महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
निहताः समरे शूराः पाण्डवैर्बलवत्तराः । किमन्यद् दैवसंयोगान्मन्यसे पुरुषाधम ॥ ६७ ॥ ‘परंतु उन अत्यन्त प्रबल तथा शूरवीर नरेशोंको भी पाण्डवोंने युद्धमें मार डाला। पुरुषाधम! तुम इसमें दैवसंयोगके सिवा दूसरा कौन-सा कारण मानते हो? ।।
यांश्च तान् स्तौषि सततं दुर्योधनरिपून् द्विज । तेषामपि हताः शूराः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ६८ ॥ ‘ब्रह्मन्! तुम दुर्योधनके जिन शत्रुओंकी सदा स्तुति करते रहते हो, उनके भी तो सैकड़ों और सहस्रों शूरवीर मारे गये हैं ।। ६८ ।।
क्षीयन्ते सर्वसैन्यानि कुरूणां पाण्डवैः सह । प्रभावं नात्र पश्यामि पाण्डवानां कथंचन ॥ ६९ ॥ ‘कौरव तथा पाण्डव दोनों दलोंकी सारी सेनाएँ प्रतिदिन नष्ट हो रही हैं। मुझे इसमें किसी प्रकार भी पाण्डवोंका कोई विशेष प्रभाव नहीं दिखायी देता है ।।
यस्तान् बलवतो नित्यं मन्यसे त्वं द्विजाधम । यतिष्येऽहं यथाशक्ति योद्धुं तैः सह संयुगे । दुर्योधनहितार्थाय 'जयो दैवे प्रतिष्ठितः' ॥ ७० ॥ ‘द्विजाधम! तुम जिन्हें सदा बलवान् मानते रहते हो, उन्हींके साथ मैं संग्रामभूमिमें दुर्योधनके हितके लिये यथाशक्ति युद्ध करनेका प्रयत्न करूँगा। विजय तो दैवके अधीन है’ ।। ७० ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे कृपकर्णवाक्येऽष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें कृपाचार्य और कर्णका विवादविषयक एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५८ ।।
१५९-
एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
अश्वत्थामाका कर्णको मारनेके लिये उद्यत होना, दुर्योधनका उसे मनाना, पाण्डवों और पाञ्चालोंका कर्णपर आक्रमण, कर्णका पराक्रम, अर्जुनके द्वारा कर्णकी पराजय तथा दुर्योधनका अश्वत्थामासे पांचालोंके वधके लिये अनुरोध
संजय उवाच
तथा परुषितं दृष्ट्वा सूतपुत्रेण मातुलम् ।
खड्गमुद्यम्य वेगेन द्रौणिरभ्यपतद् द्रुतम् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार अपने मामाके प्रति सूतपुत्र कर्णको कटु वचन सुनाते देख अश्वत्थामा बड़े वेगसे तलवार उठाकर तुरंत कर्णपर टूट पड़ा ॥ १ ॥
ततः परमसंक्रुद्धः सिंहो मत्तमिव द्विपम् ।
प्रेक्षतः कुरुराजस्य द्रौणिः कर्णं समभ्ययात् ॥ २ ॥
जैसे सिंह मतवाले हाथीपर झपटता है, उसी प्रकार अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए द्रोणकुमार अश्वत्थामाने कुरुराज दुर्योधनके देखते-देखते कर्णपर आक्रमण किया ॥ २ ॥
अश्वत्थामोवाच
यदर्जुनगुणांस्तथ्यान् कीर्तयानं नराधम ।
शूरं द्वेषात् सुदुर्बुद्धे त्वं भर्त्सयसि मातुलम् ॥ ३ ॥
विकत्थमानः शौर्येण सर्वलोकधनुर्धरम् ।
दर्पोत्सेधगृहीतोऽद्य न कञ्चिद् गणयन् मृधे ॥ ४ ॥
**अश्वत्थामाने कहा—**दुर्बुद्धि! नराधम! मेरे मामा सम्पूर्ण जगत्के श्रेष्ठ धनुर्धर एवं शूरवीर हैं। ये अर्जुनके सच्चे गुणोंका बखान कर रहे थे, तो भी तू द्वेषवश अपनी शूरताकी डींग हाँकता हुआ और घमण्डमें आकर आज युद्धमें किसीको कुछ न समझता हुआ जो इन्हें फटकार रहा है, उसका क्या कारण है? ॥ ३-४ ॥
क्व ते वीर्यं क्व चास्त्राणि यत्त्वां निर्जित्य संयुगे ।
गाण्डीवधन्वा हतवान् प्रेक्षतस्ते जयद्रथम् ॥ ५ ॥
जब युद्धस्थलमें गाण्डीवधारी अर्जुनने तुझे परास्त करके तेरे देखते-देखते जयद्रथको मार डाला था, उस समय तेरा पराक्रम कहाँ था? तेरे वे अस्त्र-शस्त्र कहाँ चले गये
थे? ॥ ५ ॥
येन साक्षान्महादेवो योधितः समरे पुरा ।
तमिच्छसि वृथा जेतुं सूताधम मनोरथैः ॥ ६ ॥
सूताधम! जिन्होंने समरांगणमें पहले साक्षात् महादेवजीके साथ युद्ध किया है, उन्हें केवल मनोरथोंद्वारा जीतनेकी तू व्यर्थ इच्छा प्रकट कर रहा है ॥ ६ ॥
