघ्रं पुत्रेण तव सौबलः ।
पिप्रीषुस्ते सुतान् राजन् दिधक्षुश्चैव पाण्डवान् ॥ १२६ ॥
राजन्! आपके पुत्रके ऐसा कहनेपर सुबलपुत्र शकुनि आपके पुत्रोंको प्रसन्न करने तथा पाण्डवोंको दग्ध कर डालनेकी इच्छासे शीघ्र ही युद्धके लिये चल दिया ॥ १२६ ॥
अथ प्रवृत्ते युद्धं द्रौणिराक्षसयोर्मृधे ।
विभावर्यां सुतुमुलं शक्रप्रह्लादयोरिव ॥ १२७ ॥
तदनन्तर रणभूमिमें रात्रिके समय द्रोणकुमार अश्वत्थामा तथा राक्षस घटोत्कचका इन्द्र और प्रह्लादके समान अत्यन्त भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ ॥ १२७ ॥
ततो घटोत्कचो बाणैर्दशभिर्गौतमीसुतम् ।
जघानोरसि संक्रुद्धो विषाग्निप्रतिमैर्दृढैः ॥ १२८ ॥
उस समय घटोत्कचने अत्यन्त कुपित होकर विष और अग्निके समान भयंकर दस सुदृढ़ बाणोंद्वारा कृपीकुमार अश्वत्थामाकी छातीमें गहरा आघात किया ॥
स तैरभ्याहतो गाढं शरैर्भीमसुतेरितैः ।
चचाल रथमध्यस्थो वातोद्धत इव द्रुमः ॥ १२९ ॥
भीमपुत्र घटोत्कचके चलाये हुए उन बाणोंद्वारा गहरी चोट खाकर रथमें बैठा हुआ अश्वत्थामा वायुके झकझोरे हुए वृक्षके समान काँपने लगा ॥ १२९ ॥
भूयश्चाञ्जलिकेनाथ मार्गणेन महाप्रभम् ।
द्रौणिहस्तस्थितं चापं चिच्छेदाशु घटोत्कचः ॥ १३० ॥
इतनेहीमें घटोत्कचने पुनः अंजलिक नामक बाणसे अश्वत्थामाके हाथमें स्थित अत्यन्त कान्तिमान् धनुषको शीघ्रतापूर्वक काट डाला ॥ १३० ॥
ततोऽन्यद् द्रौणिरादाय धनुर्भारसहं महत् ।
ववर्ष विशिखांस्तीक्ष्णान् वारिधारा इवाम्बुदः ॥ १३१ ॥ तब द्रोणकुमार भार सहन करनेमें समर्थ दूसरा विशाल धनुष हाथमें लेकर, जैसे मेघ जलकी धारा बरसाता है, उसी प्रकार तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥
ततः शारद्वतीपुत्रः प्रेषयामास भारत । सुवर्णपुङ्खाञ्छत्रुघ्नान् खचरान् खचरं प्रति ॥ १३२ ॥ भारत! तदनन्तर गौतमीपुत्रने सुवर्णमय पंखवाले शत्रुनाशक आकाशचारी बाणोंको उस राक्षसपर चलाया ॥
तद् बाणैरर्दितं यूथं रक्षसां पीनवक्षसाम् । सिंहैरिव बभौ मत्तं गजानामाकुलं कुलम् ॥ १३३ ॥ उन बाणोंसे चौड़ी छातीवाले राक्षसोंका वह समूह अत्यन्त पीड़ित हो सिंहोंद्वारा व्याकुल किये गये मतवाले हाथियोंके झुंडके समान प्रतीत होने लगा ॥ १३३ ॥
विधम्य राक्षसान् बाणैः साश्वसूरथद्विपान् । ददाह भगवान् वह्निर्भूतानीव युगक्षये ॥ १३४ ॥ जैसे भगवान् अग्निदेव प्रलयकालमें सम्पूर्ण प्राणियोंको दग्ध कर देते हैं, उसी प्रकार अश्वत्थामाने अपने बाणोंद्वारा घोड़े, सारथि, रथ और हाथियोंसहित बहुत-से राक्षसोंको जलाकर भस्म कर दिया ॥ १३४ ॥
स दग्ध्वाक्षौहिणीं बाणैर्नैर्ऋतीं रुरुचे नृप । पुरेव त्रिपुरं दग्ध्वा दिवि देवो महेश्वरः ॥ १३५ ॥ नरेश्वर! जैसे भगवान् महेश्वर आकाशमें त्रिपुरको दग्ध करके सुशोभित हुए थे, उसी प्रकार राक्षसोंकी अक्षौहिणी सेनाको बाणोंद्वारा दग्ध करके अश्वत्थामा शोभा पाने लगा ॥ १३५ ॥
युगान्ते सर्वभूतानि दग्ध्वेव वसुरुल्बणः । रराज जयतां श्रेष्ठो द्रोणपुत्रस्तवाहितान् ॥ १३६ ॥ राजन्! विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ द्रोणपुत्र अश्वत्थामा प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंको भस्म कर देनेवाले संवर्तक अग्निके समान आपके शत्रुओंको दग्ध करके देदीप्यमान हो उठा ॥ १३६ ॥
