महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तब अश्वत्थामाने भी उनपर सहस्रों नाराच चलाये। धृष्टद्युम्न और घटोत्कचने भी अग्निशिखाके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा अश्वत्थामाके नाराचोंको काट डाला ।। १६३ ।। अतितीव्रं महत् युद्धं तयोः पुरुषसिंहयोः । योधानां प्रीतिजननं द्रौणेश्च भरतर्षभ ।। १६४ ।। भरतश्रेष्ठ! उन दोनों पुरुषसिंहों तथा अश्वत्थामाका वह अत्यन्त उग्र और महान् युद्ध समस्त योद्धाओंका हर्ष बढ़ा रहा था ।। १६४ ।। ततो रथसहस्रेण द्विरदानां शतैस्त्रिभिः । षड्भिर्वाजिसहस्रैश्च भीमस्तं देशमागमत् ।। १६५ ।। तदनन्तर एक हजार रथ, तीन सौ हाथी और छः हजार घुड़सवारोंके साथ भीमसेन उस युद्धस्थलमें आये ।। ततो भीमात्मजं रक्षो धृष्टद्युम्नं च सानुगम् । अयोधयत धर्मात्मा द्रौणिरक्लिष्टविक्रमः ।। १६६ ।। उस समय अनायास ही पराक्रम प्रकट करनेवाला धर्मात्मा अश्वत्थामा भीमपुत्र राक्षस घटोत्कच तथा सेवकों-सहित धृष्टद्युम्नके साथ अकेला ही युद्ध कर रहा था ।। १६६ ।। तत्राद्भुततमं द्रौणिर्दर्शयामास विक्रमम् । अशक्यं कर्तुमन्येन सर्वभूतेषु भारत ।। १६७ ।। भारत! वहाँ द्रोणपुत्रने अत्यन्त अद्भुत पराक्रम दिखाया, जिसे कर दिखाना समस्त प्राणियोंमें दूसरेके लिये असम्भव था ।। १६७ ।। निमेषान्तरमात्रेण साश्वसूतरथद्विपाम् । अक्षौहिणीं राक्षसानां शितैर्बाणैरशातयत् ।। १६८ ।। उसने पलक मारते-मारते अपने पैने बाणोंसे घोड़े, सारथि, रथ और हाथियोंसहित राक्षसोंकी एक अक्षौहिणी सेनाका संहार कर दिया ।। १६८ ।। मिषतो भीमसेनस्य हैडिम्बेः पार्षतस्य च । यमयोर्धर्मपुत्रस्य विजयस्याच्युतस्य च ।। १६९ ।। भीमसेन, घटोत्कच, धृष्टद्युम्न, नकुल, सहदेव, धर्मपुत्र युधिष्ठिर, अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्णके देखते-देखते यह सब कुछ हो गया ।। १६९ ।। प्रगाढमज्जोगतिभिर्नाराचैरभिताडिताः । निपेतुर्द्विरदा भूमौ सशृङ्गा इव पर्वताः ।। १७० ।। शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़नेवाले नाराचोंकी गहरी चोट खाकर बहुत-से हाथी शिखरयुक्त पर्वतोंके समान धराशायी हो गये ।। १७० ।। निकृत्तैर्हस्तिहस्तैश्च विचलद्भिरितस्ततः । रराज वसुधा कीर्णा विसर्पद्भिरिवोरगैः ।। १७१ ।।
हाथियोंके शुण्ड कटकर इधर-उधर छटपटा रहे थे। उनसे ढकी हुई पृथ्वी रेंगते हुए सर्पोंसे आच्छादित हुई-सी शोभा पा रही थी ॥ १७१ ॥
क्षिप्तैः काञ्चनदण्डैश्च नृपच्छत्रैः क्षितिर्बभौ । द्यौरिवोदितचन्द्रार्का ग्रहाकीर्णा युगक्षये ॥ १७२ ॥
इधर-उधर गिरे हुए सुवर्णमय दण्डवाले राजाओंके छत्रोंसे छायी हुई यह पृथ्वी प्रलयकालमें उदित हुए सूर्य, चन्द्रमा तथा ग्रहन-क्षत्रोंसे परिपूर्ण आकाशके समान जान पड़ती थी ॥ १७२ ॥
प्रवृद्धध्वजमण्डूकां भेरीविस्तीर्णकच्छपाम् । छत्रहंसावलीजुष्टां फेनचामरमालिनीम् ॥ १७३ ॥ कङ्कगृध्रमहाग्राहां नैकायुधझषाकुलाम् । विस्तीर्णगजपाषाणां हताश्वमकराकुलाम् ॥ १७४ ॥ रथक्षिप्तमहावप्रां पताकारुचिरद्रुमाम् । शरमीनां महारौद्रां प्रासशक्त्यृष्टिदुण्डुभाम् ॥ १७५ ॥ मज्जामांसमहापङ्कां कबन्धावर्जितोडुपाम् । केशशैवलकल्माषां भीरूणां कश्मलावहाम् ॥ १७६ ॥ नागेन्द्रहययोधानां शरीरव्ययसम्भवाम् । शोणितौघमहाघोरां द्रौणिः प्रावर्तयन्नदीम् ॥ १७७ ॥ योधार्तरवनिर्घोषां क्षतजोर्मिसमाकुलाम् । श्वापदातिमहाघोरां यमराष्ट्रमहोदधिम् ॥ १७८ ॥
अश्वत्थामाने उस युद्धस्थलमें खूनकी नदी बहा दी, जो शोणितके प्रवाहसे अत्यन्त भयंकर प्रतीत होती थी, जिसमें कटकर गिरी हुई विशाल ध्वजाएँ मेढकोंके समान और रणभेरियाँ विशाल कछुओंके सदृश जान पड़ती थीं। राजाओंके श्वेत छत्र हंसोंकी श्रेणीके समान उस नदीका सेवन करते थे। चँवरसमूह फेनका भ्रम उत्पन्न करते थे। कंक और गीध ही बड़े-बड़े ग्राह-से जान पड़ते थे। अनेक प्रकारके आयुध वहाँ मछलियोंके समान भरे थे। विशाल हाथी शिलाखण्डोंके समान प्रतीत होते थे। मरे हुए घोड़े वहाँ मगरोंके समान व्याप्त थे। गिरे पड़े हुए रथ ऊँचे-ऊँचे टीलोंके समान जान पड़ते थे। पताकाएँ सुन्दर वृक्षोंके समान प्रतीत होती थीं। बाण ही मीन थे। देखनेमें वह बड़ी भयंकर थी। प्रास, शक्ति और ऋष्टि आदि अस्त्र डुण्डुभ सर्पके समान थे। मज्जा और मांस ही उस नदीमें महापंकके समान प्रतीत होते थे। तैरती हुई लाशें नौकाका भ्रम उत्पन्न करती थीं। केशरूपी सेवारोंसे वह रंग-बिरंगी दिखायी दे रही थी। वह कायरोंको मोह प्रदान करनेवाली थी। गजराजों, घोड़ों और योद्धाओंके शरीरोंका नाश होनेसे उस नदीका प्राकट्य हुआ था। योद्धाओंकी आर्तवाणी ही उसकी कलकल ध्वनि थी। उस नदीसे रक्तकी लहरें उठ रही थीं। हिंसक जन्तुओंके कारण
उसकी भयंकरता और भी बढ़ गयी थी। वह यमराजके राज्यरूपी महासागरमें मिलनेवाली थी ॥ १७३–१७८ ॥
निहत्य राक्षसान् बाणैर्द्रौणिर्हैडिम्बिमर्दयत् । पुनरप्यतिसंक्रुद्धः सवृकोदरपार्षतान् ॥ १७९ ॥ स नाराचगणैः पार्थान् द्रौणिर्विद्ध्वा महाबलः । जघान सुरथं नाम द्रुपदस्य सुतं विभुः ॥ १८० ॥
