महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1148, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसिंहनादेन महता नादयन्तो वसुन्धराम् ॥ १३९ ॥
हन्तुमभ्यद्रवन् द्रौणिं नानाप्रहरणायुधाः ।
घटोत्कचकी उस आज्ञाको शिरोधार्य करके दाढ़ोंसे प्रकाशित, विशाल मुखवाले, घोर रूपधारी, फै ले मुँह और डरावनी जीभवाले भयानक राक्षस क्रोधसे लाल आँखें किये महान् सिंहनादसे पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते हुए हाथोंमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र ले अश्वत्थामाको मार डालनेके लिये उसपर टूट पड़े ॥ १३८-१३९½ ॥
शक्तीः शतघ्नीः परिघानशनीः शूलपट्टिशान् ॥ १४० ॥
खड्गान् गदा भिन्दिपालान् मुसलानि परश्वधान् ।
प्रासानसींस्तोमरांश्च कणपान् कम्पनान् शितान् ॥ १४१ ॥
स्थूलान् भुशुण्ड्यश्मगदाःस्थूणां कार्ष्णायसांस्तथा ।
मुद्गरांश्च महाघोरान् समरे शत्रुदारणान् ॥ १४२ ॥
द्रौणिमूर्धन्यसंत्रस्ता राक्षसा भीमविक्रमाः ।
चिक्षिपुः क्रोधताम्राक्षाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १४३ ॥
समरांगणमें किसीसे भी न डरनेवाले तथा क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले भयंकर पराक्रमी सैकड़ों और हजारों राक्षस अश्वत्थामाके मस्तकपर शक्ति, शतघ्नी, परिघ, अशनि, शूल, पट्टिश, खड्ग, गदा, भिन्दिपाल, मुसल, फरसे, प्रास, कटार, तोमर, कणप, तीखे कम्पन, मोटे-मोटे पत्थर, भुशुण्डी, गदा, काले लोहेके खंभे तथा शत्रुओंको विदीर्ण करनेमें समर्थ महाघोर मुद्गरोंकी वर्षा करने लगे ॥ १४०—१४३ ॥
तच्छस्त्रवर्षं सुमहद् द्रोणपुत्रस्य मूर्धनि ।
पतमानं समीक्ष्याथ योधास्ते व्यथिताभवन् ॥ १४४ ॥
द्रोणपुत्रके मस्तकपर अस्त्रोंकी वह बड़ी भारी वर्षा होती देख आपके समस्त सैनिक व्यथित हो उठे ॥
द्रोणपुत्रस्तु विक्रान्तस्तद् वर्षं घोरमुच्छ्रितम् ।
शरैर्विध्वंसयामास वज्रकल्पैः शिलाशितैः ॥ १४५ ॥
परंतु पराक्रमी द्रोणकुमारने शिलापर तेज किये हुए अपने वज्रोपम बाणोंद्वारा वहाँ प्रकट हुई उस भयंकर अस्त्र-वर्षाका विध्वंस कर डाला ॥ १४५ ॥
ततोऽन्यैर्विशिखैस्तूर्णं स्वर्णपुङ्खैर्महामनाः ।
निजघ्ने राक्षसान् द्रौणिर्दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितैः ॥ १४६ ॥
तत्पश्चात् महामनस्वी अश्वत्थामाने दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित सुवर्णमय पंखवाले अन्य बाणोंद्वारा तत्काल ही राक्षसोंको घायल कर दिया ॥ १४६ ॥
तद्बाणैरर्दितं यूथं रक्षसां पीनवक्षसाम् ।
सिंहैरिव बभौ मत्तं गजानामाकुलं कुलम् ॥ १४७ ॥