महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशत्रुओंका संहार करनेवाला घटोत्कच सुन्दर पताकाओंसे सुशोभित, प्रकाशमान एवं भयंकर रथके द्वारा पुनः द्रोणपुत्रके साथ द्वैरथ युद्ध करनेके लिये गया ।।
स विनद्य महानादं सिंहवद् भीमविक्रमः ।। १५६ ।। चिक्षेपाविध्य संग्रामे द्रोणपुत्राय राक्षसः । अष्टघण्टां महाघोरामशनिं देवनिर्मिताम् ।। १५७ ।।
उस भयंकर पराक्रमी राक्षसने सिंहके समान बड़ी भारी गर्जना करके संग्राममें द्रोणपुत्रपर देवताओंद्वारा निर्मित तथा आठ घंटियोंसे सुशोभित एक महाभयंकर अशनि (वज्र) घुमाकर चलायी ।। १५६-१५७ ।।
तामवप्लुत्य जग्राह दौर्णिन्र्यस्य रथे धनुः । चिक्षेप चैनां तस्यैव स्यन्दनात् सोऽवपुप्लुवे ।। १५८ ।।
यह देख अश्वत्थामाने रथपर अपना धनुष रख उछलकर उस अशनिको पकड़ लिया और उसे घटोत्कचके ही रथपर दे मारा। घटोत्कच उस रथसे कूद पड़ा ।। १५८ ।।
साश्वसूतध्वजं यानं भस्म कृत्वा महाप्रभा । विवेश वसुधां भित्त्वा साशनिर्भृशदारुणा ।। १५९ ।।
वह अत्यन्त प्रकाशमान तथा परम दारुण अशनि घोड़े, सारथि और ध्वजसहित घटोत्कचके रथको भस्म करके पृथ्वीको छेदकर उसके भीतर समा गयी ।। १५९ ।।
द्रौणेस्तत् कर्म दृष्ट्वा तु सर्वभूतान्यपूजयन् । यदवप्लुत्य जग्राह घोरां शङ्करनिर्मिताम् ।। १६० ।।
अश्वत्थामाने भगवान् शंकरद्वारा निर्मित उस भयंकर अशनिको जो उछलकर पकड़ लिया, उसके उस कर्मको देखकर समस्त प्राणियोंने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ।। १६० ।।
धृष्टद्युम्नरथं गत्वा भैमसैनिस्ततो नृप । धनुर्घोरं समादाय महदिन्द्रायुधोपमम् । मुमोच निशितान् बाणान् पुनर्द्रोणेर्महोरसि ।। १६१ ।।
नरेश्वर! उस समय भीमसेनकुमारने धृष्टद्युम्नके रथपर आरूढ़ हो इन्द्रायुधके समान विशाल एवं घोर धनुष हाथमें लेकर अश्वत्थामाके विशाल वक्षःस्थलपर बहुत-से तीखे बाण मारे ।। १६१ ।।
धृष्टद्युम्नस्त्वसम्भ्रान्तो मुमोचाशीविषोपमान् । सुवर्णपुङ्खान् विशिखान् द्रोणपुत्रस्य वक्षसि ।। १६२ ।।
धृष्टद्युम्नने भी बिना किसी घबराहटके विषधर सर्पोंके समान सुवर्णमय पंखवाले बहुत-से बाण द्रोणपुत्रके वृक्षःस्थलपर छोड़े ।। १६२ ।।
ततो मुमोच नाराचान् द्रौणिस्तांश्च सहस्रशः । तावप्यग्निशिखप्रख्यैर्जघ्नतुस्तस्य मार्गणान् ।। १६३ ।।