राक्षसोंका वध करके बाणोंद्वारा अश्वत्थामाने घटोत्कचको अत्यन्त पीड़ित कर दिया। फिर उस महाबली वीरने अत्यन्त कुपित होकर अपने नाराचोंसे भीमसेन और धृष्टद्युम्नसहित समस्त कुन्तीकुमारोंको घायल करके द्रुपदपुत्र सुरथको मार डाला ॥ १७९-१८० ॥
पुनः शत्रुंजयं नाम द्रुपदस्यात्मजं रणे । बलानीकं जयानीकं जयाश्वं चाभिजघ्निवान् ॥ १८१ ॥
तत्पश्चात् उसने रणक्षेत्रमें द्रुपदकुमार शत्रुंजय, बलानीक, जयानीक और जयाश्वको भी मार गिराया ॥
श्रुताह्वयं च राजानं द्रौणिर्निन्ये यमक्षयम् । त्रिभिश्चान्यैः शरैस्तीक्ष्णैः सुपुङ्खैर्हेममालिनम् ॥ १८२ ॥ जघान स पृषध्रं च चन्द्रसेनं च मारिष । कुन्तिभोजसुतांश्चासौ दशभिर्दश जघ्निवान् ॥ १८३ ॥
आर्य! इसके बाद द्रोणकुमारने राजा श्रुताह्वको भी यमलोक पहुँचा दिया। फिर दूसरे तीन तीखे और सुन्दर पंखवाले बाणोंद्वारा हेममाली, पृषध्र और चन्द्रसेन-का भी वध कर डाला। तदनन्तर दस बाणोंसे उसने राजा कुन्तिभोजके दस पुत्रोंको कालके गालमें डाल दिया ॥ १८२-१८३ ॥
अश्वत्थामा सुसंक्रुद्धः संधायोग्रमजिह्मगम् । मुमोचाकर्णपूर्णेन धनुषा शरमुत्तमम् ॥ १८४ ॥ यमदण्डोपमं घोरमुद्दिश्याशु घटोत्कचम् ।
इसके बाद अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए अश्वत्थामाने एक सीधे जानेवाले अत्यन्त भयंकर एवं उत्तम बाणका संधान करके धनुषको कानतक खींचकर उसे शीघ्र ही घटोत्कचको लक्ष्य करके छोड़ दिया। वह बाण घोर यमदण्डके समान था ॥ १८४ १/२ ॥
स भित्त्वा हृदयं तस्य राक्षसस्य महाशरः ॥ १८५ ॥ विवेश वसुधां शीघ्रं सुपुङ्खः पृथिवीपते ।
पृथ्वीपते! वह सुन्दर पंखोंवाला महाबाण उस राक्षसका हृदय विदीर्ण करके शीघ्र ही पृथ्वीमें समा गया ॥
तं हतं पतितं ज्ञात्वा धृष्टद्युम्नो महारथः ॥ १८६ ॥
द्रौणेः सकाशाद् राजेन्द्र व्यपनिन्ये रथोत्तमम् । राजेन्द्र! घटोत्कचको मरकर गिरा हुआ जान महारथी धृष्टद्युम्नने अपने उत्तम रथको अश्वत्थामाके पाससे हटा लिया ॥ १८६ १/२ ॥
ततः पराङ्मुखनृपं सैन्यं यौधिष्ठिरं नृप ॥ १८७ ॥ पराजित्य रणे वीरो द्रोणपुत्रो ननाद ह । पूजितः सर्वभूतेषु तव पुत्रैश्च भारत ॥ १८८ ॥ नरेश्वर! फिर तो युधिष्ठिरकी सेनाके सभी नरेश युद्धसे विमुख हो गये। उस सेनाको परास्त करके वीर द्रोणपुत्र रणभूमिमें गर्जना करने लगा। भारत! उस समय सम्पूर्ण प्राणियोंमें अश्वत्थामाका बड़ा समादर हुआ। आपके पुत्रोंने भी उसका बड़ा सम्मान किया ॥ १८७-१८८ ॥
अथ शरशतभिन्नकृत्तदेहै- र्हतपतितैः क्षणदाचरैः समन्तात् । निधनमुपगतैर्मही कृताभूद् गिरिशिखरैरिव दुर्गमातिरौद्रा ॥ १८९ ॥ तदनन्तर सैकड़ों बाणोंसे शरीर छिन्न-भिन्न हो जानेके कारण मरकर गिरे और मृत्युको प्राप्त हुए निशाचरोंकी लाशोंसे पटी हुई चारों ओरकी भूमि पर्वतशिखरोंसे आच्छादित हुई-सी अत्यन्त भयंकर और दुर्गम प्रतीत होने लगी ॥ १८९ ॥
तं सिद्धगन्धर्वपिशाचसंघा नागाः सुपर्णाः पितरो वयांसि । रक्षोगणा भूतगणाश्च द्रौणि- मपूजयन्नप्सरसः सुराश्च ॥ १९० ॥ उस समय वहाँ सिद्धों, गन्धर्वों, पिशाचों, नागों, सुपर्णों, पितरों, पक्षियों, राक्षसों, भूतों, अप्सराओं तथा देवताओंने भी द्रोणपुत्र अश्वत्थामाकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ १९० ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५६ ॥
* भूमि नापनेका एक नाप जो चार सौ हाथका होता है।
१५७-
सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
सोमदत्तकी मूर्च्छा, भीमके द्वारा बाह्लीकका वध, धृतराष्ट्रके दस पुत्रों और शकुनिके सात रथियों एवं पाँच भाइयोंका संहार तथा द्रोणाचार्य और युधिष्ठिरके युद्धमें युधिष्ठिरकी विजय
संजय उवाच
द्रुपदस्यात्मजान् दृष्ट्वा कुन्तिभोजसुतांस्तथा ।
द्रोणपुत्रेण निहतान् राक्षसांश्च सहस्रशः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरो भीमसेनो धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।
युयुधानश्च संयत्ता युद्धायैव मनो दधुः ॥ २ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके द्वारा द्रुपद और कुन्तिभोजके पुत्रों तथा सहस्रों राक्षसोंको मारा गया देख युधिष्ठिर, भीमसेन, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न तथा युयुधानने भी सावधान होकर युद्धमें ही मन लगाया ॥ १-२ ॥
सोमदत्तः पुनः क्रुद्धो दृष्ट्वा सात्यकिमाहवे ।
महता शरवर्षेणच्छादयामास भारत ॥ ३ ॥
भारत! युद्धस्थलमें सात्यकिको देखकर सोमदत्त पुनः कुपित हो उठे और उन्होंने बड़ी भारी बाण-वर्षा करके सात्यकिको आच्छादित कर दिया ॥ ३ ॥
ततः समभवद् युद्धमतीव भयवर्धनम् ।
त्वदीयानां परेषां च घोरं विजयकाङ्क्षिणाम् ॥ ४ ॥
फिर तो विजयकी अभिलाषा रखनेवाले आपके और शत्रुपक्षके सैनिकोंमें अत्यन्त भयंकर घोर युद्ध छिड़ गया ॥ ४ ॥
तं दृष्ट्वा समुपायान्तं रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः ।
दशभिः सात्वतस्यार्थे भीमो विव्याध सायकैः ॥ ५ ॥
सोमदत्तको आते देख भीमसेनने सात्यकिकी सहायताके लिये शिलापर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले दस बाणोंद्वारा उन्हें घायल कर दिया ॥ ५ ॥
सोमदत्तोऽपि तं वीरं शतेन प्रत्यविध्यत ।
सात्वतस्त्वभिसंक्रुद्धः पुत्राधिभिरभिप्लुतम् ॥ ६ ॥
वृद्धं वृद्धगुणैर्युक्तं ययातिमिव नाहुषम् ।