ततो घटोत्कचः क्रुद्धो रक्षसां भीमकर्मणाम् । द्रौणिं हतेति महतीं चोदयामास तां चमूम् ॥ १३७ ॥ तब घटोत्कचने कुपित हो भयानक कर्म करनेवाले राक्षसोंकी उस विशाल सेनाको आदेश दिया, ‘अरे! अश्वत्थामाको मार डालो' ॥ १३७ ॥
घटोत्कचस्य तामाज्ञां प्रतिगृह्याथ राक्षसाः । दंष्ट्रोज्ज्वला महावक्त्रा घोररूपा भयानकाः ॥ १३८ ॥ व्यात्तानना घोरजिह्वाः क्रोधताम्रेक्षणा भृशम् ।
सिंहनादेन महता नादयन्तो वसुन्धराम् ॥ १३९ ॥
हन्तुमभ्यद्रवन् द्रौणिं नानाप्रहरणायुधाः ।
घटोत्कचकी उस आज्ञाको शिरोधार्य करके दाढ़ोंसे प्रकाशित, विशाल मुखवाले, घोर रूपधारी, फै ले मुँह और डरावनी जीभवाले भयानक राक्षस क्रोधसे लाल आँखें किये महान् सिंहनादसे पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते हुए हाथोंमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र ले अश्वत्थामाको मार डालनेके लिये उसपर टूट पड़े ॥ १३८-१३९½ ॥
शक्तीः शतघ्नीः परिघानशनीः शूलपट्टिशान् ॥ १४० ॥
खड्गान् गदा भिन्दिपालान् मुसलानि परश्वधान् ।
प्रासानसींस्तोमरांश्च कणपान् कम्पनान् शितान् ॥ १४१ ॥
स्थूलान् भुशुण्ड्यश्मगदाःस्थूणां कार्ष्णायसांस्तथा ।
मुद्गरांश्च महाघोरान् समरे शत्रुदारणान् ॥ १४२ ॥
द्रौणिमूर्धन्यसंत्रस्ता राक्षसा भीमविक्रमाः ।
चिक्षिपुः क्रोधताम्राक्षाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १४३ ॥
समरांगणमें किसीसे भी न डरनेवाले तथा क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले भयंकर पराक्रमी सैकड़ों और हजारों राक्षस अश्वत्थामाके मस्तकपर शक्ति, शतघ्नी, परिघ, अशनि, शूल, पट्टिश, खड्ग, गदा, भिन्दिपाल, मुसल, फरसे, प्रास, कटार, तोमर, कणप, तीखे कम्पन, मोटे-मोटे पत्थर, भुशुण्डी, गदा, काले लोहेके खंभे तथा शत्रुओंको विदीर्ण करनेमें समर्थ महाघोर मुद्गरोंकी वर्षा करने लगे ॥ १४०—१४३ ॥
तच्छस्त्रवर्षं सुमहद् द्रोणपुत्रस्य मूर्धनि ।
पतमानं समीक्ष्याथ योधास्ते व्यथिताभवन् ॥ १४४ ॥
द्रोणपुत्रके मस्तकपर अस्त्रोंकी वह बड़ी भारी वर्षा होती देख आपके समस्त सैनिक व्यथित हो उठे ॥
द्रोणपुत्रस्तु विक्रान्तस्तद् वर्षं घोरमुच्छ्रितम् ।
शरैर्विध्वंसयामास वज्रकल्पैः शिलाशितैः ॥ १४५ ॥
परंतु पराक्रमी द्रोणकुमारने शिलापर तेज किये हुए अपने वज्रोपम बाणोंद्वारा वहाँ प्रकट हुई उस भयंकर अस्त्र-वर्षाका विध्वंस कर डाला ॥ १४५ ॥
ततोऽन्यैर्विशिखैस्तूर्णं स्वर्णपुङ्खैर्महामनाः ।
निजघ्ने राक्षसान् द्रौणिर्दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितैः ॥ १४६ ॥
तत्पश्चात् महामनस्वी अश्वत्थामाने दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित सुवर्णमय पंखवाले अन्य बाणोंद्वारा तत्काल ही राक्षसोंको घायल कर दिया ॥ १४६ ॥
तद्बाणैरर्दितं यूथं रक्षसां पीनवक्षसाम् ।
सिंहैरिव बभौ मत्तं गजानामाकुलं कुलम् ॥ १४७ ॥
उन बाणोंसे चौड़ी छातीवाले राक्षसोंका समूह अत्यन्त पीड़ित हो सिंहोंद्वारा व्याकुल किये गये मतवाले हाथियोंके झुंडके समान प्रतीत होने लगा ।। १४७ ।।
