महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1164, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘कर्ण! तुम कुरुनन्दन सुयोधनके समीप तो बहुत बढ़कर बातें किया करते हो; किंतु न तो कभी कोई तुम्हारा पराक्रम देखा जाता है और न उसका कोई फल ही सामने आता है॥ १४॥
समागमः पाण्डुसुतैर्दृष्टस्ते बहुशो युधि।
सर्वत्र निर्जितश्चासि पाण्डवैः सूतनन्दन॥ १५॥
‘सूतनन्दन! पाण्डुके पुत्रोंसे युद्धस्थलमें तुम्हारी अनेकों बार मुठभेड़ हुई है; परंतु सर्वत्र पाण्डवोंसे तुम्हीं परास्त हुए हो॥ १५॥
ह्रियमाणे तदा कर्ण गन्धर्वैर्धृतराष्ट्रजे।
तदायुध्यन्त सैन्यानि त्वमेकोऽग्रेऽपलायिथाः॥ १६॥
‘कर्ण! याद है कि नहीं, जब गन्धर्व दुर्योधनको पकड़कर लिये जा रहे थे, उस समय सारी सेना तो युद्ध कर रही थी और अकेले तुम ही सबसे पहले पलायन कर गये थे॥ १६॥
विराटनगरे चापि समेताः सर्वकौरवाः।
पार्थेन निर्जिता युद्धे त्वं च कर्ण सहानुजः॥ १७॥
‘कर्ण! विराट नगरमें भी सम्पूर्ण कौरव एकत्र हुए थे; किंतु अर्जुनने अकेले ही वहाँ सबको हरा दिया था। कर्ण! तुम भी अपने भाइयोंके साथ परास्त हुए थे॥ १७॥
एकस्याप्यसमर्थस्त्वं फाल्गुनस्य रणाजिरे।
कथमुत्सहसे जेतुं सकृष्णान् सर्वपाण्डवान्॥ १८॥
‘समरांगणमें अकेले अर्जुनका सामना करनेकी भी तुममें शक्ति नहीं है; फिर श्रीकृष्णसहित सम्पूर्ण पाण्डवोंको जीत लेनेका उत्साह कैसे दिखाते हो?॥
अब्रुवन् कर्ण युध्यस्व कत्थसे बहु सूनज।
अनुक्त्वा विक्रमेद् यस्तु तद् वै सत्पुरुषव्रतम्॥ १९॥
‘सूतपुत्र कर्ण! चुपचाप युद्ध करो। तुम बातें बहुत बनाते हो। जो बिना कुछ कहे ही पराक्रम दिखाये, वही वीर है और वैसा करना ही सत्पुरुषोंका व्रत है॥ १९॥
गर्जित्व सूतपुत्र त्वं शारदाभ्रमिवाफलम्।
निष्फलो दृश्यसे कर्ण तच्च राजा न बुध्यते॥ २०॥
‘सूतपुत्र कर्ण! तुम शरद्-ऋतुके निष्फल बादलोंके समान गर्जना करके भी निष्फल ही दिखायी देते हो; किंतु राजा दुर्योधन इस बातको नहीं समझ रहे हैं॥
तावद् गर्जस्व राधेय यावत् पार्थं न पश्यसि।
आरात् पार्थं हि ते दृष्ट्वा दुर्लभं गर्जितं पुनः॥ २१॥
‘राधानन्दन! जबतक तुम अर्जुनको नहीं देखते हो, तभीतक गर्जना कर लो। कुन्तीकुमार अर्जुनको समीप देख लेनेपर फिर यह गर्जना तुम्हारे लिये दुर्लभ हो जायगी॥
त्वमनासाद्य तान् बाणान् फाल्गुनस्य विगर्जसि।