विव्याध दशभिस्तीक्ष्णैः शरैर्वज्रनिपातनैः ॥ ७ ॥
सोमदत्तने भी वीर भीमसेनको सौ बाणोंसे वेधकर बदला चुकाया। इधर सात्यकिने भी अत्यन्त कुपित हो पुत्रशोकमें डूबे हुए, नहुषनन्दन ययातिकी भाँति वृद्धताके गुणोंसे युक्त बूढ़े सोमदत्तको वज्रको भी मार गिरानेवाले दस तीखे बाणोंसे बींध डाला ॥ ६-७ ॥ शक्त्या चैनं विनिर्भिद्य पुनर्विव्याध सप्तभिः । ततस्तु सात्यकेरथें भीमसेनो नवं दृढम् ॥ ८ ॥ मुमोच परिघं घोरं सोमदत्तस्य मूर्धनि । फिर शक्तिसे इन्हें विदीर्ण करके सात बाणोंद्वारा पुनः गहरी चोट पहुँचायी। तत्पश्चात् सात्यकिके लिये भीमसेनने सोमदत्तके मस्तकपर नूतन, सुदृढ़ एवं भयंकर परिघका प्रहार किया ॥ ८½ ॥ सात्वतोप्यग्निसंकाशं मुमोच शरमुत्तमम् ॥ ९ ॥ सोमदत्तोरसि क्रुद्धः सुपत्त्रं निशितं युधि । इसी समय सात्यकिने भी युद्धस्थलमें कुपित हो सोमदत्तकी छातीपर सुन्दर पंखवाले, अग्निके समान तेजस्वी, उत्तम और तीखे बाणका प्रहार किया ॥ ९½ ॥ युगपत् पेततुर्वीरौ घोरौ परिघमार्गणौ ॥ १० ॥ शरीरे सोमदत्तस्य स पपात महारथः । वे भयंकर परिघ और बाण वीर सोमदत्तके शरीरपर एक ही साथ गिरे। इससे महारथी सोमदत्त मूर्च्छित होकर गिर पड़े ॥ १०½ ॥ व्यामोहिते तु तनये बाह्लीकस्तमुपाद्रवत् ॥ ११ ॥ विसृजन् शरवर्षाणि कालवर्षीव तोयदः । अपने पुत्रके मूर्च्छित होनेपर बाह्लीकने वर्षाऋतुमें वर्षा करनेवाले मेघके समान बाणोंकी वृष्टि करते हुए वहाँ सात्यकिपर धावा किया ॥ ११½ ॥ भीमोऽथ सात्वतस्यार्थे बाह्लीकं नवभिः शरैः ॥ १२ ॥ प्रपीडयन् महात्मानं विव्याध रणमूर्धनि । भीमसेनने सात्यकिके लिये महात्मा बाह्लीकको पीड़ित करते हुए युद्धके मुहानेपर उन्हें नौ बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १२½ ॥ प्रातिपेयस्तु संक्रुद्धः शक्तिं भीमस्य वक्षसि ॥ १३ ॥ निचखान महाबाहुः पुरंदर इवाशनिम् । तब महाबाहु प्रतीपपुत्र बाह्लीकने अत्यन्त कुपित हो भीमसेनकी छातीमें अपनी शक्ति धँसा दी, मानो देवराज इन्द्रने किसी पर्वतपर वज्र मारा हो ॥ १३½ ॥ स तथाभिहतो भीमश्चकम्पे च मुमोह च ॥ १४ ॥ प्राप्य चेतश्च बलवान् गदामस्मै ससर्ज ह ।
इस प्रकार शक्तिसे आहत होकर भीमसेन काँप उठे और मूर्च्छित हो गये। फिर सचेत होनेपर बलवान् भीमने उनपर गदाका प्रहार किया ।। १४ १/२ ।। सा पाण्डवेन प्रहिता बाह्लीकस्य शिरोऽहरत् ।। १५ ।। स पपात हतः पृथ्व्यां वज्राहत इवाद्रिराट् । पाण्डुपुत्र भीमसेनद्वारा चलायी हुई उस गदाने बाह्लीकका सिर उड़ा दिया। वे वज्रके मारे हुए पर्वतराजकी भाँति मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े ।। १५ १/२ ।। तस्मिन् विनिहते वीरे बाह्लीके पुरुषर्षभ ।। १६ ।। पुत्रास्तेऽभ्यर्दयन् भीमं दश दाशरथेः समाः । नरश्रेष्ठ! वीर बाह्लीकके मारे जानेपर श्रीरामचन्द्रजीके समान पराक्रमी आपके दस पुत्र भीमसेनको पीड़ा देने लगे ।। १६ १/२ ।। नागदत्तो दृढरथो महाबाहुरयोभुजः ।। १७ ।। दृढः सुहस्तो विरजाः प्रमाथ्युग्रोऽनुयाय्यपि । उनके नाम इस प्रकार हैं—नागदत्त, दृढरथ (दृढरथाश्रय), महाबाहु, अयोभुज (अयोबाहु), दृढ (दृढक्षत्र), सुहस्त, विरजा, प्रमाथी, उग्र (उग्रश्रवा) और अनुयायी (अग्रयायी) ।। १७ १/२ ।। तान् दृष्ट्वा चुक्रुधे भीमो जगृहे भारसाधनान् ।। १८ ।। एकमेकं समुद्दिश्य पातयामास मर्मसु । उनको सामने देखकर भीमसेन कुपित हो उठे। उन्होंने प्रत्येकके लिये एक-एक करके भारसाधनमें समर्थ दस बाण हाथमें लिये और उन्हें उनके मर्मस्थानोंपर चलाया ।। १८ १/२ ।। ते विद्धा व्यसवः पेतुः स्यन्दनेभ्यो हतौजसः ।। १९ ।। चण्डवातप्रभग्नास्तु पर्वताग्रान्महीरुहाः । उन बाणोंसे घायल होकर आपके पुत्र अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे और पर्वतशिखरसे प्रचण्ड वायुद्वारा उखाड़े हुए वृक्षोंके समान तेजोहीन होकर रथोंसे नीचे गिर पड़े ।। १९ १/२ ।। नाराचैर्दशभिर्भीमस्तान् निहत्य तवात्मजान् ।। २० ।। कर्णस्य दयितं पुत्रं वृषसेनमावाकिरत् । आपके उन पुत्रोंको दस नाराचोंद्वारा मारकर भीमसेनने कर्णके प्यारे पुत्र वृषसेनपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।। २० १/२ ।। ततो वृकरथो नाम भ्राता कर्णस्य विश्रुतः ।। २१ ।। जघान भीमं नाराचैस्तमप्यभ्यद्रवद् बली । तदनन्तर कर्णके सुविख्यात बलवान् भ्राता वृकरथने आकर भीमसेनपर भी आक्रमण किया और उन्हें नाराचोंद्वारा घायल कर दिया ।। २१ १/२ ।।