ते राक्षसाः सुसंक्रुद्धा द्रोणपुत्रेण ताडिताः ।
क्रुद्धाः स्म प्राद्रवन् द्रौणिं जिघांसन्तो महाबलाः ।। १४८ ।।
द्रोणपुत्रकी मार खाकर, अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए महाबली राक्षस उसे मार डालनेकी इच्छासे रोषपूर्वक दौड़े ।।
तत्राद्भुतमिमं द्रौणिर्दर्शयामास विक्रमम् ।
अशक्यं कर्तुमन्येन सर्वभूतेषु भारत ।। १४९ ।।
भारत! वहाँ अश्वत्थामाने यह ऐसा अद्भुत पराक्रम दिखाया, जिसे समस्त प्राणियोंमें और किसीके लिये कर दिखाना असम्भव था ।। १४९ ।।
यदेको राक्षसीं सेनां क्षणाद् द्रौणिर्महास्त्रवित् ।
ददाह ज्वलितैर्बाणै राक्षसेन्द्रस्य पश्यतः ।। १५० ।।
क्योंकि महान् अस्त्रवेत्ता अश्वत्थामाने अकेले ही उस राक्षसी सेनाको राक्षसराज घटोत्कचके देखते-देखते अपने प्रज्वलित बाणोंद्वारा क्षणभरमें भस्म कर दिया ।। १५० ।।
स हत्वा राक्षसानीकं रराज द्रौणिराहवे ।
युगान्ते सर्वभूतानि संवर्तक इवानलः ।। १५१ ।।
जैसे प्रलयकालमें संवर्तक अग्नि समस्त प्राणियोंको दग्ध कर देती है, उसी प्रकार राक्षसोंकी उस सेनाका संहार करके युद्धस्थलमें अश्वत्थामाकी बड़ी शोभा हुई ।।
तं दहन्तमनीकानि शरैराशीविषोपमैः ।
तेषु राजसहस्रेषु पाण्डवेयेषु भारत ।। १५२ ।।
नैनं निरीक्षितुं कश्चिदशक्नोद् द्रौणिमाहवे ।
ऋते घटोत्कचाद् वीराद् राक्षसेन्द्रान्महाबलात् ।। १५३ ।।
भरतनन्दन! युद्धस्थलमें पाण्डवपक्षके सहस्रों राजाओंमेंसे वीर महाबली राक्षसराज घटोत्कचको छोड़कर दूसरा कोई भी विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाणोंद्वारा पाण्डवोंकी सेनाओंको दग्ध करते हुए अश्वत्थामाकी ओर देख न सका ।। १५२-१५३ ।।
स पुनर्भरतश्रेष्ठ क्रोधादुद्भ्रान्तलोचनः ।
तलं तलेन संहत्य संदश्य दशनच्छदम् ।। १५४ ।।
स्वं सूतमब्रवीत् क्रुद्धो द्रोणपुत्राय मां वह ।
भरतश्रेष्ठ! पुनः क्रोधसे घटोत्कचकी आँखें घूमने लगीं। उसने हाथ-से-हाथ मलकर ओठ चबा लिया और कुपित हो सारथिसे कहा—'सूत! तू मुझे द्रोणपुत्रके पास ले चल' ।। १५४ १/२ ।।
स ययौ घोररूपेण सुपताकेन भास्वता ।। १५५ ।।
द्वैरथं द्रोणपुत्रेण पुनरप्यरिसूदनः ।
शत्रुओंका संहार करनेवाला घटोत्कच सुन्दर पताकाओंसे सुशोभित, प्रकाशमान एवं भयंकर रथके द्वारा पुनः द्रोणपुत्रके साथ द्वैरथ युद्ध करनेके लिये गया ।।
स विनद्य महानादं सिंहवद् भीमविक्रमः ।। १५६ ।। चिक्षेपाविध्य संग्रामे द्रोणपुत्राय राक्षसः । अष्टघण्टां महाघोरामशनिं देवनिर्मिताम् ।। १५७ ।।
उस भयंकर पराक्रमी राक्षसने सिंहके समान बड़ी भारी गर्जना करके संग्राममें द्रोणपुत्रपर देवताओंद्वारा निर्मित तथा आठ घंटियोंसे सुशोभित एक महाभयंकर अशनि (वज्र) घुमाकर चलायी ।। १५६-१५७ ।।
तामवप्लुत्य जग्राह दौर्णिन्र्यस्य रथे धनुः । चिक्षेप चैनां तस्यैव स्यन्दनात् सोऽवपुप्लुवे ।। १५८ ।।
यह देख अश्वत्थामाने रथपर अपना धनुष रख उछलकर उस अशनिको पकड़ लिया और उसे घटोत्कचके ही रथपर दे मारा। घटोत्कच उस रथसे कूद पड़ा ।। १५८ ।।
साश्वसूतध्वजं यानं भस्म कृत्वा महाप्रभा । विवेश वसुधां भित्त्वा साशनिर्भृशदारुणा ।। १५९ ।।
