भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1163, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1163

जयं ते प्रतिदास्यामि वासवस्येव पावकिः । प्रियं तव मया कार्यमिति जीवामि पार्थिव ॥ ७ ॥ जैसे अग्निकुमार कार्तिकेयने तारकासुरका विनाश करके इन्द्रको विजय दिलायी थी, उसी प्रकार मैं आज तुम्हें विजय प्रदान करूँगा। भूपाल! मुझे तुम्हारा प्रिय करना है, इसीलिये जीवन धारण करता हूँ ॥ ७ ॥

सर्वेषामेव पार्थानां फाल्गुनो बलवत्तरः । तस्यामोघां विमोक्ष्यामि शक्तिं शक्रविनिर्मिताम् ॥ ८ ॥ कुन्तीके सभी पुत्रोंमें अर्जुन ही अधिक शक्तिशाली हैं, अतः मैं इन्द्रकी दी हुई अमोघ शक्तिको अर्जुनपर ही छोड़ूँगा ॥ ८ ॥

तस्मिन् हते महेष्वासे भ्रातरस्तस्य मानद । तव वश्या भविष्यन्ति वनं यास्यन्ति वा पुनः ॥ ९ ॥ मानद! महाधनुर्धर अर्जुनके मारे जानेपर उनके सभी भाई तुम्हारे वशमें हो जायँगे अथवा पुनः वनमें चले जायँगे ॥ ९ ॥

मयि जीवति कौरव्य विषादं मा कृथाः क्वचित् । अहं जेष्यामि समरे सहितान् सर्वपाण्डवान् ॥ १० ॥ कुरुनन्दन! तुम मेरे जीते-जी कभी विषाद न करो। मैं समरभूमिमें संगठित होकर आये हुए समस्त पाण्डवोंको जीत लूँगा ॥ १० ॥

पांचालान् केकयांश्चैव वृष्णींश्चापि समागतान् । बाणौघैः शकलीकृत्य तव दास्यामि मेदिनीम् ॥ ११ ॥ मैं अपने बाणसमूहोंद्वारा रणभूमिमें पधारे हुए पांचालों, केकयों और वृष्णिवंशियोंके भी टुकड़े-टुकड़े करके यह सारी पृथ्वी तुम्हें दे दूँगा ॥ ११ ॥

संजय उवाच

एवं ब्रुवाणं कर्णं तु कृपः शारद्वतोऽब्रवीत् । स्मयन्निव महाबाहुः सूतपुत्रमिदं वचः ॥ १२ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! इस तरहकी बातें करते हुए सूतपुत्र कर्णसे शरद्वान्‌के पुत्र महाबाहु कृपाचार्यने मुसकराते हुए-से यह बात कही— ॥ १२ ॥

शोभनं शोभनं कर्ण सनाथः कुरुपुङ्गवः । त्वया नाथेन राधेय वचसा यदि सिध्यति ॥ १३ ॥ ‘कर्ण! बहुत अच्छा, बहुत अच्छा! राधापुत्र! यदि बात बनानेसे ही कार्य सिद्ध हो जाय, तब तो तुम-जैसे सहायकको पाकर कुरुराज दुर्योधन सनाथ हो गये ॥ १३ ॥

बहुशः कत्थसे कर्ण कौरवस्य समीपतः । न तु ते विक्रमः कश्चिद् दृश्यते फलमेव वा ॥ १४ ॥