यं हि कृष्णेन सहितं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ।
जेतुं न शक्ताः सहिताः सेन्द्रा अपि सुरसुराः ॥ ७ ॥
लोकैकवीरमजितमर्जुनं सूत संयुगे ।
किं पुनस्त्वं सुदुर्बुद्धे सहैभिर्वसुधाधिपैः ॥ ८ ॥
दुर्बुद्धि! सूत! जो सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं तथा श्रीकृष्णके साथ रहनेपर जिन्हें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी जीतनेमें समर्थ नहीं हैं, उन्हीं लोकके एकमात्र अपराजित वीर अर्जुनको जीतनेके लिये इन राजाओंसहित तेरी क्या शक्ति है? ॥ ७-८ ॥
कर्ण पश्य सुदुर्बुद्धे तिष्ठेदानीं नराधम ।
एष तेऽद्य शिरः कायादुद्धरामि सुदुर्मते ॥ ९ ॥
दुर्बुद्धि नराधम! कर्ण! तू देख और खड़ा रह। दुर्मते! मैं अभी तेरा सिर धड़से उतार लेता हूँ ॥ ९ ॥
संजय उवाच
समुद्यतं तु वेगेन राजा दुर्योधनः स्वयम् ।
न्यवारयन्महातेजाः कृपश्च द्विपदां वरः ॥ १० ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार वेगपूर्वक उठे हुए अश्वत्थामाको महातेजस्वी स्वयं राजा दुर्योधन तथा मनुष्योंमें श्रेष्ठ कृपाचार्यने रोका ॥ १० ॥
कर्ण उवाच
शूरोऽयं समरश्लाघी दुर्मतिश्च द्विजाधमः ।
आसादयतु मद्दर्यं मुञ्चेमं कुरुसत्तम ॥ ११ ॥
**कर्ण बोला—**कुरुश्रेष्ठ! यह दुर्बुद्धि एवं नीच ब्राह्मण बड़ा शूरवीर बनता है और युद्धकी श्लाघा रखता है। तुम इसे छोड़ दो। आज यह मेरे पराक्रमका सामना करे ॥ ११ ॥
अश्वत्थामोवाच
तवैतत् क्षम्यतेऽस्माभिः सूतात्मज सुदुर्मते ।
दर्पमुत्सिक्कमेतत् ते फाल्गुनो नाशयिष्यति ॥ १२ ॥
**अश्वत्थामाने कहा—**दुर्बुद्धि सूतपुत्र! हमलोग तेरे इस अपराधको क्षमा करते हैं। तेरे इस बढ़े हुए घमण्डका नाश अर्जुन करेंगे ॥ १२ ॥
दुर्योधन उवाच
अश्वत्थामन् प्रसीदस्व क्षन्तुमर्हसि मानद ।
कोपः खलु न कर्तव्यः सूतपुत्रे कथंचन ॥ १३ ॥
दुर्योधन बोला— दूसरोंको मान देनेवाले (भाई) अश्वत्थामा! प्रसन्न होओ। तुम्हें क्षमा करना चाहिये। सूतपुत्र कर्णपर तुम्हें किसी प्रकार भी क्रोध करना उचित नहीं है ॥ १३ ॥
त्वयि कर्णे कृपे द्रोणे मद्रराजेऽथ सौबले ।
महत् कार्यं समासक्तं प्रसीद द्विजसत्तम ॥ १४ ॥
द्विजश्रेष्ठ! तुमपर, कर्णपर तथा कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, मद्रराज शल्य और शकुनिपर महान् कार्यभार रखा गया है; तुम प्रसन्न होओ ॥ १४ ॥
एते ह्यभिमुखाः सर्वे राधेयेन युयुत्सवः ।
आयान्ति पाण्डवा ब्रह्मन्नाह्वयन्तः समन्ततः ॥ १५ ॥
ब्रह्मन्! ये सामने राधापुत्र कर्णके साथ युद्धकी अभिलाषा रखकर समस्त पाण्डव-सैनिक सब ओरसे ललकारते आ रहे हैं ॥ १५ ॥
संजय उवाच
प्रसाद्यमानस्तु ततो राज्ञा द्रौणिर्महामनाः ।
प्रससाद महाराज क्रोधवेगसमन्वितः ॥ १६ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! राजा दुर्योधनके मनानेपर क्रोधके वेगसे युक्त महामना अश्वत्थामा शान्त एवं प्रसन्न हो गया ॥ १६ ॥
ततः कृपोऽप्युवाचेदमाचार्यः सुमहामनाः ।
सौम्यस्वभावाद् राजेन्द्र क्षिप्रमागतमार्दवः ॥ १७ ॥
राजेन्द्र! तत्पश्चात् सौम्य स्वभावके कारण शीघ्र ही मृदुता आ जानेसे महामना कृपाचार्य भी शान्त हो गये और इस प्रकार बोले ॥ १७ ॥
कृप उवाच
तवैतत् क्षम्यतेऽस्माभिः सूतात्मज सुदुर्मते ।
दर्पमुत्सिक्तमेतत् ते फाल्गुनो नाशयिष्यति ॥ १८ ॥
कृपाचार्यने कहा— दुर्बुद्धि सूतपुत्र! हमलोग तो तेरे इस अपराधको क्षमा कर देते हैं; परंतु अर्जुन तेरे इस बढ़े हुए घमंडका अवश्य नाश करेंगे ॥ १८ ॥
संजय उवाच
ततस्ते पाण्डवा राजन् पञ्चालाश्च यशस्विनः ।