वह अत्यन्त प्रकाशमान तथा परम दारुण अशनि घोड़े, सारथि और ध्वजसहित घटोत्कचके रथको भस्म करके पृथ्वीको छेदकर उसके भीतर समा गयी ।। १५९ ।।
द्रौणेस्तत् कर्म दृष्ट्वा तु सर्वभूतान्यपूजयन् । यदवप्लुत्य जग्राह घोरां शङ्करनिर्मिताम् ।। १६० ।।
अश्वत्थामाने भगवान् शंकरद्वारा निर्मित उस भयंकर अशनिको जो उछलकर पकड़ लिया, उसके उस कर्मको देखकर समस्त प्राणियोंने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ।। १६० ।।
धृष्टद्युम्नरथं गत्वा भैमसैनिस्ततो नृप । धनुर्घोरं समादाय महदिन्द्रायुधोपमम् । मुमोच निशितान् बाणान् पुनर्द्रोणेर्महोरसि ।। १६१ ।।
नरेश्वर! उस समय भीमसेनकुमारने धृष्टद्युम्नके रथपर आरूढ़ हो इन्द्रायुधके समान विशाल एवं घोर धनुष हाथमें लेकर अश्वत्थामाके विशाल वक्षःस्थलपर बहुत-से तीखे बाण मारे ।। १६१ ।।
धृष्टद्युम्नस्त्वसम्भ्रान्तो मुमोचाशीविषोपमान् । सुवर्णपुङ्खान् विशिखान् द्रोणपुत्रस्य वक्षसि ।। १६२ ।।
धृष्टद्युम्नने भी बिना किसी घबराहटके विषधर सर्पोंके समान सुवर्णमय पंखवाले बहुत-से बाण द्रोणपुत्रके वृक्षःस्थलपर छोड़े ।। १६२ ।।
ततो मुमोच नाराचान् द्रौणिस्तांश्च सहस्रशः । तावप्यग्निशिखप्रख्यैर्जघ्नतुस्तस्य मार्गणान् ।। १६३ ।।
तब अश्वत्थामाने भी उनपर सहस्रों नाराच चलाये। धृष्टद्युम्न और घटोत्कचने भी अग्निशिखाके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा अश्वत्थामाके नाराचोंको काट डाला ।। १६३ ।। अतितीव्रं महत् युद्धं तयोः पुरुषसिंहयोः । योधानां प्रीतिजननं द्रौणेश्च भरतर्षभ ।। १६४ ।। भरतश्रेष्ठ! उन दोनों पुरुषसिंहों तथा अश्वत्थामाका वह अत्यन्त उग्र और महान् युद्ध समस्त योद्धाओंका हर्ष बढ़ा रहा था ।। १६४ ।। ततो रथसहस्रेण द्विरदानां शतैस्त्रिभिः । षड्भिर्वाजिसहस्रैश्च भीमस्तं देशमागमत् ।। १६५ ।। तदनन्तर एक हजार रथ, तीन सौ हाथी और छः हजार घुड़सवारोंके साथ भीमसेन उस युद्धस्थलमें आये ।। ततो भीमात्मजं रक्षो धृष्टद्युम्नं च सानुगम् । अयोधयत धर्मात्मा द्रौणिरक्लिष्टविक्रमः ।। १६६ ।। उस समय अनायास ही पराक्रम प्रकट करनेवाला धर्मात्मा अश्वत्थामा भीमपुत्र राक्षस घटोत्कच तथा सेवकों-सहित धृष्टद्युम्नके साथ अकेला ही युद्ध कर रहा था ।। १६६ ।। तत्राद्भुततमं द्रौणिर्दर्शयामास विक्रमम् । अशक्यं कर्तुमन्येन सर्वभूतेषु भारत ।। १६७ ।। भारत! वहाँ द्रोणपुत्रने अत्यन्त अद्भुत पराक्रम दिखाया, जिसे कर दिखाना समस्त प्राणियोंमें दूसरेके लिये असम्भव था ।। १६७ ।। निमेषान्तरमात्रेण साश्वसूतरथद्विपाम् । अक्षौहिणीं राक्षसानां शितैर्बाणैरशातयत् ।। १६८ ।। उसने पलक मारते-मारते अपने पैने बाणोंसे घोड़े, सारथि, रथ और हाथियोंसहित राक्षसोंकी एक अक्षौहिणी सेनाका संहार कर दिया ।। १६८ ।। मिषतो भीमसेनस्य हैडिम्बेः पार्षतस्य च । यमयोर्धर्मपुत्रस्य विजयस्याच्युतस्य च ।। १६९ ।। भीमसेन, घटोत्कच, धृष्टद्युम्न, नकुल, सहदेव, धर्मपुत्र युधिष्ठिर, अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्णके देखते-देखते यह सब कुछ हो गया ।। १६९ ।। प्रगाढमज्जोगतिभिर्नाराचैरभिताडिताः । निपेतुर्द्विरदा भूमौ सशृङ्गा इव पर्वताः ।। १७० ।। शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़नेवाले नाराचोंकी गहरी चोट खाकर बहुत-से हाथी शिखरयुक्त पर्वतोंके समान धराशायी हो गये ।। १७० ।। निकृत्तैर्हस्तिहस्तैश्च विचलद्भिरितस्ततः । रराज वसुधा कीर्णा विसर्पद्भिरिवोरगैः ।। १७१ ।।
