महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1146, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंइन्द्रसेन, संजय, विजय, जय, कमलाक्ष, परक्राथी, जयवर्मा और सुदर्शन—ये सभी महारथी वीर तथा साठ हजार पैदल सैनिक तुम्हारे साथ जायँगे ॥ १२०—१२३ ॥
जहि भीमं यमौ चोभौ धर्मराजं च मातुल ।
असुरानिव देवेन्द्रो जयाशा मे त्वयि स्थिता ॥ १२४ ॥
‘मामा! जैसे देवराज इन्द्र असुरोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार तुम भीमसेन, नकुल, सहदेव तथा धर्मराज युधिष्ठिरका भी वध कर डालो। मेरी विजयकी आशा तुमपर ही अवलम्बित है ॥ १२४ ॥
दारितान् द्रौणिना बाणैर्भृशं विक्षतविग्रहान् ।
जहि मातुल कौन्तेयानसुरानिव पावकिः ॥ १२५ ॥
‘मातुल! द्रोणकुमार अश्वत्थामाने कुन्तीकुमारोंको अपने बाणोंद्वारा विदीर्ण कर डाला है; उनके शरीरोंको क्षत-विक्षत कर दिया है। इस अवस्थामें असुरोंका वध करनेवाले कुमार कार्तिकेयकी भाँति तुम कुन्तीपुत्रोंको मार डालो' ॥ १२५ ॥
एवमुक्तो ययौ शीघ्रं पुत्रेण तव सौबलः ।
पिप्रीषुस्ते सुतान् राजन् दिधक्षुश्चैव पाण्डवान् ॥ १२६ ॥
राजन्! आपके पुत्रके ऐसा कहनेपर सुबलपुत्र शकुनि आपके पुत्रोंको प्रसन्न करने तथा पाण्डवोंको दग्ध कर डालनेकी इच्छासे शीघ्र ही युद्धके लिये चल दिया ॥ १२६ ॥
अथ प्रवृत्ते युद्धं द्रौणिराक्षसयोर्मृधे ।
विभावर्यां सुतुमुलं शक्रप्रह्लादयोरिव ॥ १२७ ॥
तदनन्तर रणभूमिमें रात्रिके समय द्रोणकुमार अश्वत्थामा तथा राक्षस घटोत्कचका इन्द्र और प्रह्लादके समान अत्यन्त भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ ॥ १२७ ॥
ततो घटोत्कचो बाणैर्दशभिर्गौतमीसुतम् ।
जघानोरसि संक्रुद्धो विषाग्निप्रतिमैर्दृढैः ॥ १२८ ॥
उस समय घटोत्कचने अत्यन्त कुपित होकर विष और अग्निके समान भयंकर दस सुदृढ़ बाणोंद्वारा कृपीकुमार अश्वत्थामाकी छातीमें गहरा आघात किया ॥
स तैरभ्याहतो गाढं शरैर्भीमसुतेरितैः ।
चचाल रथमध्यस्थो वातोद्धत इव द्रुमः ॥ १२९ ॥
भीमपुत्र घटोत्कचके चलाये हुए उन बाणोंद्वारा गहरी चोट खाकर रथमें बैठा हुआ अश्वत्थामा वायुके झकझोरे हुए वृक्षके समान काँपने लगा ॥ १२९ ॥
भूयश्चाञ्जलिकेनाथ मार्गणेन महाप्रभम् ।
द्रौणिहस्तस्थितं चापं चिच्छेदाशु घटोत्कचः ॥ १३० ॥
इतनेहीमें घटोत्कचने पुनः अंजलिक नामक बाणसे अश्वत्थामाके हाथमें स्थित अत्यन्त कान्तिमान् धनुषको शीघ्रतापूर्वक काट डाला ॥ १३० ॥
ततोऽन्यद् द्रौणिरादाय धनुर्भारसहं महत् ।