ततः सप्त रथान् वीरः स्यालानां तव भारत ।। २२ ।। निहत्य भीमो नाराचैः शतचन्द्रमपोथयत् । भारत! तत्पश्चात् वीर भीमसेनने आपके सालोंमेंसे सात रथियोंको नाराचोंद्वारा मारकर शतचन्द्रको भी कालके गालमें भेज दिया ।। २२ १/२ ।। अमर्षयन्तो निहतं शतचन्द्रं महारथम् ।। २३ ।। शकुनेर्भ्रातरो वीरा गवाक्षः शरभो विभुः । सुभगो भानुदत्तश्च शूराः पञ्च महारथाः ।। २४ ।। अभिद्रुत्य शरैस्तीक्ष्णैर्भीमसेनमताडयन् । महारथी शतचन्द्रके मारे जानेपर अमर्षमें भरे हुए शकुनिके वीर भाई गवाक्ष, शरभ, विभु, सुभग और भानुदत्त—ये पाँच शूर महारथी भीमसेनपर टूट पड़े और उन्हें पैने बाणोंद्वारा घायल करने लगे ।। २३-२४ १/२ ।। स ताड्यमानो नाराचैर्वृष्टिवेगैरिवाचलः ।। २५ ।। जघान पञ्चभिर्बाणैः पञ्चैवातिरथान् बली । जैसे वर्षाके वेगसे पर्वत आहत होता है, उसी प्रकार उनके नाराचोंसे घायल होकर बलवान् भीमसेनने अपने पाँच बाणोंद्वारा उन पाँचों अतिरथी वीरोंको मार डाला ।। २५ १/२ ।। तान् दृष्ट्वा निहतान् वीरान् विचेलुर्नृपसत्तमाः ।। २६ ।। ततो युधिष्ठिरः क्रुद्धस्त्वानीकमशातयत् । मिषतः कुम्भयोनेस्तु पुत्राणां तव चानघ ।। २७ ।। उन पाँचों वीरोंको मारा गया देख सभी श्रेष्ठ नरेश विचलित हो उठे। निष्पाप नरेश्वर! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए राजा युधिष्ठिर द्रोणाचार्य तथा आपके पुत्रोंके देखते-देखते आपकी सेनाका संहार करने लगे ।। अम्बष्ठान् मालवाञ्छूरांस्त्रिगर्तान् स शिबीनपि । प्राहिणोन्मृत्युलोकाय क्रुद्धो युद्धे युधिष्ठिरः ।। २८ ।। उस युद्धमें क्रुद्ध होकर युधिष्ठिरने अम्बष्ठों, मालवों, शूरवीर त्रिगतों तथा शिबिदेशीय सैनिकोंको भी मृत्युके लोकमें भेज दिया ।। २८ ।। अभीषाहाञ्छूरसेनान् बाह्लीकान् सवसातिकान् । निकृत्य पृथिवीं राजा चक्रे शोणितकर्दमाम् ।। २९ ।। अभीषाह, शूरसेन, बाह्लीक और वसातिदेशीय योद्धाओंको नष्ट करके राजा युधिष्ठिरने इस भूतलपर रक्तकी कीच मचा दी ।। २९ ।। यौधेयान् मालवान् राजन् मद्रकाणां गणान् युधि । प्राहिणोन्मृत्युलोकाय शूरान् बाणैर्युधिष्ठिरः ।। ३० ।।
राजन्! युधिष्ठिरने अपने बाणोंसे यौधेय, मालव तथा शूरवीर मद्रकगणोंको मृत्युके लोकमें भेज दिया ॥ ३० ॥
हताहरत गृह्णीत विध्यत व्यवकृन्तत ।
इत्यासीत् तुमुलः शब्दो युधिष्ठिररथं प्रति ॥ ३१ ॥
युधिष्ठिरके रथके आसपास 'मारो, ले आओ, पकड़ो, घायल करो, टुकड़े-टुकड़े कर डालो' इत्यादि भयंकर शब्द गूँजने लगा ॥ ३१ ॥
सैन्यानि द्रावयन्तं तं द्रोणो दृष्ट्वा युधिष्ठिरम् ।
चोदितस्तव पुत्रेण सायकैरभ्यवाकिरत् ॥ ३२ ॥
द्रोणाचार्यने युधिष्ठिरको अपनी सेनाओंको खदेड़ते देख आपके पुत्र दुर्योधनसे प्रेरित होकर उनपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ३२ ॥
द्रोणस्तु परमक्रुद्धो वायव्यास्त्रेण पार्थिवम् ।
विव्याध सोऽपि तद् दिव्यमस्त्रमस्त्रेण जघ्निवान् ॥ ३३ ॥
अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए द्रोणाचार्यने वायव्यास्त्रसे राजा युधिष्ठिरको बींध डाला। युधिष्ठिरने भी उनके दिव्यास्त्रोंको अपने दिव्यास्त्रसे ही नष्ट कर दिया ॥ ३३ ॥
तस्मिन् विनिहते चास्त्रे भारद्वाजो युधिष्ठिरे ।
वारुणं याम्यमाग्नेयं त्वाष्ट्रं सावित्रमेव च ॥ ३४ ॥
चिक्षेप परमक्रुद्धो जिघांसुः पाण्डुनन्दनम् ।
उस अस्त्रके नष्ट हो जानेपर द्रोणाचार्यने युधिष्ठिरपर क्रमशः वारुण, याम्य, आग्नेय, त्वाष्ट्र और सावित्र नामक दिव्यास्त्र चलाया; क्योंकि वे अत्यन्त कुपित होकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको मार डालना चाहते थे ॥ ३४ १/२ ॥
क्षिप्तानि क्षिप्यमाणानि तानि चास्त्राणि धर्मजः ॥ ३५ ॥
जघानास्त्रैर्महाबाहुः कुम्भयोनेरवित्रसन् ।
परंतु महाबाहु धर्मपुत्र युधिष्ठिरने द्रोणाचार्यसे तनिक भी भय न खाकर उनके द्वारा चलाये गये और चलाये जानेवाले सभी अस्त्रोंको अपने दिव्यास्त्रोंसे नष्ट कर दिया ॥ ३५ १/२ ॥
सत्यां चिकीर्षमाणस्तु प्रतिज्ञां कुम्भसम्भवः ॥ ३६ ॥
प्रादुश्चक्रेऽस्त्रमैन्द्रं वै प्राजापत्यं च भारत ।
जिघांसुर्धर्मतनयं तव पुत्रहिते रतः ॥ ३७ ॥
भारत! द्रोणाचार्यने अपनी प्रतिज्ञाको सच्ची करनेकी इच्छासे आपके पुत्रके हितमें तत्पर हो धर्मपुत्र युधिष्ठिरको मार डालनेकी अभिलाषा लेकर उनके ऊपर ऐन्द्र और प्राजापत्य नामक अस्त्रोंका प्रयोग किया ॥ ३६-३७ ॥
पतिः कुरूणां गजसिंहगामी
विशालवक्षाः पृथुलोहिताक्षः ।
प्रादुश्चकारास्त्रमहीनतेजा माहेन्द्रमन्यत् स जघान तेन ।। ३८ ।। तब गज और सिंहके समान गतिवाले, विशाल वक्षःस्थलसे सुशोभित, बड़े-बड़े लाल नेत्रोंवाले, उत्कृष्ट तेजस्वी कुरुपति युधिष्ठिरने माहेन्द्र अस्त्र प्रकट किया और उसीसे अन्य सभी दिव्यास्त्रोंको नष्ट कर दिया ।। ३८ ।।
विहन्यमानेष्वस्त्रेषु द्रोणः क्रोधसमन्वितः । युधिष्ठिरवधं प्रेप्सुर्ब्राह्ममस्त्रमुदैरयत् ।। ३९ ।। उन अस्त्रोंके नष्ट हो जानेपर क्रोधभरे द्रोणाचार्यने युधिष्ठिरका वध करनेकी इच्छासे ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया ।। ३९ ।।
ततो नाज्ञासिषं किंचिद् घोरेण तमसाऽऽवृते । सर्वभूतानि च परं त्रासं जग्मुर्महीपते ।। ४० ।। महीपते! फिर तो मैं घोर अन्धकारसे आवृत उस युद्धस्थलमें कुछ भी जान न सका और समस्त प्राणी अत्यन्त भयभीत हो उठे ।। ४० ।।
ब्रह्मास्त्रमुद्यतं दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । ब्रह्मास्त्रेणैव राजेन्द्र तदस्त्रं प्रत्यवारयत् ।। ४१ ।। राजेन्द्र! ब्रह्मास्त्रको उद्यत देख कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने ब्रह्मास्त्रसे ही उस अस्त्रका निवारण कर दिया ।। ४१ ।।
ततः सैनिकमुख्यास्ते प्रशशंसुर्नरर्षभौ । द्रोणपार्थौ महेष्वासौ सर्वयुद्धविशारदौ ।। ४२ ।। तदनन्तर प्रधान-प्रधान सैनिक सम्पूर्ण युद्धकलामें प्रवीण, महाधनुर्धर, नरश्रेष्ठ द्रोणाचार्य और युधिष्ठिरकी बड़ी प्रशंसा करने लगे ।। ४२ ।।
