भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1145, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1145

विषादग्रस्त हो रहा है। इन सब बातोंपर दृष्टिपात करके अश्वत्थामाने आपके पुत्रसे कहा— ।। १११—११५ ।। तिष्ठ दुर्योधनाद्य त्वं न कार्यः सम्भ्रमस्त्वया । सहैभिर्भ्रातृभिर्वीरैः पार्थिवैश्चेन्द्रविक्रमैः ।। ११६ ।। 'दुर्योधन! आज तुम चुपचाप खड़े रहो। तुम्हें इन्द्रके समान पराक्रमी इन राजाओं तथा अपने वीर भाइयोंके साथ तनिक भी घबराना नहीं चाहिये ।। ११६ ।। निहनिष्याम्यमित्रांस्ते न तवास्ति पराजयः । सत्यं ते प्रतिजानामि पर्याश्वासय वाहिनीम् ।। ११७ ।। 'राजन्! मैं तुम्हारे शत्रुओंको मार डालूँगा, तुम्हारी पराजय नहीं हो सकती; इसके लिये मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ। तुम अपनी सेनाको आश्वासन दो' ।।

दुर्योधन उवाच

न त्वेतदद्भुतं मन्ये यत् ते महदिदं मनः । अस्मासु च परा भक्तिस्तव गौतमीनन्दन ।। ११८ ।। **दुर्योधन बोला—**गौतमीनन्दन! तुम्हारा यह हृदय इतना विशाल है कि तुम्हारे द्वारा इस कार्यका होना मैं अद्भुत नहीं मानता। हमलोगोंपर तुम्हारा अनुराग बहुत अधिक है ।। ११८ ।।

संजय उवाच

अश्वत्थामानमुक्त्वैवं ततः सौबलमब्रवीत् । वृतं रथसहस्रेण हयानां रणशोभिनाम् ।। ११९ ।। **संजय कहते हैं—**राजन्! अश्वत्थामासे ऐसा कहकर दुर्योधन संग्राममें शोभा पानेवाले घोड़ोंसे युक्त एक हजार रथोंद्वारा घिरे हुए शकुनिसे इस प्रकार बोला— ।। ११९ ।। षष्ट्या रथसहस्रैश्च प्रयाहि त्वं धनंजयम् । कर्णश्च वृषसेनश्च कृपो नीलस्तथैव च ।। १२० ।। उदीच्याः कृतवर्मा च पुरुमित्रः सुतापनः । दुःशासनो निकुम्भश्च कुण्डभेदी पराक्रमः ।। १२१ ।। पुरंजयो दृढरथः पताकी हेमकम्पनः । शल्यारुणीन्द्रसेनाश्च संजयो विजयो जयः ।। १२२ ।। कमलाक्षः परक्राथी जयवर्मा सुदर्शनः । एते त्वामनुयास्यन्ति पत्तीनामयुतानि षट् ।। १२३ ।। 'मामा! तुम साठ हजार रथियोंकी सेना साथ लेकर अर्जुनपर आक्रमण करो। कर्ण, वृषसेन, कृपाचार्य, नील, उत्तर दिशाके सैनिक, कृतवर्मा, पुरुमित्र, सुतापन, दुःशासन, निकुम्भ, कुण्डभेदी, पराक्रमी, पुरंजय, दृढरथ, पताकी, हेमकम्पन, शल्य, आरुणि,

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