हाथियोंके शुण्ड कटकर इधर-उधर छटपटा रहे थे। उनसे ढकी हुई पृथ्वी रेंगते हुए सर्पोंसे आच्छादित हुई-सी शोभा पा रही थी ॥ १७१ ॥
क्षिप्तैः काञ्चनदण्डैश्च नृपच्छत्रैः क्षितिर्बभौ । द्यौरिवोदितचन्द्रार्का ग्रहाकीर्णा युगक्षये ॥ १७२ ॥
इधर-उधर गिरे हुए सुवर्णमय दण्डवाले राजाओंके छत्रोंसे छायी हुई यह पृथ्वी प्रलयकालमें उदित हुए सूर्य, चन्द्रमा तथा ग्रहन-क्षत्रोंसे परिपूर्ण आकाशके समान जान पड़ती थी ॥ १७२ ॥
प्रवृद्धध्वजमण्डूकां भेरीविस्तीर्णकच्छपाम् । छत्रहंसावलीजुष्टां फेनचामरमालिनीम् ॥ १७३ ॥ कङ्कगृध्रमहाग्राहां नैकायुधझषाकुलाम् । विस्तीर्णगजपाषाणां हताश्वमकराकुलाम् ॥ १७४ ॥ रथक्षिप्तमहावप्रां पताकारुचिरद्रुमाम् । शरमीनां महारौद्रां प्रासशक्त्यृष्टिदुण्डुभाम् ॥ १७५ ॥ मज्जामांसमहापङ्कां कबन्धावर्जितोडुपाम् । केशशैवलकल्माषां भीरूणां कश्मलावहाम् ॥ १७६ ॥ नागेन्द्रहययोधानां शरीरव्ययसम्भवाम् । शोणितौघमहाघोरां द्रौणिः प्रावर्तयन्नदीम् ॥ १७७ ॥ योधार्तरवनिर्घोषां क्षतजोर्मिसमाकुलाम् । श्वापदातिमहाघोरां यमराष्ट्रमहोदधिम् ॥ १७८ ॥
अश्वत्थामाने उस युद्धस्थलमें खूनकी नदी बहा दी, जो शोणितके प्रवाहसे अत्यन्त भयंकर प्रतीत होती थी, जिसमें कटकर गिरी हुई विशाल ध्वजाएँ मेढकोंके समान और रणभेरियाँ विशाल कछुओंके सदृश जान पड़ती थीं। राजाओंके श्वेत छत्र हंसोंकी श्रेणीके समान उस नदीका सेवन करते थे। चँवरसमूह फेनका भ्रम उत्पन्न करते थे। कंक और गीध ही बड़े-बड़े ग्राह-से जान पड़ते थे। अनेक प्रकारके आयुध वहाँ मछलियोंके समान भरे थे। विशाल हाथी शिलाखण्डोंके समान प्रतीत होते थे। मरे हुए घोड़े वहाँ मगरोंके समान व्याप्त थे। गिरे पड़े हुए रथ ऊँचे-ऊँचे टीलोंके समान जान पड़ते थे। पताकाएँ सुन्दर वृक्षोंके समान प्रतीत होती थीं। बाण ही मीन थे। देखनेमें वह बड़ी भयंकर थी। प्रास, शक्ति और ऋष्टि आदि अस्त्र डुण्डुभ सर्पके समान थे। मज्जा और मांस ही उस नदीमें महापंकके समान प्रतीत होते थे। तैरती हुई लाशें नौकाका भ्रम उत्पन्न करती थीं। केशरूपी सेवारोंसे वह रंग-बिरंगी दिखायी दे रही थी। वह कायरोंको मोह प्रदान करनेवाली थी। गजराजों, घोड़ों और योद्धाओंके शरीरोंका नाश होनेसे उस नदीका प्राकट्य हुआ था। योद्धाओंकी आर्तवाणी ही उसकी कलकल ध्वनि थी। उस नदीसे रक्तकी लहरें उठ रही थीं। हिंसक जन्तुओंके कारण
उसकी भयंकरता और भी बढ़ गयी थी। वह यमराजके राज्यरूपी महासागरमें मिलनेवाली थी ॥ १७३–१७८ ॥
निहत्य राक्षसान् बाणैर्द्रौणिर्हैडिम्बिमर्दयत् । पुनरप्यतिसंक्रुद्धः सवृकोदरपार्षतान् ॥ १७९ ॥ स नाराचगणैः पार्थान् द्रौणिर्विद्ध्वा महाबलः । जघान सुरथं नाम द्रुपदस्य सुतं विभुः ॥ १८० ॥
राक्षसोंका वध करके बाणोंद्वारा अश्वत्थामाने घटोत्कचको अत्यन्त पीड़ित कर दिया। फिर उस महाबली वीरने अत्यन्त कुपित होकर अपने नाराचोंसे भीमसेन और धृष्टद्युम्नसहित समस्त कुन्तीकुमारोंको घायल करके द्रुपदपुत्र सुरथको मार डाला ॥ १७९-१८० ॥