आजग्मुः सहिताः कर्णं तर्जयन्तः समन्ततः ॥ १९ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! तदनन्तर वे यशस्वी पाण्डव और पांचाल एक साथ होकर गर्जन-तर्जन करते हुए चारों ओरसे कर्णपर चढ़ आये ॥ १९ ॥
कर्णोऽपि रथिनां श्रेष्ठश्चापमुद्यम्य वीर्यवान् ।
कौरवाग्र्यैः परिवृतः शक्रो देवगणैरिव ॥ २० ॥
पर्यतिष्ठत तेजस्वी स्वबाहुबलमाश्रितः ।
रथियोंमें श्रेष्ठ, पराक्रमी एवं तेजस्वी वीर कर्ण भी देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रके समान प्रधान कौरववीरोंसे घिरकर अपने बाहुबलका भरोसा करके धनुष उठाकर युद्धके लिये खड़ा हो गया ॥ २० १/२ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं कर्णस्य सह पाण्डवैः ॥ २१ ॥
भीषणं सुमहाराज सिंहनादविराजितम् ।
महाराज! तदनन्तर कर्णका पाण्डवोंके साथ भीषण युद्ध आरम्भ हुआ, जो सिंहनादसे सुशोभित हो रहा था ॥
ततस्ते पाण्डवा राजन् पञ्चालाश्च यशस्विनः ॥ २२ ॥
दृष्ट्वा कर्णं महाबाहुमुच्चैः शब्दमथानदन् ।
राजन्! यशस्वी पाण्डव और पांचालोंने महाबाहु कर्णको देखकर उच्चस्वरसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया ॥ २२ १/२ ॥
अयं कर्णः कुतः कर्णस्तिष्ठ कर्ण महारणे ॥ २३ ॥
युध्यस्व सहितोऽस्माभिर्दुरात्मन् पुरुषाधम ।
'कहाँ कर्ण है? यह कर्ण है। दुरात्मन् नराधम कर्ण! इस महायुद्धमें खड़ा रह और हमारे साथ युद्ध कर' ॥ २३ १/२ ॥
अन्ये तु दृष्ट्वा राधेयं क्रोधरक्तेक्षणाऽब्रुवन् ॥ २४ ॥
हन्यतामयमुत्सिक्तः सूतपुत्रोऽल्पचेतनः ।
सर्वैः पार्थिवशार्दूलैर्नानेनार्थोऽस्ति जीवता ॥ २५ ॥
अत्यन्तवैरी पार्थानां सततं पापपूरुषः ।
एष मूलमनर्थानां दुर्योधनमते स्थितः ॥ २६ ॥
घ्नतैनमिति जल्पन्तः क्षत्रियाः समुपाद्रवन् ।
महता शरवर्षेण च्छादयन्तो महारथाः ॥ २७ ॥
वधार्थं सूतपुत्रस्य पाण्डवेयेन चोदिताः ।
दूसरे लोगोंने राधापुत्र कर्णको देखकर क्रोधसे लाल आँखें करके कहा—'समस्त श्रेष्ठ राजा मिलकर इस घमंडी और मूर्ख सूतपुत्रको मार डालें। इसके जीनेसे कोई लाभ नहीं है। यह पापात्मा पुरुष सदा कुन्तीकुमारोंके साथ अत्यन्त वैर रखता आया है। दुर्योधनकी रायमें रहकर यही सारे अनर्थोंकी जड़ बना हुआ है। अतः इसे मार डालो।' ऐसा कहते हुए समस्त क्षत्रिय महारथी पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे सूतपुत्रके वधके लिये प्रेरित हो बाणोंकी बड़ी भारी वर्षाद्वारा उसे आच्छादित करते हुए उसपर टूट पड़े ॥ २४—२७ १/२ ॥
तांस्तु सर्वांस्तथा दृष्ट्वा धावमानान् महारथान् ॥ २८ ॥
न विव्यथे सूतपुत्रो न च त्रासमगच्छत ।
उन समस्त महारथियोंको इस प्रकार धावा करते देख सूतपुत्रके मनमें न तो व्यथा हुई और न त्रास ही हुआ ॥ २८ १/२ ॥
दृष्ट्वा संहारकल्पं तमुद्धूतं सैन्यसागरम् ॥ २९ ॥
पिप्रीषुस्तव पुत्राणां संग्रामेष्वपराजितः ।
सायकौघेन बलवान् क्षिप्रकारी महाबलः ॥ ३० ॥
वारयामास तत् सैन्यं समन्ताद् भरतर्षभ ।
भरतश्रेष्ठ! प्रलयकालके समान उस सैन्यसागरको उमड़ा हुआ देख संग्राममें पराजित न होनेवाले बलवान्, शीघ्रकारी और महान् शक्तिशाली कर्णने आपके पुत्रोंको प्रसन्न करनेकी इच्छासे बाणसमूहकी वर्षा करके सब ओरसे शत्रुओंकी उस सेनाको रोक दिया ॥ २९-३० १/२ ॥
ततस्तु शरवर्षेण पार्थिवास्तमवारयन् ॥ ३१ ॥
धनूंषि ते विधुन्वानाः शतशोऽथ सहस्रशः ।
अयोधयन्त राधेयं शक्रं दैत्यगणा इव ॥ ३२ ॥
तदनन्तर सैकड़ों और सहस्रों नरेशोंने अपने धनुषोंको कम्पित करते हुए बाणोंकी वर्षासे कर्णकी भी प्रगति रोक दी। जैसे दैत्योंने इन्द्रके साथ संग्राम किया था, उसी प्रकार वे राजालोग राधापुत्र कर्णके साथ युद्ध करने लगे ॥ ३१-३२ ॥
शरवर्षं तु तत् कर्णः पार्थिवैः समुदीरितम् ।