ततः प्रमुच्य कौन्तेयं द्रोणो द्रुपदवाहिनीम् । व्यधमत् क्रोधताम्राक्षो वायव्यास्त्रेण भारत ।। ४३ ।। भारत! उस समय द्रोणाचार्यने कुन्तीकुमारका सामना करना छोड़कर क्रोधसे लाल आँखें किये वायव्यास्त्रके द्वारा द्रुपदकी सेनाका संहार आरम्भ किया ।। ४३ ।।
ते हन्यमाना द्रोणेन पञ्चालाः प्राद्रवन् भयात् । पश्यतो भीमसेनस्य पार्थस्य च महात्मनः ।। ४४ ।। द्रोणाचार्यकी मार खाकर पांचाल-सैनिक भीमसेन और महात्मा अर्जुनके देखते-देखते भयके मारे भागने लगे ।।
ततः किरीटी भीमश्च सहसा संन्यवर्तताम् । महद्भ्यां रथवंशाभ्यां परिगृह्य बलं तदा ।। ४५ ।। यह देख किरीटधारी अर्जुन और भीमसेन विशाल रथसेनाओंके द्वारा अपनी सेनाकी रोकथाम करते हुए सहसा उस ओर लौट पड़े ।। ४५ ।।
बीभत्सुर्दक्षिणं पार्श्वमुत्तरं च वृकोदरः ।
भारद्वाजं शरौघाभ्यां महद्भ्यामभ्यवर्षताम् ॥ ४६ ॥
अर्जुनने द्रोणाचार्यके दाहिने पार्श्वमें और भीमसेनने बायें पार्श्वमें महान् बाणसमूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥
केकयाः सृञ्जयाश्चैव पञ्चालाश्च महौजसः ।
अन्वगच्छन् महाराज मत्स्याश्च सह सात्वतैः ॥ ४७ ॥
महाराज! उस समय केकय, सृंजय, महातेजस्वी पांचाल, मत्स्य तथा यादव-सैनिकोंने भी उन दोनोंका अनुसरण किया ॥ ४७ ॥
ततः सा भारती सेना वध्यमाना किरीटिना ।
तमसा निद्रया चैव पुनरेव व्यदीर्यत ॥ ४८ ॥
उस समय किरीटधारी अर्जुनकी मार खाती हुई कौरवी-सेना अंधकार और निद्रासे पीड़ित हो पुनः तितर-बितर हो गयी ॥ ४८ ॥
द्रोणेन वार्यमाणास्ते स्वयं तव सुतेन च ।
नाशक्यन्त महाराज योधा वारयितुं तदा ॥ ४९ ॥
महाराज! द्रोणाचार्य और स्वयं आपके पुत्र दुर्योधनके मना करनेपर भी उस समय आपके योद्धा रोके न जा सके ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे द्रोणयुधिष्ठिरयुद्धे
सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें द्रोणाचार्य और युधिष्ठिरका युद्धविषयक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५७ ॥
१५८-
अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
दुर्योधन और कर्णकी बातचीत, कृपाचार्यद्वारा कर्णको फटकारना तथा कर्णद्वारा कृपाचार्यका अपमान
संजय उवाच
उदीर्यमाणं तद् दृष्ट्वा पाण्डवानां महद् बलम् ।
अविषह्यं च मन्वानः कर्णं दुर्योधनोऽब्रवीत् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! पाण्डवोंकी उस विशाल सेनाका जोर बढ़ते देख उसे असह्य मानकर दुर्योधनने कर्णसे कहा— ॥ १ ॥
अयं स कालः सम्प्राप्तो मित्राणां मित्रवत्सल ।
त्रायस्व समरे कर्ण सर्वान् योधान् महारथान् ॥ २ ॥
पञ्चालैर्मत्स्यकैकेयैः पाण्डवैश्च महारथैः ।
वृतान् समन्तात् संक्रुद्धैर्निःश्वसद्भिरिवोरगैः ॥ ३ ॥
‘मित्रवत्सल कर्ण! यही मित्रोंके कर्तव्यपालनका उपयुक्त अवसर आया है। क्रोधमें भरे हुए पांचाल, मत्स्य, केकय तथा पाण्डव महारथी फुफकारते हुए सर्पोंके समान भयंकर हो उठे हैं। उनके द्वारा चारों ओरसे घिरे हुए मेरे समस्त महारथी योद्धाओंकी आज तुम समरांगणमें रक्षा करो ॥
एते नदन्ति संहृष्टाः पाण्डवा जितकाशिनः ।
शक्रोपमाश्च बहवः पञ्चालानां रथव्रजाः ॥ ४ ॥
‘देखो, ये विजयसे सुशोभित होनेवाले पाण्डव तथा इन्द्रके समान पराक्रमी बहुसंख्यक पांचाल महारथी कैसे हर्षोत्फुल्ल होकर सिंहनाद कर रहे हैं’ ॥ ४ ॥
कर्ण उवाच
परित्रातुमिह प्राप्तो यदि पार्थं पुरंदरः ।
तमप्याशु पराजित्य ततो हन्तास्मि पाण्डवम् ॥ ५ ॥
**कर्णने कहा—**राजन्! यदि साक्षात् इन्द्र यहाँ कुन्तीकुमार अर्जुनकी रक्षा करनेके लिये आ गये हों तो उन्हें भी शीघ्र ही पराजित करके मैं पाण्डुपुत्र अर्जुनको अवश्य मार डालूँगा ॥ ५ ॥
सत्यं ते प्रतिजानामि समाश्वसिहि भारत ।
हन्तास्मि पाण्डुतनयान् पञ्चालांश्च समागतान् ॥ ६ ॥
भरतनन्दन! तुम धैर्य धारण करो। मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि युद्धस्थलमें आये हुए पाण्डवों तथा पांचालोंको निश्चय ही मारूँगा ॥ ६ ॥
जयं ते प्रतिदास्यामि वासवस्येव पावकिः । प्रियं तव मया कार्यमिति जीवामि पार्थिव ॥ ७ ॥ जैसे अग्निकुमार कार्तिकेयने तारकासुरका विनाश करके इन्द्रको विजय दिलायी थी, उसी प्रकार मैं आज तुम्हें विजय प्रदान करूँगा। भूपाल! मुझे तुम्हारा प्रिय करना है, इसीलिये जीवन धारण करता हूँ ॥ ७ ॥
सर्वेषामेव पार्थानां फाल्गुनो बलवत्तरः । तस्यामोघां विमोक्ष्यामि शक्तिं शक्रविनिर्मिताम् ॥ ८ ॥ कुन्तीके सभी पुत्रोंमें अर्जुन ही अधिक शक्तिशाली हैं, अतः मैं इन्द्रकी दी हुई अमोघ शक्तिको अर्जुनपर ही छोड़ूँगा ॥ ८ ॥
तस्मिन् हते महेष्वासे भ्रातरस्तस्य मानद । तव वश्या भविष्यन्ति वनं यास्यन्ति वा पुनः ॥ ९ ॥ मानद! महाधनुर्धर अर्जुनके मारे जानेपर उनके सभी भाई तुम्हारे वशमें हो जायँगे अथवा पुनः वनमें चले जायँगे ॥ ९ ॥
मयि जीवति कौरव्य विषादं मा कृथाः क्वचित् । अहं जेष्यामि समरे सहितान् सर्वपाण्डवान् ॥ १० ॥ कुरुनन्दन! तुम मेरे जीते-जी कभी विषाद न करो। मैं समरभूमिमें संगठित होकर आये हुए समस्त पाण्डवोंको जीत लूँगा ॥ १० ॥