पुनः शत्रुंजयं नाम द्रुपदस्यात्मजं रणे । बलानीकं जयानीकं जयाश्वं चाभिजघ्निवान् ॥ १८१ ॥
तत्पश्चात् उसने रणक्षेत्रमें द्रुपदकुमार शत्रुंजय, बलानीक, जयानीक और जयाश्वको भी मार गिराया ॥
श्रुताह्वयं च राजानं द्रौणिर्निन्ये यमक्षयम् । त्रिभिश्चान्यैः शरैस्तीक्ष्णैः सुपुङ्खैर्हेममालिनम् ॥ १८२ ॥ जघान स पृषध्रं च चन्द्रसेनं च मारिष । कुन्तिभोजसुतांश्चासौ दशभिर्दश जघ्निवान् ॥ १८३ ॥
आर्य! इसके बाद द्रोणकुमारने राजा श्रुताह्वको भी यमलोक पहुँचा दिया। फिर दूसरे तीन तीखे और सुन्दर पंखवाले बाणोंद्वारा हेममाली, पृषध्र और चन्द्रसेन-का भी वध कर डाला। तदनन्तर दस बाणोंसे उसने राजा कुन्तिभोजके दस पुत्रोंको कालके गालमें डाल दिया ॥ १८२-१८३ ॥
अश्वत्थामा सुसंक्रुद्धः संधायोग्रमजिह्मगम् । मुमोचाकर्णपूर्णेन धनुषा शरमुत्तमम् ॥ १८४ ॥ यमदण्डोपमं घोरमुद्दिश्याशु घटोत्कचम् ।
इसके बाद अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए अश्वत्थामाने एक सीधे जानेवाले अत्यन्त भयंकर एवं उत्तम बाणका संधान करके धनुषको कानतक खींचकर उसे शीघ्र ही घटोत्कचको लक्ष्य करके छोड़ दिया। वह बाण घोर यमदण्डके समान था ॥ १८४ १/२ ॥
स भित्त्वा हृदयं तस्य राक्षसस्य महाशरः ॥ १८५ ॥ विवेश वसुधां शीघ्रं सुपुङ्खः पृथिवीपते ।
पृथ्वीपते! वह सुन्दर पंखोंवाला महाबाण उस राक्षसका हृदय विदीर्ण करके शीघ्र ही पृथ्वीमें समा गया ॥
तं हतं पतितं ज्ञात्वा धृष्टद्युम्नो महारथः ॥ १८६ ॥
द्रौणेः सकाशाद् राजेन्द्र व्यपनिन्ये रथोत्तमम् । राजेन्द्र! घटोत्कचको मरकर गिरा हुआ जान महारथी धृष्टद्युम्नने अपने उत्तम रथको अश्वत्थामाके पाससे हटा लिया ॥ १८६ १/२ ॥
ततः पराङ्मुखनृपं सैन्यं यौधिष्ठिरं नृप ॥ १८७ ॥ पराजित्य रणे वीरो द्रोणपुत्रो ननाद ह । पूजितः सर्वभूतेषु तव पुत्रैश्च भारत ॥ १८८ ॥ नरेश्वर! फिर तो युधिष्ठिरकी सेनाके सभी नरेश युद्धसे विमुख हो गये। उस सेनाको परास्त करके वीर द्रोणपुत्र रणभूमिमें गर्जना करने लगा। भारत! उस समय सम्पूर्ण प्राणियोंमें अश्वत्थामाका बड़ा समादर हुआ। आपके पुत्रोंने भी उसका बड़ा सम्मान किया ॥ १८७-१८८ ॥
अथ शरशतभिन्नकृत्तदेहै- र्हतपतितैः क्षणदाचरैः समन्तात् । निधनमुपगतैर्मही कृताभूद् गिरिशिखरैरिव दुर्गमातिरौद्रा ॥ १८९ ॥ तदनन्तर सैकड़ों बाणोंसे शरीर छिन्न-भिन्न हो जानेके कारण मरकर गिरे और मृत्युको प्राप्त हुए निशाचरोंकी लाशोंसे पटी हुई चारों ओरकी भूमि पर्वतशिखरोंसे आच्छादित हुई-सी अत्यन्त भयंकर और दुर्गम प्रतीत होने लगी ॥ १८९ ॥
तं सिद्धगन्धर्वपिशाचसंघा नागाः सुपर्णाः पितरो वयांसि । रक्षोगणा भूतगणाश्च द्रौणि- मपूजयन्नप्सरसः सुराश्च ॥ १९० ॥ उस समय वहाँ सिद्धों, गन्धर्वों, पिशाचों, नागों, सुपर्णों, पितरों, पक्षियों, राक्षसों, भूतों, अप्सराओं तथा देवताओंने भी द्रोणपुत्र अश्वत्थामाकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ १९० ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५६ ॥
* भूमि नापनेका एक नाप जो चार सौ हाथका होता है।