शरवर्षेण महता समन्ताद् व्यकिरत् प्रभो ॥ ३३ ॥
प्रभो! राजाओंन्द्वारा की हुई उस बाण-वर्षाको कर्णने बाणोंकी बड़ी भारी वृष्टि करके सब ओर बिखेर दिया ॥ ३३ ॥
तद् युद्धमभवत् तेषां कृतप्रतिकृतैषिणाम् ।
यथा देवासुरे युद्धे शक्रस्य सह दानवैः ॥ ३४ ॥
जैसे देवासुर-संग्राममें दानवोंके साथ इन्द्रका युद्ध हुआ था, उसी प्रकार घात-प्रतिघातकी इच्छावाले राजाओं तथा कर्णका वह युद्ध बड़ा भयंकर हो रहा था ॥
तत्राद्भुतमपश्याम सूतपुत्रस्य लाघवम् ।
यदेनं सर्वतो यत्ता नाप्नुवन्ति परे युधि ॥ ३५ ॥ वहाँ हमने सूतपुत्र कर्णकी अद्भुत फुर्ती देखी, जिससे सब ओरसे प्रयत्न करनेपर भी शत्रुपक्षीय योद्धा उस युद्धस्थलमें कर्णको काबूमें नहीं कर पा रहे थे ॥ निवार्य च शरौघांस्तान् पार्थिवानां महारथः । युगेष्वीषासु छत्रेषु ध्वजेषु च हयेषु च ॥ ३६ ॥ आत्मनामाङ्कितान् घोरान् राधेयः प्राहिणोच्छरान् । राजाओंके उन बाणसमूहोंका निवारण करके महारथी राधापुत्र कर्णने उनके रथके जुओं, ईषादण्डों, छत्रों, ध्वजाओं तथा घोड़ोंपर अपने नाम खुदे हुए भयंकर बाणोंका प्रहार किया ॥ ३६ १/२ ॥ ततस्ते व्याकुलीभूता राजानः कर्णपीडिताः ॥ ३७ ॥ बभ्रमुस्तत्र तत्रैव गावः शीतार्दिता इव । तत्पश्चात् कर्णके बाणोंसे पीड़ित और व्याकुल हुए राजालोग सर्दीसे कष्ट पानेवाली गायोंके समान इधर-उधर चक्कर काटने लगे ॥ ३७ १/२ ॥ हयानां वध्यमानानां गजानां रथिनां तथा ॥ ३८ ॥ तत्र तत्राभ्यवेक्षाम संघान् कर्णेन ताडितान् । कर्णके बाणोंकी चोट खाकर मरनेवाले घोड़ों, हाथियों और रथियोंके झुंड-के-झुंड हमने वहाँ देखे थे ॥ शिरोभिः पतितै राजन् बाहुभिश्च समन्ततः ॥ ३९ ॥ आस्तीर्णा वसुधा सर्वा शूराणामनिवर्तिनाम् । राजन्! युद्धमें पीठ न दिखानेवाले शूरवीरोंके कट-कटकर गिरे हुए मस्तकों और भुजाओंसे वहाँकी सारी भूमि सब ओरसे पट गयी थी ॥ ३९ १/२ ॥ हतैश्च हन्यमानैश्च निष्टनद्भिश्च सर्वशः ॥ ४० ॥ बभूवायोधनं रौद्रं वैवस्वतपुरोपमम् । कुछ लोग मारे गये थे, कुछ मारे जा रहे थे और कुछ लोग सब ओर पीड़ासे कराह रहे थे। इससे वह युद्धस्थल यमपुरीके समान भयंकर प्रतीत होता था ॥ ततो दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् ॥ ४१ ॥ अश्वत्थामानमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह । उस समय राजा दुर्योधनने कर्णका पराक्रम देख अश्वत्थामाके पास पहुँचकर यह बात कही— ॥ ४१ १/२ ॥ युध्यतेऽसौ रणे कर्णो दंशितः सर्वपार्थिवैः ॥ ४२ ॥ पश्यैतां द्रवतीं सेनां कर्णसायकपीडिताम् । कार्तिकेयेन विध्वस्तामासुरीं पृतनामिव ॥ ४३ ॥
'रणभूमिमें वह कवचधारी कर्ण समस्त राजाओंके साथ अकेला ही युद्ध कर रहा है। देखो, कर्णके बाणोंसे पीड़ित हुई यह पाण्डव-सेना कार्तिकेयके द्वारा नष्ट की हुई असुरवाहिनीके समान भागी जा रही है ।। ४२-४३ ।।
दृष्ट्वैतां निर्जितां सेनां रणे कर्णेन धीमता ।
अभियात्येष बीभत्सुः सूतपुत्रजिघांसया ।। ४४ ।।
'बुद्धिमान् कर्णके द्वारा रणभूमिमें पराजित हुई इस सेनाको देखकर सूतपुत्रका वध करनेकी इच्छासे ये अर्जुन आगे बढ़े जा रहे हैं ।। ४४ ।।
तद् यथा प्रेक्षमाणानां सूतपुत्रं महारथम् ।
न हन्यात् पाण्डवः संख्ये तथा नीतिर्विधीयताम् ।। ४५ ।।
'अतः हमलोगोंके देखते-देखते युद्धमें पाण्डुपुत्र अर्जुन-जैसे भी महारथी सूतपुत्रको न मार सकें, वैसी नीतिसे काम लो' ।। ४५ ।।
ततो द्रौणिः कृपः शल्यो हार्दिक्यश्च महारथः ।
प्रत्युद्ययुस्तदा पार्थं सुतपुत्रपरीप्सया ।। ४६ ।।
आयान्तं वीक्ष्य कौन्तेयं शक्रं दैत्यचमूमिव ।
तब दैत्य-सेनापर आक्रमण करनेवाले इन्द्रके समान अर्जुनको कौरव-सेनाकी ओर आते देख अश्वत्थामा, कृपाचार्य शल्य और महारथी कृतवर्मा सूतपुत्रकी रक्षा करनेकी इच्छासे अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ।। ४६ १/२ ।।
