भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1151

तब अश्वत्थामाने भी उनपर सहस्रों नाराच चलाये। धृष्टद्युम्न और घटोत्कचने भी अग्निशिखाके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा अश्वत्थामाके नाराचोंको काट डाला ।। १६३ ।। अतितीव्रं महत् युद्धं तयोः पुरुषसिंहयोः । योधानां प्रीतिजननं द्रौणेश्च भरतर्षभ ।। १६४ ।। भरतश्रेष्ठ! उन दोनों पुरुषसिंहों तथा अश्वत्थामाका वह अत्यन्त उग्र और महान् युद्ध समस्त योद्धाओंका हर्ष बढ़ा रहा था ।। १६४ ।। ततो रथसहस्रेण द्विरदानां शतैस्त्रिभिः । षड्भिर्वाजिसहस्रैश्च भीमस्तं देशमागमत् ।। १६५ ।। तदनन्तर एक हजार रथ, तीन सौ हाथी और छः हजार घुड़सवारोंके साथ भीमसेन उस युद्धस्थलमें आये ।। ततो भीमात्मजं रक्षो धृष्टद्युम्नं च सानुगम् । अयोधयत धर्मात्मा द्रौणिरक्लिष्टविक्रमः ।। १६६ ।। उस समय अनायास ही पराक्रम प्रकट करनेवाला धर्मात्मा अश्वत्थामा भीमपुत्र राक्षस घटोत्कच तथा सेवकों-सहित धृष्टद्युम्नके साथ अकेला ही युद्ध कर रहा था ।। १६६ ।। तत्राद्भुततमं द्रौणिर्दर्शयामास विक्रमम् । अशक्यं कर्तुमन्येन सर्वभूतेषु भारत ।। १६७ ।। भारत! वहाँ द्रोणपुत्रने अत्यन्त अद्भुत पराक्रम दिखाया, जिसे कर दिखाना समस्त प्राणियोंमें दूसरेके लिये असम्भव था ।। १६७ ।। निमेषान्तरमात्रेण साश्वसूतरथद्विपाम् । अक्षौहिणीं राक्षसानां शितैर्बाणैरशातयत् ।। १६८ ।। उसने पलक मारते-मारते अपने पैने बाणोंसे घोड़े, सारथि, रथ और हाथियोंसहित राक्षसोंकी एक अक्षौहिणी सेनाका संहार कर दिया ।। १६८ ।। मिषतो भीमसेनस्य हैडिम्बेः पार्षतस्य च । यमयोर्धर्मपुत्रस्य विजयस्याच्युतस्य च ।। १६९ ।। भीमसेन, घटोत्कच, धृष्टद्युम्न, नकुल, सहदेव, धर्मपुत्र युधिष्ठिर, अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्णके देखते-देखते यह सब कुछ हो गया ।। १६९ ।। प्रगाढमज्जोगतिभिर्नाराचैरभिताडिताः । निपेतुर्द्विरदा भूमौ सशृङ्गा इव पर्वताः ।। १७० ।। शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़नेवाले नाराचोंकी गहरी चोट खाकर बहुत-से हाथी शिखरयुक्त पर्वतोंके समान धराशायी हो गये ।। १७० ।। निकृत्तैर्हस्तिहस्तैश्च विचलद्भिरितस्ततः । रराज वसुधा कीर्णा विसर्पद्भिरिवोरगैः ।। १७१ ।।