१५७-
सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
सोमदत्तकी मूर्च्छा, भीमके द्वारा बाह्लीकका वध, धृतराष्ट्रके दस पुत्रों और शकुनिके सात रथियों एवं पाँच भाइयोंका संहार तथा द्रोणाचार्य और युधिष्ठिरके युद्धमें युधिष्ठिरकी विजय
संजय उवाच
द्रुपदस्यात्मजान् दृष्ट्वा कुन्तिभोजसुतांस्तथा ।
द्रोणपुत्रेण निहतान् राक्षसांश्च सहस्रशः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरो भीमसेनो धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।
युयुधानश्च संयत्ता युद्धायैव मनो दधुः ॥ २ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके द्वारा द्रुपद और कुन्तिभोजके पुत्रों तथा सहस्रों राक्षसोंको मारा गया देख युधिष्ठिर, भीमसेन, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न तथा युयुधानने भी सावधान होकर युद्धमें ही मन लगाया ॥ १-२ ॥
सोमदत्तः पुनः क्रुद्धो दृष्ट्वा सात्यकिमाहवे ।
महता शरवर्षेणच्छादयामास भारत ॥ ३ ॥
भारत! युद्धस्थलमें सात्यकिको देखकर सोमदत्त पुनः कुपित हो उठे और उन्होंने बड़ी भारी बाण-वर्षा करके सात्यकिको आच्छादित कर दिया ॥ ३ ॥
ततः समभवद् युद्धमतीव भयवर्धनम् ।
त्वदीयानां परेषां च घोरं विजयकाङ्क्षिणाम् ॥ ४ ॥
फिर तो विजयकी अभिलाषा रखनेवाले आपके और शत्रुपक्षके सैनिकोंमें अत्यन्त भयंकर घोर युद्ध छिड़ गया ॥ ४ ॥
तं दृष्ट्वा समुपायान्तं रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः ।
दशभिः सात्वतस्यार्थे भीमो विव्याध सायकैः ॥ ५ ॥
सोमदत्तको आते देख भीमसेनने सात्यकिकी सहायताके लिये शिलापर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले दस बाणोंद्वारा उन्हें घायल कर दिया ॥ ५ ॥
सोमदत्तोऽपि तं वीरं शतेन प्रत्यविध्यत ।
सात्वतस्त्वभिसंक्रुद्धः पुत्राधिभिरभिप्लुतम् ॥ ६ ॥
वृद्धं वृद्धगुणैर्युक्तं ययातिमिव नाहुषम् ।
विव्याध दशभिस्तीक्ष्णैः शरैर्वज्रनिपातनैः ॥ ७ ॥
सोमदत्तने भी वीर भीमसेनको सौ बाणोंसे वेधकर बदला चुकाया। इधर सात्यकिने भी अत्यन्त कुपित हो पुत्रशोकमें डूबे हुए, नहुषनन्दन ययातिकी भाँति वृद्धताके गुणोंसे युक्त बूढ़े सोमदत्तको वज्रको भी मार गिरानेवाले दस तीखे बाणोंसे बींध डाला ॥ ६-७ ॥ शक्त्या चैनं विनिर्भिद्य पुनर्विव्याध सप्तभिः । ततस्तु सात्यकेरथें भीमसेनो नवं दृढम् ॥ ८ ॥ मुमोच परिघं घोरं सोमदत्तस्य मूर्धनि । फिर शक्तिसे इन्हें विदीर्ण करके सात बाणोंद्वारा पुनः गहरी चोट पहुँचायी। तत्पश्चात् सात्यकिके लिये भीमसेनने सोमदत्तके मस्तकपर नूतन, सुदृढ़ एवं भयंकर परिघका प्रहार किया ॥ ८½ ॥ सात्वतोप्यग्निसंकाशं मुमोच शरमुत्तमम् ॥ ९ ॥ सोमदत्तोरसि क्रुद्धः सुपत्त्रं निशितं युधि । इसी समय सात्यकिने भी युद्धस्थलमें कुपित हो सोमदत्तकी छातीपर सुन्दर पंखवाले, अग्निके समान तेजस्वी, उत्तम और तीखे बाणका प्रहार किया ॥ ९½ ॥ युगपत् पेततुर्वीरौ घोरौ परिघमार्गणौ ॥ १० ॥ शरीरे सोमदत्तस्य स पपात महारथः । वे भयंकर परिघ और बाण वीर सोमदत्तके शरीरपर एक ही साथ गिरे। इससे महारथी सोमदत्त मूर्च्छित होकर गिर पड़े ॥ १०½ ॥ व्यामोहिते तु तनये बाह्लीकस्तमुपाद्रवत् ॥ ११ ॥ विसृजन् शरवर्षाणि कालवर्षीव तोयदः । अपने पुत्रके मूर्च्छित होनेपर बाह्लीकने वर्षाऋतुमें वर्षा करनेवाले मेघके समान बाणोंकी वृष्टि करते हुए वहाँ सात्यकिपर धावा किया ॥ ११½ ॥ भीमोऽथ सात्वतस्यार्थे बाह्लीकं नवभिः शरैः ॥ १२ ॥ प्रपीडयन् महात्मानं विव्याध रणमूर्धनि । भीमसेनने सात्यकिके लिये महात्मा बाह्लीकको पीड़ित करते हुए युद्धके मुहानेपर उन्हें नौ बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १२½ ॥ प्रातिपेयस्तु संक्रुद्धः शक्तिं भीमस्य वक्षसि ॥ १३ ॥ निचखान महाबाहुः पुरंदर इवाशनिम् । तब महाबाहु प्रतीपपुत्र बाह्लीकने अत्यन्त कुपित हो भीमसेनकी छातीमें अपनी शक्ति धँसा दी, मानो देवराज इन्द्रने किसी पर्वतपर वज्र मारा हो ॥ १३½ ॥ स तथाभिहतो भीमश्चकम्पे च मुमोह च ॥ १४ ॥ प्राप्य चेतश्च बलवान् गदामस्मै ससर्ज ह ।
इस प्रकार शक्तिसे आहत होकर भीमसेन काँप उठे और मूर्च्छित हो गये। फिर सचेत होनेपर बलवान् भीमने उनपर गदाका प्रहार किया ।। १४ १/२ ।। सा पाण्डवेन प्रहिता बाह्लीकस्य शिरोऽहरत् ।। १५ ।। स पपात हतः पृथ्व्यां वज्राहत इवाद्रिराट् । पाण्डुपुत्र भीमसेनद्वारा चलायी हुई उस गदाने बाह्लीकका सिर उड़ा दिया। वे वज्रके मारे हुए पर्वतराजकी भाँति मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े ।। १५ १/२ ।। तस्मिन् विनिहते वीरे बाह्लीके पुरुषर्षभ ।। १६ ।। पुत्रास्तेऽभ्यर्दयन् भीमं दश दाशरथेः समाः । नरश्रेष्ठ! वीर बाह्लीकके मारे जानेपर श्रीरामचन्द्रजीके समान पराक्रमी आपके दस पुत्र भीमसेनको पीड़ा देने लगे ।। १६ १/२ ।। नागदत्तो दृढरथो महाबाहुरयोभुजः ।। १७ ।। दृढः सुहस्तो विरजाः प्रमाथ्युग्रोऽनुयाय्यपि । उनके नाम इस प्रकार हैं—नागदत्त, दृढरथ (दृढरथाश्रय), महाबाहु, अयोभुज (अयोबाहु), दृढ (दृढक्षत्र), सुहस्त, विरजा, प्रमाथी, उग्र (उग्रश्रवा) और अनुयायी (अग्रयायी) ।। १७ १/२ ।। तान् दृष्ट्वा चुक्रुधे भीमो जगृहे भारसाधनान् ।। १८ ।। एकमेकं समुद्दिश्य पातयामास मर्मसु । उनको सामने देखकर भीमसेन कुपित हो उठे। उन्होंने प्रत्येकके लिये एक-एक करके भारसाधनमें समर्थ दस बाण हाथमें लिये और उन्हें उनके मर्मस्थानोंपर चलाया ।। १८ १/२ ।। ते विद्धा व्यसवः पेतुः स्यन्दनेभ्यो हतौजसः ।। १९ ।। चण्डवातप्रभग्नास्तु पर्वताग्रान्महीरुहाः । उन बाणोंसे घायल होकर आपके पुत्र अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे और पर्वतशिखरसे प्रचण्ड वायुद्वारा उखाड़े हुए वृक्षोंके समान तेजोहीन होकर रथोंसे नीचे गिर पड़े ।। १९ १/२ ।। नाराचैर्दशभिर्भीमस्तान् निहत्य तवात्मजान् ।। २० ।। कर्णस्य दयितं पुत्रं वृषसेनमावाकिरत् । आपके उन पुत्रोंको दस नाराचोंद्वारा मारकर भीमसेनने कर्णके प्यारे पुत्र वृषसेनपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।। २० १/२ ।। ततो वृकरथो नाम भ्राता कर्णस्य विश्रुतः ।। २१ ।। जघान भीमं नाराचैस्तमप्यभ्यद्रवद् बली । तदनन्तर कर्णके सुविख्यात बलवान् भ्राता वृकरथने आकर भीमसेनपर भी आक्रमण किया और उन्हें नाराचोंद्वारा घायल कर दिया ।। २१ १/२ ।।