महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1154, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्रौणेः सकाशाद् राजेन्द्र व्यपनिन्ये रथोत्तमम् । राजेन्द्र! घटोत्कचको मरकर गिरा हुआ जान महारथी धृष्टद्युम्नने अपने उत्तम रथको अश्वत्थामाके पाससे हटा लिया ॥ १८६ १/२ ॥
ततः पराङ्मुखनृपं सैन्यं यौधिष्ठिरं नृप ॥ १८७ ॥ पराजित्य रणे वीरो द्रोणपुत्रो ननाद ह । पूजितः सर्वभूतेषु तव पुत्रैश्च भारत ॥ १८८ ॥ नरेश्वर! फिर तो युधिष्ठिरकी सेनाके सभी नरेश युद्धसे विमुख हो गये। उस सेनाको परास्त करके वीर द्रोणपुत्र रणभूमिमें गर्जना करने लगा। भारत! उस समय सम्पूर्ण प्राणियोंमें अश्वत्थामाका बड़ा समादर हुआ। आपके पुत्रोंने भी उसका बड़ा सम्मान किया ॥ १८७-१८८ ॥
अथ शरशतभिन्नकृत्तदेहै- र्हतपतितैः क्षणदाचरैः समन्तात् । निधनमुपगतैर्मही कृताभूद् गिरिशिखरैरिव दुर्गमातिरौद्रा ॥ १८९ ॥ तदनन्तर सैकड़ों बाणोंसे शरीर छिन्न-भिन्न हो जानेके कारण मरकर गिरे और मृत्युको प्राप्त हुए निशाचरोंकी लाशोंसे पटी हुई चारों ओरकी भूमि पर्वतशिखरोंसे आच्छादित हुई-सी अत्यन्त भयंकर और दुर्गम प्रतीत होने लगी ॥ १८९ ॥
तं सिद्धगन्धर्वपिशाचसंघा नागाः सुपर्णाः पितरो वयांसि । रक्षोगणा भूतगणाश्च द्रौणि- मपूजयन्नप्सरसः सुराश्च ॥ १९० ॥ उस समय वहाँ सिद्धों, गन्धर्वों, पिशाचों, नागों, सुपर्णों, पितरों, पक्षियों, राक्षसों, भूतों, अप्सराओं तथा देवताओंने भी द्रोणपुत्र अश्वत्थामाकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ १९० ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५६ ॥
* भूमि नापनेका एक नाप जो चार सौ हाथका होता है।