बीभत्सुरपि राजेन्द्र पञ्चालैरभिसंवृतः ।। ४७ ।।
प्रत्युद्ययौ तदा कर्णं यथा वृत्रं शतक्रतुः ।
राजेन्द्र! उस समय वृत्रासुरपर चढ़ाई करनेवाले इन्द्रके समान पांचालोंसे घिरे हुए अर्जुनने भी कर्णपर धावा किया ।। ४७ १/२ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
संरब्धं फाल्गुनं दृष्ट्वा कालान्तकयमोपमम् ।। ४८ ।।
कर्णो वैकर्तनः सूत प्रत्यपद्यत् किमुत्तरम् ।
**धृतराष्ट्रने पूछा—**सूत! काल, अन्तक और यमके समान क्रोधमें भरे हुए अर्जुनको देखकर वैकर्तन कर्णने उन्हें किस प्रकार उत्तर दिया? (कैसे उनका सामना किया) ।। ४८ १/२ ।।
यो ह्यस्पर्धत पार्थेन नित्यमेव महारथः ।। ४९ ।।
आशंसते च बीभत्सुं युद्धे जेतुं सुदारुणम् ।
महारथी कर्ण सदा ही अर्जुनके साथ स्पर्धा रखता था और युद्धमें अत्यन्त भयंकर अर्जुनको पराजित करनेका विश्वास प्रकट करता था ।। ४९ १/२ ।।
स तु तं सहसा प्राप्तं नित्यमत्यन्तवैरिणम् ।। ५० ।।
कर्णो वैकर्तनः सूत किमुत्तरमपद्यत ।
संजय! उस समय अपने सदाके अत्यन्त वैरी अर्जुनको सहसा सामने पाकर सूर्यपुत्र कर्णने उन्हें किस प्रकार उत्तर देनेका निश्चय किया? ॥ ५० ½ ॥
संजय उवाच
आयान्तं पाण्डवं दृष्ट्वा गजं प्रतिगजो यथा ॥ ५१ ॥
असम्भ्रान्तो रणे कर्णः प्रत्युदीयाद् धनंजयम् ।
**संजयने कहा—**राजन्! जैसे एक हाथीको आते देख दूसरा हाथी उसका सामना करनेके लिये आगे बढ़े, उसी प्रकार पाण्डुपुत्र धनंजयको आते देख कर्ण बिना किसी घबराहटके युद्धमें उनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा ॥ ५१ ½ ॥
तमापतन्तं वेगेन वैकर्तनमजिह्मगैः ॥ ५२ ॥
छादयामास पार्थोऽथ कर्णस्तु विजयं शरैः ।
वेगसे आते हुए वैकर्तन कर्णको अर्जुनने अपने सीधे जानेवाले बाणोंसे आच्छादित कर दिया और कर्णने भी अर्जुनको अपने बाणोंसे ढक दिया ॥ ५२ ½ ॥
स कर्णं शरजालेन छादयामास पाण्डवः ॥ ५३ ॥
ततः कर्णः सुसंरब्धः शरैस्त्रिभिरविध्यत ।
पाण्डुपुत्र अर्जुनने पुनः अपने बाणोंके जालसे कर्णको आच्छादित कर दिया। तब क्रोधमें भरे हुए कर्णने तीन बाणोंसे अर्जुनको बींध डाला ॥ ५३ ½ ॥
तस्य तल्लाघवं पार्थो नामृष्यत महाबलः ॥ ५४ ॥
तस्मै बाणान् शिलाधौतान् प्रसन्नाग्रानजिह्मगान् ।
प्राहिणोत् सूतपुत्राय त्रिशतं शत्रुतापनः ॥ ५५ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले महाबली अर्जुन कर्णकी इस फुर्तीको न सह सके। उन्होंने सूतपुत्र कर्णको शिलापर तेज किये हुए स्वच्छ अग्रभागवाले तीन सौ बाण मारे ॥ ५४-५५ ॥
विव्याध चैनं संरब्धो बाणेनैकेन वीर्यवान् ।
सव्ये भुजाग्रे बलवान् नाराचेन हसन्निव ॥ ५६ ॥
इसके सिवा कुपित हुए पराक्रमी एवं बलवान् अर्जुनने हँसते हुए-से एक नाराच नामक बाणके द्वारा कर्णकी बायीं भुजाके अग्रभागमें चोट पहुँचायी ॥ ५६ ॥
तस्य विद्धस्य बाणेन कराच्चापं पपात ह ।
पुनरादाय तच्चापं निमेषार्धान्महाबलः ॥ ५७ ॥
छादयामास बाणौघैः फाल्गुनं कृतहस्तवत् ।
उस बाणसे घायल हुए कर्णके हाथसे धनुष छूटकर गिर पड़ा। फिर आधे निमेषमें ही उस महाबली वीरने पुनः वह धनुष लेकर सिद्धहस्त योद्धाकी भाँति बाणसमूहोंकी वर्षा करके अर्जुनको ढक दिया ॥ ५७ १/२ ॥
शरवृष्टिं तु तां मुक्तां सूतपुत्रेण भारत ॥ ५८ ॥
व्यधमच्छरवर्षेण स्मयन्निव धनंजयः।
भारत! सूतपुत्रद्वारा की हुई उस बाण-वर्षाको अर्जुनने मुसकराते हुए-से बाणोंकी वृष्टि करके नष्ट कर दिया ॥
तौ परस्परमासाद्य शरवर्षेण पार्थिव ॥ ५९ ॥
छादयेतां महेष्वासौ कृतप्रतिकृतैषिणौ ।
