भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1147, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1147

ववर्ष विशिखांस्तीक्ष्णान् वारिधारा इवाम्बुदः ॥ १३१ ॥ तब द्रोणकुमार भार सहन करनेमें समर्थ दूसरा विशाल धनुष हाथमें लेकर, जैसे मेघ जलकी धारा बरसाता है, उसी प्रकार तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥

ततः शारद्वतीपुत्रः प्रेषयामास भारत । सुवर्णपुङ्खाञ्छत्रुघ्नान् खचरान् खचरं प्रति ॥ १३२ ॥ भारत! तदनन्तर गौतमीपुत्रने सुवर्णमय पंखवाले शत्रुनाशक आकाशचारी बाणोंको उस राक्षसपर चलाया ॥

तद् बाणैरर्दितं यूथं रक्षसां पीनवक्षसाम् । सिंहैरिव बभौ मत्तं गजानामाकुलं कुलम् ॥ १३३ ॥ उन बाणोंसे चौड़ी छातीवाले राक्षसोंका वह समूह अत्यन्त पीड़ित हो सिंहोंद्वारा व्याकुल किये गये मतवाले हाथियोंके झुंडके समान प्रतीत होने लगा ॥ १३३ ॥

विधम्य राक्षसान् बाणैः साश्वसूरथद्विपान् । ददाह भगवान् वह्निर्भूतानीव युगक्षये ॥ १३४ ॥ जैसे भगवान् अग्निदेव प्रलयकालमें सम्पूर्ण प्राणियोंको दग्ध कर देते हैं, उसी प्रकार अश्वत्थामाने अपने बाणोंद्वारा घोड़े, सारथि, रथ और हाथियोंसहित बहुत-से राक्षसोंको जलाकर भस्म कर दिया ॥ १३४ ॥

स दग्ध्वाक्षौहिणीं बाणैर्नैर्ऋतीं रुरुचे नृप । पुरेव त्रिपुरं दग्ध्वा दिवि देवो महेश्वरः ॥ १३५ ॥ नरेश्वर! जैसे भगवान् महेश्वर आकाशमें त्रिपुरको दग्ध करके सुशोभित हुए थे, उसी प्रकार राक्षसोंकी अक्षौहिणी सेनाको बाणोंद्वारा दग्ध करके अश्वत्थामा शोभा पाने लगा ॥ १३५ ॥

युगान्ते सर्वभूतानि दग्ध्वेव वसुरुल्बणः । रराज जयतां श्रेष्ठो द्रोणपुत्रस्तवाहितान् ॥ १३६ ॥ राजन्! विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ द्रोणपुत्र अश्वत्थामा प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंको भस्म कर देनेवाले संवर्तक अग्निके समान आपके शत्रुओंको दग्ध करके देदीप्यमान हो उठा ॥ १३६ ॥

ततो घटोत्कचः क्रुद्धो रक्षसां भीमकर्मणाम् । द्रौणिं हतेति महतीं चोदयामास तां चमूम् ॥ १३७ ॥ तब घटोत्कचने कुपित हो भयानक कर्म करनेवाले राक्षसोंकी उस विशाल सेनाको आदेश दिया, ‘अरे! अश्वत्थामाको मार डालो' ॥ १३७ ॥

घटोत्कचस्य तामाज्ञां प्रतिगृह्याथ राक्षसाः । दंष्ट्रोज्ज्वला महावक्त्रा घोररूपा भयानकाः ॥ १३८ ॥ व्यात्तानना घोरजिह्वाः क्रोधताम्रेक्षणा भृशम् ।