भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1153

उसकी भयंकरता और भी बढ़ गयी थी। वह यमराजके राज्यरूपी महासागरमें मिलनेवाली थी ॥ १७३–१७८ ॥

निहत्य राक्षसान् बाणैर्द्रौणिर्हैडिम्बिमर्दयत् । पुनरप्यतिसंक्रुद्धः सवृकोदरपार्षतान् ॥ १७९ ॥ स नाराचगणैः पार्थान् द्रौणिर्विद्ध्वा महाबलः । जघान सुरथं नाम द्रुपदस्य सुतं विभुः ॥ १८० ॥

राक्षसोंका वध करके बाणोंद्वारा अश्वत्थामाने घटोत्कचको अत्यन्त पीड़ित कर दिया। फिर उस महाबली वीरने अत्यन्त कुपित होकर अपने नाराचोंसे भीमसेन और धृष्टद्युम्नसहित समस्त कुन्तीकुमारोंको घायल करके द्रुपदपुत्र सुरथको मार डाला ॥ १७९-१८० ॥

पुनः शत्रुंजयं नाम द्रुपदस्यात्मजं रणे । बलानीकं जयानीकं जयाश्वं चाभिजघ्निवान् ॥ १८१ ॥

तत्पश्चात् उसने रणक्षेत्रमें द्रुपदकुमार शत्रुंजय, बलानीक, जयानीक और जयाश्वको भी मार गिराया ॥

श्रुताह्वयं च राजानं द्रौणिर्निन्ये यमक्षयम् । त्रिभिश्चान्यैः शरैस्तीक्ष्णैः सुपुङ्खैर्हेममालिनम् ॥ १८२ ॥ जघान स पृषध्रं च चन्द्रसेनं च मारिष । कुन्तिभोजसुतांश्चासौ दशभिर्दश जघ्निवान् ॥ १८३ ॥

आर्य! इसके बाद द्रोणकुमारने राजा श्रुताह्वको भी यमलोक पहुँचा दिया। फिर दूसरे तीन तीखे और सुन्दर पंखवाले बाणोंद्वारा हेममाली, पृषध्र और चन्द्रसेन-का भी वध कर डाला। तदनन्तर दस बाणोंसे उसने राजा कुन्तिभोजके दस पुत्रोंको कालके गालमें डाल दिया ॥ १८२-१८३ ॥

अश्वत्थामा सुसंक्रुद्धः संधायोग्रमजिह्मगम् । मुमोचाकर्णपूर्णेन धनुषा शरमुत्तमम् ॥ १८४ ॥ यमदण्डोपमं घोरमुद्दिश्याशु घटोत्कचम् ।

इसके बाद अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए अश्वत्थामाने एक सीधे जानेवाले अत्यन्त भयंकर एवं उत्तम बाणका संधान करके धनुषको कानतक खींचकर उसे शीघ्र ही घटोत्कचको लक्ष्य करके छोड़ दिया। वह बाण घोर यमदण्डके समान था ॥ १८४ १/२ ॥

स भित्त्वा हृदयं तस्य राक्षसस्य महाशरः ॥ १८५ ॥ विवेश वसुधां शीघ्रं सुपुङ्खः पृथिवीपते ।

पृथ्वीपते! वह सुन्दर पंखोंवाला महाबाण उस राक्षसका हृदय विदीर्ण करके शीघ्र ही पृथ्वीमें समा गया ॥

तं हतं पतितं ज्ञात्वा धृष्टद्युम्नो महारथः ॥ १८६ ॥