राजन्! वे दोनों महाधनुर्धर वीर आघातका प्रतिघात करनेकी इच्छासे परस्पर बाणोंकी वर्षा करके एक-दूसरेको आच्छादित करने लगे ॥ ५९ १/२ ॥
तदद्भुतं महद् युद्धं कर्णपाण्डवयोर्मध्ये ॥ ६० ॥
क्रुद्धयोर्वासिताहेतोर्वन्ययोर्गजयोरिव ।
जैसे दो जंगली हाथी किसी हथिनीके लिये क्रोधपूर्वक लड़ रहे हों, उसी प्रकार उस युद्धस्थलमें कर्ण और अर्जुनका वह संग्राम महान् एवं अद्भुत था ॥
ततः पार्थो महेष्वासो दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् ॥ ६१ ॥
मुष्टिदेशे धनुस्तस्य चिच्छेद त्वरयान्वितः।
तदनन्तर महाधनुर्धर अर्जुनने कर्णका पराक्रम देखकर उसके धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे शीघ्रतापूर्वक काट दिया ॥ ६१ १/२ ॥
अश्वांश्च चतुरो भल्लैरनयद् यमसादनम् ॥ ६२ ॥
सारथेश्च शिरः कायादहरच्छत्रुतापनः।
साथ ही उसके चारों घोड़ोंको चार भल्लोंद्वारा यमलोक पहुँचा दिया। फिर शत्रुसंतापी अर्जुनने उसके सारथिका सिर धड़से अलग कर दिया ॥ ६२ १/२ ॥
अथैनं छिन्नधन्वानं हताश्वं हतसारथिम् ॥ ६३ ॥
विव्याध सायकैः पार्थश्चतुर्भिः पाण्डुनन्दनः ।
धनुष कट जाने और घोड़ों तथा सारथिके मारे जानेपर कर्णको पाण्डुनन्दन अर्जुनने चार बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ६३ १/२ ॥
हताश्वात् तु रथात् तूर्णमवप्लुत्य नरर्षभः ॥ ६४ ॥
आरुरोह रथं तूर्णं कृपस्य शरपीडितः ।
जिसके घोड़े मारे गये थे, उस रथसे तुरंत उतरकर बाणपीड़ित कर्ण शीघ्रतापूर्वक कृपाचार्यके रथपर चढ़ गया ॥ ६४ १/२ ॥
स नुन्नोऽर्जुनबाणौघैराचितः शल्यको यथा ॥ ६५ ॥
जीवितार्थमभिप्रेप्सुः कृपस्य रथमारुहत् ।
अर्जुनके बाणसमूहोंसे पीड़ित और व्याप्त होकर वह काँटोंसे भरे हुए साहीके समान जान पड़ता था। अपने प्राण बचानेके लिये कर्ण कृपाचार्यके रथपर जा बैठा था ।। ६५ १/२ ।।
राधेयं निर्जितं दृष्ट्वा तावका भरतर्षभ ।। ६६ ।।
धनंजयशरैर्नुन्नाः प्राद्रवन्त दिशो दश ।
भरतश्रेष्ठ! राधापुत्र कर्णको पराजित हुआ देख आपके सैनिक अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित हो दसों दिशाओंमें भाग चले ।। ६६ १/२ ।।
द्रवतस्तान् समालोक्य राजा दुर्योधनो नृप ।। ६७ ।।
निवर्तयामास तदा वाक्यमेतदुवाच ह ।
नरेश्वर! उन्हें भागते देख राजा दुर्योधनने लौटाया और उस समय उनसे यह बात कही — ।। ६७ १/२ ।।
अलं द्रुतेन वः शूरास्तिष्ठध्वं क्षत्रियर्षभाः ।। ६८ ।।
एष पार्थवधायाहं स्वयं गच्छामि संयुगे ।
अहं पार्थान् हनिष्यामि सपञ्चालान् ससोमकान् ।। ६९ ।।
‘क्षत्रियशिरोमणि शूरवीरो! ठहरो, तुम्हारे भागनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। मैं स्वयं अभी अर्जुनका वध करनेके लिये युद्धभूमिमें चलता हूँ। मैं पांचालों और सोमकोंसहित कुन्तीकुमारोंका वध करूँगा ।। ६८-६९ ।।
अद्य मे युध्यमानस्य सह गाण्डीवधन्वना ।
द्रक्ष्यन्ति विक्रमं पार्थाः कालस्येव युगक्षये ।। ७० ।।
‘आज गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ युद्ध करते समय कुन्तीके सभी पुत्र प्रलयकालमें कालके समान मेरा पराक्रम देखेंगे ।। ७० ।।
अद्य मद्बाणजालानि विमुक्तानि सहस्रशः ।
द्रक्ष्यन्ति समरे योधाः शलभानामिवायतीः ।। ७१ ।।
‘आज समरांगणमें सहस्रों योद्धा मेरे छोड़े हुए हजारों बाणसमूहोंको शलभोंकी पंक्तियोंके समान देखेंगे ।।
अद्य बाणमयं वर्षं सृजतो मम धन्विनः ।
जीमूतस्येव घर्मान्ते द्रक्ष्यन्ति युधि सैनिकाः ।। ७२ ।।
‘जैसे वर्षाकालमें मेघ जलकी वर्षा करता है, उसी प्रकार धनुष हाथमें लेकर मेरे द्वारा की हुई बाणमयी वर्षाको आज युद्धस्थलमें समस्त सैनिक देखेंगे ।। ७२ ।।
जेष्याम्यद्य रणे पार्थं सायकैर्नतपर्वभिः ।
तिष्ठध्वं समरे शूरा भयं त्यजत फाल्गुनात् ।। ७३ ।।