पांचालान् केकयांश्चैव वृष्णींश्चापि समागतान् । बाणौघैः शकलीकृत्य तव दास्यामि मेदिनीम् ॥ ११ ॥ मैं अपने बाणसमूहोंद्वारा रणभूमिमें पधारे हुए पांचालों, केकयों और वृष्णिवंशियोंके भी टुकड़े-टुकड़े करके यह सारी पृथ्वी तुम्हें दे दूँगा ॥ ११ ॥
संजय उवाच
एवं ब्रुवाणं कर्णं तु कृपः शारद्वतोऽब्रवीत् । स्मयन्निव महाबाहुः सूतपुत्रमिदं वचः ॥ १२ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! इस तरहकी बातें करते हुए सूतपुत्र कर्णसे शरद्वान्के पुत्र महाबाहु कृपाचार्यने मुसकराते हुए-से यह बात कही— ॥ १२ ॥
शोभनं शोभनं कर्ण सनाथः कुरुपुङ्गवः । त्वया नाथेन राधेय वचसा यदि सिध्यति ॥ १३ ॥ ‘कर्ण! बहुत अच्छा, बहुत अच्छा! राधापुत्र! यदि बात बनानेसे ही कार्य सिद्ध हो जाय, तब तो तुम-जैसे सहायकको पाकर कुरुराज दुर्योधन सनाथ हो गये ॥ १३ ॥
बहुशः कत्थसे कर्ण कौरवस्य समीपतः । न तु ते विक्रमः कश्चिद् दृश्यते फलमेव वा ॥ १४ ॥
‘कर्ण! तुम कुरुनन्दन सुयोधनके समीप तो बहुत बढ़कर बातें किया करते हो; किंतु न तो कभी कोई तुम्हारा पराक्रम देखा जाता है और न उसका कोई फल ही सामने आता है॥ १४॥
समागमः पाण्डुसुतैर्दृष्टस्ते बहुशो युधि।
सर्वत्र निर्जितश्चासि पाण्डवैः सूतनन्दन॥ १५॥
‘सूतनन्दन! पाण्डुके पुत्रोंसे युद्धस्थलमें तुम्हारी अनेकों बार मुठभेड़ हुई है; परंतु सर्वत्र पाण्डवोंसे तुम्हीं परास्त हुए हो॥ १५॥
ह्रियमाणे तदा कर्ण गन्धर्वैर्धृतराष्ट्रजे।
तदायुध्यन्त सैन्यानि त्वमेकोऽग्रेऽपलायिथाः॥ १६॥
‘कर्ण! याद है कि नहीं, जब गन्धर्व दुर्योधनको पकड़कर लिये जा रहे थे, उस समय सारी सेना तो युद्ध कर रही थी और अकेले तुम ही सबसे पहले पलायन कर गये थे॥ १६॥
विराटनगरे चापि समेताः सर्वकौरवाः।
पार्थेन निर्जिता युद्धे त्वं च कर्ण सहानुजः॥ १७॥
‘कर्ण! विराट नगरमें भी सम्पूर्ण कौरव एकत्र हुए थे; किंतु अर्जुनने अकेले ही वहाँ सबको हरा दिया था। कर्ण! तुम भी अपने भाइयोंके साथ परास्त हुए थे॥ १७॥
एकस्याप्यसमर्थस्त्वं फाल्गुनस्य रणाजिरे।
कथमुत्सहसे जेतुं सकृष्णान् सर्वपाण्डवान्॥ १८॥
‘समरांगणमें अकेले अर्जुनका सामना करनेकी भी तुममें शक्ति नहीं है; फिर श्रीकृष्णसहित सम्पूर्ण पाण्डवोंको जीत लेनेका उत्साह कैसे दिखाते हो?॥
अब्रुवन् कर्ण युध्यस्व कत्थसे बहु सूनज।
अनुक्त्वा विक्रमेद् यस्तु तद् वै सत्पुरुषव्रतम्॥ १९॥
‘सूतपुत्र कर्ण! चुपचाप युद्ध करो। तुम बातें बहुत बनाते हो। जो बिना कुछ कहे ही पराक्रम दिखाये, वही वीर है और वैसा करना ही सत्पुरुषोंका व्रत है॥ १९॥
गर्जित्व सूतपुत्र त्वं शारदाभ्रमिवाफलम्।
निष्फलो दृश्यसे कर्ण तच्च राजा न बुध्यते॥ २०॥
‘सूतपुत्र कर्ण! तुम शरद्-ऋतुके निष्फल बादलोंके समान गर्जना करके भी निष्फल ही दिखायी देते हो; किंतु राजा दुर्योधन इस बातको नहीं समझ रहे हैं॥
तावद् गर्जस्व राधेय यावत् पार्थं न पश्यसि।
आरात् पार्थं हि ते दृष्ट्वा दुर्लभं गर्जितं पुनः॥ २१॥
‘राधानन्दन! जबतक तुम अर्जुनको नहीं देखते हो, तभीतक गर्जना कर लो। कुन्तीकुमार अर्जुनको समीप देख लेनेपर फिर यह गर्जना तुम्हारे लिये दुर्लभ हो जायगी॥
त्वमनासाद्य तान् बाणान् फाल्गुनस्य विगर्जसि।
पार्थसायकविद्धस्य दुर्लभं गर्जितं तव ॥ २२ ॥
'जबतक अर्जुनके वे बाण तुम्हारे पड़ रहे हैं, तभीतक तुम जोर-जोरसे गरज रहे हो। अर्जुनके बाणोंसे घायल होनेपर तुम्हारे लिये यह गर्जन-तर्जन दुर्लभ हो जायगा ॥ २२ ॥
बाहुभिः क्षत्रियाः शूरा वाग्भिः शूरा द्विजातयः ।
धनुषा फाल्गुनः शूरः कर्णः शूरो मनोरथैः ॥ २३ ॥
तोषिता येन रुद्रोऽपि कः पार्थं प्रतिघातयेत् ।
'क्षत्रिय अपनी भुजाओंसे शौर्यका परिचय देते हैं। ब्राह्मण वाणीद्वारा प्रवचन करनेमें वीर होते हैं। अर्जुन धनुष चलानेमें शूर हैं; किंतु कर्ण केवल मनसूबे बाँधनेमें वीर है। जिन्होंने अपने पराक्रमसे भगवान् शंकरको भी संतुष्ट किया है, उन अर्जुनको कौन मार सकता है?' ॥
एवं संरुषितस्तेन तदा शारद्वतेन ह ॥ २४ ॥
कर्णः प्रहरतां श्रेष्ठः कृपं वाक्यमथाब्रवीत् ।
उन कृपाचार्यके ऐसा कहनेपर योद्धाओंमें श्रेष्ठ कर्णने उस समय रुष्ट होकर कृपाचार्यसे इस प्रकार कहा— ॥ २४ ½ ॥
शूरा गर्जन्ति सततं प्रावृषीव बलाहकाः ॥ २५ ॥
फलं चाशु प्रयच्छन्ति बीजमुप्तमृताविव ।
'शूरवीर वर्षाकालके मेघोंकी तरह सदा गरजते हैं और ठीक ऋतुमें बोये हुए बीजके समान शीघ्र ही फल भी देते हैं ॥ २५ ½ ॥
दोषमत्र न पश्यामि शूराणां रणमूर्धनि ॥ २६ ॥
तत्तद् विकत्थमानानां भारं चोद्वहतां मृधे ।
'युद्धस्थलमें महान् भार उठानेवाले शूरवीर यदि युद्धके मुहानेपर अपनी प्रशंसाकी ही बातें कहते हैं तो इसमें मुझे उनका कोई दोष नहीं दिखायी देता ॥ २६ ½ ॥
यं भारं पुरुषो वोढुं मनसा हि व्यवस्यति ॥ २७ ॥
दैवमस्य ध्रुवं तत्र साहाय्यायोपपद्यते ।
'पुरुष अपने मनसे जिस भारको ढोनेका निश्चय करता है, उसमें दैव अवश्य ही उसकी सहायता करता है ॥
व्यवसायद्वितीयोऽहं मनसा भारमुद्वहन् ॥ २८ ॥
हत्वा पाण्डुसुतानाजौ सकृष्णान् सहसात्वतान् ।
गर्जाामि यद्यहं विप्र तव किं तत्र नश्यति ॥ २९ ॥
