महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउन बाणोंसे चौड़ी छातीवाले राक्षसोंका समूह अत्यन्त पीड़ित हो सिंहोंद्वारा व्याकुल किये गये मतवाले हाथियोंके झुंडके समान प्रतीत होने लगा ।। १४७ ।।
ते राक्षसाः सुसंक्रुद्धा द्रोणपुत्रेण ताडिताः ।
क्रुद्धाः स्म प्राद्रवन् द्रौणिं जिघांसन्तो महाबलाः ।। १४८ ।।
द्रोणपुत्रकी मार खाकर, अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए महाबली राक्षस उसे मार डालनेकी इच्छासे रोषपूर्वक दौड़े ।।
तत्राद्भुतमिमं द्रौणिर्दर्शयामास विक्रमम् ।
अशक्यं कर्तुमन्येन सर्वभूतेषु भारत ।। १४९ ।।
भारत! वहाँ अश्वत्थामाने यह ऐसा अद्भुत पराक्रम दिखाया, जिसे समस्त प्राणियोंमें और किसीके लिये कर दिखाना असम्भव था ।। १४९ ।।
यदेको राक्षसीं सेनां क्षणाद् द्रौणिर्महास्त्रवित् ।
ददाह ज्वलितैर्बाणै राक्षसेन्द्रस्य पश्यतः ।। १५० ।।
क्योंकि महान् अस्त्रवेत्ता अश्वत्थामाने अकेले ही उस राक्षसी सेनाको राक्षसराज घटोत्कचके देखते-देखते अपने प्रज्वलित बाणोंद्वारा क्षणभरमें भस्म कर दिया ।। १५० ।।
स हत्वा राक्षसानीकं रराज द्रौणिराहवे ।
युगान्ते सर्वभूतानि संवर्तक इवानलः ।। १५१ ।।
जैसे प्रलयकालमें संवर्तक अग्नि समस्त प्राणियोंको दग्ध कर देती है, उसी प्रकार राक्षसोंकी उस सेनाका संहार करके युद्धस्थलमें अश्वत्थामाकी बड़ी शोभा हुई ।।
तं दहन्तमनीकानि शरैराशीविषोपमैः ।
तेषु राजसहस्रेषु पाण्डवेयेषु भारत ।। १५२ ।।
नैनं निरीक्षितुं कश्चिदशक्नोद् द्रौणिमाहवे ।
ऋते घटोत्कचाद् वीराद् राक्षसेन्द्रान्महाबलात् ।। १५३ ।।
भरतनन्दन! युद्धस्थलमें पाण्डवपक्षके सहस्रों राजाओंमेंसे वीर महाबली राक्षसराज घटोत्कचको छोड़कर दूसरा कोई भी विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाणोंद्वारा पाण्डवोंकी सेनाओंको दग्ध करते हुए अश्वत्थामाकी ओर देख न सका ।। १५२-१५३ ।।
स पुनर्भरतश्रेष्ठ क्रोधादुद्भ्रान्तलोचनः ।
तलं तलेन संहत्य संदश्य दशनच्छदम् ।। १५४ ।।
स्वं सूतमब्रवीत् क्रुद्धो द्रोणपुत्राय मां वह ।
भरतश्रेष्ठ! पुनः क्रोधसे घटोत्कचकी आँखें घूमने लगीं। उसने हाथ-से-हाथ मलकर ओठ चबा लिया और कुपित हो सारथिसे कहा—'सूत! तू मुझे द्रोणपुत्रके पास ले चल' ।। १५४ १/२ ।।
स ययौ घोररूपेण सुपताकेन भास्वता ।। १५५ ।।
द्वैरथं द्रोणपुत्रेण पुनरप्यरिसूदनः ।