‘आज रणभूमिमें झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा मैं अर्जुनको जीत लूँगा। शूरवीरो! तुम समरभूमिमें डटे रहो और अर्जुनसे भय छोड़ दो ।। ७३ ।।
न हि मद्वीर्यमासाद्य फाल्गुनः प्रसहिष्यति । यथा वेलां समासाद्य सागरो मकरालयः ॥ ७४ ॥ 'जैसे समुद्र तटभूमितक पहुँचकर शान्त हो जाता है, उसी प्रकार अर्जुन मेरे समीप आकर मेरा पराक्रम नहीं सह सकेंगे' ॥ ७४ ॥
इत्युक्त्वा प्रययौ राजा सैन्येन महता वृतः । फाल्गुनं प्रति दुर्धर्षः क्रोधात् संरक्तलोचनः ॥ ७५ ॥ ऐसा कहकर दुर्धर्ष राजा दुर्योधनने क्रोधसे लाल आँखें करके विशाल सेनाके साथ अर्जुनपर आक्रमण किया ॥
तं प्रयान्तं महाबाहुं दृष्ट्वा शारद्वतस्तदा । अश्वत्थामानमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ७६ ॥ महाबाहु दुर्योधनको अर्जुनके सामने जाते देख शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने उस समय अश्वत्थामाके पास जाकर यह बात कही— ॥ ७६ ॥
एष राजा महाबाहुरमर्षी क्रोधमूर्च्छितः । पतङ्गवृत्तिमास्थाय फाल्गुनं योद्धुमिच्छति ॥ ७७ ॥ 'यह अमर्षशील महाबाहु राजा दुर्योधन क्रोधसे अपनी सुधबुध खो बैठा है और पतंगोंकी वृत्तिका आश्रय ले अर्जुनके साथ युद्ध करना चाहता है ॥ ७७ ॥
यावन्नः पश्यमानानां प्राणान् पार्थेन संगतः । न जह्यात् पुरुषव्याघ्रस्तावद् वारय कौरवम् ॥ ७८ ॥ 'यह पुरुषसिंह नरेश अर्जुनसे भिड़कर हमारे देखते-देखते जबतक अपने प्राणोंको त्याग न दे, उसके पहले ही तुम जाकर उस कुरुवंशी राजाको रोको ॥ ७८ ॥
यावत् फाल्गुनबाणानां गोचरं नाद्य गच्छति । कौरवः पार्थिवो वीरस्तावद् वारय संयुगे ॥ ७९ ॥ 'यह कौरववंशका वीर भूपाल आज जबतक अर्जुनके बाणोंकी पहुँचके भीतर नहीं जाता है, तभीतक इसे रोक दो ॥ ७९ ॥
यावत् पार्थशरैर्घोरैर्निर्मुक्तोरगसंनिभैः । न भस्मीक्रियते राजा तावद् युद्धान्निवार्यताम् ॥ ८० ॥ 'केंचुलसे छूटे हुए सर्पोंके समान अर्जुनके भयंकर बाणोंद्वारा जबतक राजा दुर्योधन भस्म नहीं कर दिया जाता है, तबतक ही उसे युद्धसे रोक दो ॥ ८० ॥
अयुक्तमिव पश्यामि तिष्ठत्स्वस्मासु मानद । स्वयं युद्धाय यद् राजा पार्थं यात्यसहायवान् ॥ ८१ ॥ 'मानद! यह मुझे अनुचित-सा दिखायी देता है कि हमलोगोंके रहते हुए स्वयं राजा दुर्योधन बिना किसी सहायकके अर्जुनके साथ युद्धके लिये जाय ॥ ८१ ॥
दुर्लभं जीवितं मन्ये कौरव्यस्य किरीटिना ।
युध्यमानस्य पार्थेन शार्दूलेनेव हस्तिनः ॥ ८२ ॥ ‘जैसे सिंहके साथ हाथी युद्ध करे तो उसका जीवित रहना असम्भव हो जाता है, उसी प्रकार किरीटधारी कुन्तीकुमार अर्जुनके साथ युद्धमें प्रवृत्त होनेपर कुरुवंशी दुर्योधनके जीवनको मैं दुर्लभ ही मानता हूँ’ ॥ ८२ ॥
मातुलेनैवमुक्तस्तु द्रौणिः शस्त्रभृतां वरः। दुर्योधनमिदं वाक्यं त्वरितः समभाषत ॥ ८३ ॥ मामाके ऐसा कहनेपर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणकुमार अश्वत्थामाने तुरंत ही दुर्योधनके पास जाकर इस प्रकार कहा— ॥ ८३ ॥
मयि जीवति गान्धारे न युद्धं गन्तुमर्हसि। मामनादृत्य कौरव्य तव नित्यं हितैषिणम् ॥ ८४ ॥ ‘गान्धारीनन्दन! कुरुकुलरत्न! मैं सदा तुम्हारा हित चाहनेवाला हूँ। तुम मेरे जीते-जी मेरा अनादर करके स्वयं युद्धमें न जाओ ॥ ८४ ॥
न हि ते सम्भ्रमः कार्यः पार्थस्य विजयं प्रति। अहमावारयिष्यामि पार्थं तिष्ठ सुयोधन ॥ ८५ ॥ ‘सुयोधन! अर्जुनपर विजय पानेके सम्बन्धमें तुम्हें किसी प्रकार संदेह नहीं करना चाहिये। तुम खड़े रहो। मैं अर्जुनको रोकूँगा’ ॥ ८५ ॥
दुर्योधन उवाच