'मैं मनसे जिस कार्यभारका वहन कर रहा हूँ, उसकी सिद्धिमें दृढ़ निश्चय ही मेरा सहायक है। विप्रवर! मैं कृष्ण और सात्यकिसहित समस्त पाण्डवोंको युद्धमें मारनेका निश्चय करके यदि गरज रहा हूँ तो उसमें आपका क्या नष्ट हुआ जा रहा है? ॥ २८-२९ ॥
वृथा शूरा न गर्जन्ति शारदा इव तोयदाः ।
सामर्थ्यमात्मनो ज्ञात्वा ततो गर्जन्ति पण्डिताः ॥ ३० ॥
'शरद्-ऋतुके बादलोंके समान शूरवीर व्यर्थ नहीं गरजते हैं। विद्वान् पुरुष पहले अपनी सामर्थ्यको समझ लेते हैं, उसके बाद गर्जना करते हैं ॥ ३० ॥
सोऽहमद्य रणे यत्तौ सहितौ कृष्णपाण्डवौ ।
उत्सहे मनसा जेतुं ततो गर्जामि गौतम ॥ ३१ ॥
'गौतम! आज मैं रणभूमिमें विजयके लिये साथ-साथ प्रयत्न करनेवाले श्रीकृष्ण और अर्जुनको जीत लेनेके लिये मन-ही-मन उत्साह रखता हूँ। इसीलिये गर्जना करता हूँ ॥ ३१ ॥
पश्य त्वं गर्जितस्यास्य फलं मे विप्र सानुगान् ।
हत्वा पाण्डुसुतानाजौ सहकृष्णान् ससात्वतान् ॥ ३२ ॥
दुर्योधनाय दास्यामि पृथिवीं हतकण्टकाम् ।
'ब्रह्मन्! मेरी इस गर्जनाका फल देख लेना। मैं युद्धमें श्रीकृष्ण, सात्यकि तथा अनुगामियोंसहित पाण्डवोंको मारकर इस भूमण्डलका निष्कण्टक राज्य दुर्योधनको दे दूँगा' ॥
कृप उवाच
मनोरथप्रलापा मे न ग्राह्यास्तव सूतज ॥ ३३ ॥
सदा क्षिपसि वै कृष्णौ धर्मराजं च पाण्डवम् ।
ध्रुवस्तत्र जयः कर्ण यत्र युद्धविशारदौ ॥ ३४ ॥
**कृपाचार्य बोले—**सूतपुत्र! तुम्हारे ये मनसूबे बाँधनेके निरर्थक प्रलाप मेरे लिये विश्वासके योग्य नहीं हैं। कर्ण! तुम सदा ही श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरपर आक्षेप किया करते हो; परंतु विजय उसी पक्षकी होगी, जहाँ युद्धविशारद श्रीकृष्ण और अर्जुन विद्यमान हैं ॥ ३३-३४ ॥
देवगन्धर्वयक्षाणां मनुष्योरगरक्षसाम् ।
दंशितानामपि रणे अजेयौ कृष्णपाण्डवौ ॥ ३५ ॥
यदि देवता, गन्धर्व, यक्ष, मनुष्य, सर्प और राक्षस भी कवच बाँधकर युद्धके लिये आ जायँ तो रणभूमिमें श्रीकृष्ण और अर्जुनको वे भी जीत नहीं सकते ॥ ३५ ॥
ब्रह्मण्यः सत्यवाग् दान्तो गुरुदैवतपूजकः ।
नित्यं धर्मरतश्चैव कृतास्त्रश्च विशेषतः ॥ ३६ ॥
धृतिमांश्च कृतज्ञश्च धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
धर्मपुत्र युधिष्ठिर ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, गुरु और देवताओंका सम्मान करनेवाले, सदा धर्मपरायण, अस्त्रविद्यामें विशेष कुशल, धैर्यवान् और कृतज्ञ हैं ॥ ३६ ½ ॥
भ्रातरश्चास्य बलिनः सर्वास्त्रेषु कृतश्रमाः ॥ ३७ ॥
गुरुवृत्तिरताः प्राज्ञा धर्मनित्या यशस्विनः ।
इनके बलवान् भाई भी सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंकी कलामें परिश्रम किये हुए हैं। वे गुरुसेवापरायण, विद्वान्, धर्मतत्पर और यशस्वी हैं ॥ ३७ ½ ॥
सम्बन्धिनश्चेन्द्रवीर्याः स्वनुरक्ताः प्रहारिणः ॥ ३८ ॥
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च दौर्मुखिर्जनमेजयः ।
चन्द्रसेनो रुद्रसेनः कीर्तिधर्मा ध्रुवो धरः ॥ ३९ ॥
वसुचन्द्रो दामचन्द्रः सिंहचन्द्रः सुतेजनः ।
द्रुपदस्य तथा पुत्रा द्रुपदश्च महास्त्रवित् ॥ ४० ॥
उनके सम्बन्धी भी इन्द्रके समान पराक्रमी, उनमें अनुराग रखनेवाले और प्रहार करनेमें कुशल हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, दुर्मुखपुत्र जनमेजय, चन्द्रसेन, रुद्रसेन, कीर्तिधर्मा, ध्रुव, धर, वसुचन्द्र, दामचन्द्र, सिंहचन्द्र, सुतेजन, द्रुपदके पुत्रगण तथा महान् अस्त्रवेत्ता द्रुपद ॥ ३८—४० ॥
येषामर्थाय संयत्तो मत्स्यराजः सहानुजः ।
शतानीकः सूर्यदत्तः श्रुतानीकः श्रुतध्वजः ॥ ४१ ॥
बलानीको जयानीको जयाश्वो रथवाहनः ।
चन्द्रोदयः समर्थो विराटभ्रातरः शुभाः ॥ ४२ ॥
यमौ च द्रौपदेयाश्च राक्षसच घटोत्कचः ।
येषामर्थाय युध्यन्ते न तेषां विद्यते क्षयः ॥ ४३ ॥ जिनके लिये शतानीक, सूर्यदत्त, श्रुतानीक, श्रुतध्वज, बलानीक, जयानीक, जयाश्व, रथवाहन, चन्द्रोदय तथा समर्थ—ये विराटके श्रेष्ठ भाई और इन भाइयोंसहित मत्स्यराज विराट युद्ध करनेको तैयार हैं, नकुल, सहदेव, द्रौपदीके पुत्र तथा राक्षस घटोत्कच—ये वीर जिनके लिये युद्ध कर रहे हैं, उन पाण्डवोंकी कभी कोई क्षति नहीं हो सकती है ॥ ४१—४३ ॥
एते चान्ये च बहवो गुणाः पाण्डुसुतस्य वै । कामं खलु जगत्सर्वं सदेवासुरमानुषम् ॥ ४४ ॥ सयक्षराक्षसगणं सभूतभुजगद्विपम् । निःशेषमस्त्रवीर्येण कुर्वीते भीमफाल्गुनौ ॥ ४५ ॥ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके ये तथा और भी बहुत-से गुण हैं। भीमसेन और अर्जुन यदि चाहें तो अपने अस्त्रबलसे देवता, असुर, मनुष्य, यक्ष, राक्षस, भूत, नाग और हाथियोंसहित इस सम्पूर्ण जगत्का सर्वथा विनाश कर सकते हैं ॥
युधिष्ठिरश्च पृथिवीं निर्दहेद् घोरचक्षुषा । अप्रमेयबलः शौरिर्येषामर्थे च दंशितः ॥ ४६ ॥ कथं तान् संयुगे कर्ण जेतुमुत्सहसे परान् । युधिष्ठिर भी यदि रोषभरी दृष्टिसे देखें तो इस भूमण्डलको भस्म कर सकते हैं। कर्ण! जिनके लिये अनन्त बलशाली भगवान् श्रीकृष्ण भी कवच धारण करके लड़नेको तैयार हैं, उन शत्रुओंको युद्धमें जीतनेका साहस तुम कैसे कर रहे हो? ॥ ४६ १/२ ॥
महानपनयस्त्वेष नित्यं हि तव सूतज ॥ ४७ ॥ यस्त्वमुत्सहसे योद्धुं समरे शौरिणा सह । सूतपुत्र! तुम जो सदा समरभूमिमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ युद्ध करनेका उत्साह दिखाते हो, यह तुम्हारा महान् अन्याय (अक्षम्य अपराध) है ॥ ४७ १/२ ॥
संजय उवाच
एवमुक्तस्तु राधेयः प्रहसन् भरतर्षभ ॥ ४८ ॥ अब्रवीच्च तदा कर्णो गुरुं शारद्वतं कृपम् । **संजय कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ! उनके ऐसा कहनेपर राधापुत्र कर्ण ठठाकर हँस पड़ा और शरद्वान्के पुत्र गुरु कृपाचार्यसे उस समय यों बोला— ॥ ४८ १/२ ॥
सत्यमुक्तं त्वया ब्रह्मन् पाण्डवान् प्रति यद् वचः ॥ ४९ ॥ एते चान्ये च बहवो गुणाः पाण्डुसुतेषु वै । ‘बाबाजी! पाण्डवोंके विषयमें तुमने जो बात कही है वह सब सत्य है। यही नहीं, पाण्डवोंमें और भी बहुत-से गुण हैं ॥ ४९ १/२ ॥
अजय्याश्च रणे पार्था देवैरपि सवासवैः ।। ५० ।।
सदैत्ययक्षगन्धर्वैः पिशाचोरगराक्षसैः ।
'यह भी ठीक है कि कुन्तीके पुत्रोंको रणभूमिमें इन्द्र आदि देवता, दैत्य, यक्ष, गन्धर्व, पिशाच, नाग और राक्षस भी जीत नहीं सकते ।। ५० १/२ ।।
तथापि पार्थाञ्जेष्यामि शक्त्या वासवदत्तया ।। ५१ ।।
मम ह्यमोघा दत्तेयं शक्तिः शक्रेण वै द्विज ।
एतया निहनिष्यामि सव्यसाचिनमाहवे ।। ५२ ।।
'तथापि मैं इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे कुन्तीके पुत्रोंको जीत लूँगा। ब्रह्मन्! मुझे इन्द्रने यह अमोघ शक्ति दे रखी है; इसके द्वारा मैं सव्यसाची अर्जुनको युद्धमें अवश्य मार डालूँगा ।। ५१-५२ ।।
हते तु पाण्डवे कृष्णे भ्रातरश्चास्य सोदराः ।
अनर्जुना न शक्ष्यन्ति महीं भोक्तुं कथञ्चन ।। ५३ ।।
'पाण्डुपुत्र अर्जुनके मारे जानेपर उनके बिना उनके सहोदर भाई किसी तरह इस पृथ्वीका राज्य नहीं भोग सकेंगे ।। ५३ ।।
तेषु नष्टेषु सर्वेषु पृथिवीयं ससागरा ।
अयत्नात् कौरवेन्द्रस्य वशे स्थास्यति गौतम ।। ५४ ।।
'गौतम! उन सबके नष्ट हो जानेपर बिना किसी प्रयत्नके ही यह समुद्रसहित सारी पृथ्वी कौरवराज दुर्योधनके वशमें हो जायगी ।। ५४ ।।
सुनीतैरिह सर्वार्थाः सिध्यन्ते नात्र संशयः ।
एतमर्थमहं ज्ञात्वा ततो गर्जामि गौतम ।। ५५ ।।
'गौतम! इस संसारमें सुनीतिपूर्ण प्रयत्नोंसे सारे कार्य सिद्ध होते हैं, इसमें संशय नहीं है। इस बातको समझकर ही मैं गर्जना करता हूँ ।। ५५ ।।
त्वं तु विप्रश्च वृद्धश्च अशक्तश्चापि संयुगे ।
कृतस्नेहश्च पार्थेषु मोहान्मामवमन्यसे ।। ५६ ।।
'तुम तो ब्राह्मण और उसमें भी बूढ़े हो। तुममें युद्ध करनेकी शक्ति है ही नहीं। इसके सिवा, तुम कुन्तीके पुत्रोंपर स्नेह रखते हो; इसलिये मोहवश मेरा अपमान कर रहे हो ।। ५६ ।।
यद्येवं वक्ष्यसे भूयो ममाप्रियमिह द्विज ।
ततस्ते खड्गमुद्यम्य जिह्वां छेत्स्यामि दुर्मते ।। ५७ ।।
'दुर्बुद्धि ब्राह्मण! यदि यहाँ पुनः इस प्रकार मुझे अप्रिय लगनेवाली बात बोलोगे तो मैं अपनी तलवार उठाकर तुम्हारी जीभ काट लूँगा ।। ५७ ।।
यच्चापि पाण्डवान् विप्र स्तोतुमिच्छसि संयुगे ।
भीषयन् सर्वसैन्यानि कौरवेयाणि दुर्मते ।। ५८ ।।
अत्रापि शृणु मे वाक्यं यथावद् ब्रुवतो द्विज । ‘ब्रह्मन्! दुर्मते! तुम तो युद्धस्थलमें समस्त कौरव-सेनाओंको भयभीत करनेके लिये पाण्डवोंके गुण गाना चाहते हो, उसके विषयमें भी मैं जो यथार्थ बात कह रहा हूँ, उसे सुन लो ॥ ५८ १/२ ॥
दुर्योधनश्च द्रोणश्च शकुनिर्दुर्मुखो जयः ॥ ५९ ॥ दुःशासनो वृषसेनो मद्रराजस्त्वमेव च । सोमदत्तश्च भूरिश्च तथा द्रौणिर्विविंशतिः ॥ ६० ॥ तिष्ठेयुर्दंशिता यत्र सर्वे युद्धविशारदाः । जयेदेतान् नरः को नु शक्रतुल्यबलोऽप्यरिः ॥ ६१ ॥ ‘दुर्योधन, द्रोण, शकुनि, दुर्मुख, जय, दुःशासन, वृषसेन, मद्रराज शल्य, तुम स्वयं, सोमदत्त, भूरि, अश्वत्थामा और विविंशति—ये युद्धकुशल सम्पूर्ण वीर जहाँ कवच बाँधकर खड़े हो जायँगे, वहाँ इन्हें कौन मनुष्य जीत सकता है? वह इन्द्रके तुल्य बलवान् शत्रु ही क्यों न हो (इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता) ॥
शूराश्च हि कृतास्त्राश्च बलिनः स्वर्गलिप्सवः । धर्मज्ञा युद्धकुशला हन्युर्युद्धे सुरानपि ॥ ६२ ॥ ‘जो शूरवीर, अस्त्रोंके ज्ञाता, बलवान्, स्वर्गप्राप्तिकी अभिलाषा रखनेवाले, धर्मज्ञ और युद्धकुशल हैं वे देवताओंको भी युद्धमें मार सकते हैं ॥ ६२ ॥
एते स्थास्यन्ति संग्रामे पाण्डवानां वधार्थिनः । जयमाकाङ्क्षमाणा हि कौरवेयस्य दंशिताः ॥ ६३ ॥ ‘ये वीरगण कुरुराज दुर्योधनकी जय चाहते हुए पाण्डवोंके वधकी इच्छासे संग्राममें कवच बाँधकर डट जायँगे ॥ ६३ ॥
दैवायत्तमहं मन्ये जयं सुबलिनामपि । यत्र भीष्मो महाबाहुः शेते शरशताचितः ॥ ६४ ॥ ‘मैं तो बड़े-से-बड़े बलवानोंकी भी विजय दैवके ही अधीन मानता हूँ। दैवाधीन होनेके कारण महाबाहु भीष्म आज सैकड़ों बाणोंसे विद्ध होकर रणभूमिमें शयन करते हैं ॥ ६४ ॥
विकर्णश्चित्रसेनश्च बाह्लीकोऽथ जयद्रथः । भूरिश्रवा जयश्चैव जलसंधः सुदक्षिणः ॥ ६५ ॥ शलश्च रथिनां श्रेष्ठो भगदत्तश्च वीर्यवान् । एते चान्ये च राजानो देवैरपि सुदुर्जयाः ॥ ६६ ॥ ‘विकर्ण, चित्रसेन, बाह्लीक, जयद्रथ, भूरिश्रवा, जय, जलसंध, सुदक्षिण, रथियोंमें श्रेष्ठ शल तथा पराक्रमी भगदत्त—ये और दूसरे भी बहुत-से राजा देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्जय थे ॥ ६५-६६ ॥