आचार्यः पाण्डुपुत्रान् वै पुत्रवत् परिरक्षति। त्वमप्युपेक्षां कुरुषे तेषु नित्यं द्विजोत्तम ॥ ८६ ॥ दुर्योधन बोला—द्विजश्रेष्ठ! हमारे आचार्य तो अपने पुत्रकी भाँति पाण्डवोंकी रक्षा करते हैं और तुम भी सदा उनकी उपेक्षा ही करते हो ॥ ८६ ॥
मम वा मन्दभाग्यत्वान्मन्दस्ते विक्रमो युधि। धर्मराजप्रियार्थं वा द्रौपद्या वा न विद्म तत् ॥ ८७ ॥ अथवा मेरे दुर्भाग्यसे युद्धमें तुम्हारा पराक्रम मन्द पड़ गया है। तुम धर्मराज युधिष्ठिर अथवा द्रौपदीका प्रिय करनेके लिये ऐसा करते हो, इसका मुझे पता नहीं है ॥ ८७ ॥
धिगस्तु मम लुब्धस्य यत्कृते सर्वबान्धवाः। सुखार्हाः परमं दुःखं प्राप्नुवन्त्यपराजिताः ॥ ८८ ॥ मुझ लोभीको धिक्कार है, जिसके कारण किसीसे पराजित न होनेवाले और सुख भोगनेके योग्य मेरे सभी भाई-बन्धु महान् दुःख उठा रहे हैं ॥ ८८ ॥
को हि शस्त्रविदां मुख्यो महेश्वरसमो युधि। शत्रुं न क्षपयेच्छक्तो यो न स्याद् गौतमीसुतः ॥ ८९ ॥
कृपीकुमार अश्वत्थामाके सिवा दूसरा कौन ऐसा वीर है, जो शस्त्रवेत्ताओंमें प्रधान, महादेवजीके समान पराक्रमी तथा शक्तिशाली होकर भी युद्धमें शत्रुके संहार नहीं करेगा ।। ८९ ।।
अश्वत्थामन् प्रसीदस्व नाशयैतान् ममाहितान् । तवास्त्रगोचरे शक्ताः स्थातुं देवा न दानवाः ।। ९० ।। अश्वत्थामन्! प्रसन्न होओ। मेरे इन शत्रुओंका नाश करो। तुम्हारे अस्त्रोंके मार्गमें देवता और दानव भी नहीं ठहर सकते हैं ।। ९० ।।
पञ्चालान् सोमकांश्चैव जहि द्रौणे सहानुगान् । वयं शेषान् हनिष्यामस्त्वयैव परिरक्षिताः ।। ९१ ।। द्रोणकुमार! तुम अनुगामियोंसहित पांचालों और सोमकोंको मार डालो; फिर तुमसे ही सुरक्षित हो हमलोग अपने शेष शत्रुओंका संहार कर डालेंगे ।। ९१ ।।
एते हि सोमका विप्र पञ्चालाश्च यशस्विनः । मम सैन्येषु संक्रुद्धा विचरन्ति दवाग्निवत् ।। ९२ ।। तान् वारय महाबाहो केकयांश्च नरोत्तम । पुरा कुर्वन्ति निःशेषं रक्ष्यमाणाः किरीटिना ।। ९३ ।। विप्रवर! वे यशस्वी पांचाल और सोमक क्रोधमें भरकर दावानलके समान मेरी सेनाओंमें विचर रहे हैं। इन्हींके साथ केकय भी हैं। महाबाहो! नरश्रेष्ठ! वे किरीटधारी अर्जुनसे सुरक्षित हो मेरी सेनाका सर्वनाश न कर डालें। अतः पहले ही उन्हें रोको ।। ९२-९३ ।।
अश्वत्थामंस्त्वरायुक्तो याहि शीघ्रमरिंदम । आदौ वा यदि वा पश्चात् तवेदं कर्म मारिष ।। ९४ ।। शत्रुओंका दमन करनेवाले माननीय भाई अश्वत्थामा! तुम शीघ्र ही जाओ। पहले करो या पीछे; यह कार्य तुम्हारे ही वशका है ।। ९४ ।।
त्वमुत्पन्नो महाबाहो पञ्चालानां वधं प्रति । करिष्यसि जगत् सर्वमपाञ्चालं किलोद्यतः ।। ९५ ।। महाबाहो! तुम पांचालोंका वध करनेके लिये ही उत्पन्न हुए हो। यदि तुम तैयार हो जाओ तो निश्चय ही सारे जगत्को पांचालोंसे शून्य कर दोगे ।। ९५ ।।
एवं सिद्धाऽब्रुवन् वाचो भविष्यति च तत् तथा । तस्मात्त्वं पुरुषव्याघ्र पञ्चालाञ्जहि सानुगान् ।। ९६ ।। पुरुषसिंह! सिद्ध पुरुषोंने तुम्हारे विषयमें ऐसी ही बातें कही हैं। वे उसी रूपमें सत्य होंगी। अतः तुम सेवकोंसहित पांचालोंका वध करो ।। ९६ ।।
न तेऽस्त्रगोचरे शक्ताः स्थातुं देवाः सवासवाः । किमु पार्थाः सपाञ्चालाः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। ९७ ।।
मैं तुमसे यह सच कहता हूँ कि तुम्हारे बाणोंके मार्गमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी नहीं ठहर सकते; फिर कुन्तीके पुत्रों और पांचालोंकी तो बिसात ही क्या है? ॥ न त्वां समर्थाः संग्रामे पाण्डवाः सह सोमकैः । बलाद् योधयितुं वीर सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ९८ ॥ वीर! सोमकोंसहित पाण्डव संग्राममें तुम्हारे साथ बलपूर्वक युद्ध करनेमें समर्थ नहीं हैं। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ ॥ ९८ ॥ गच्छ गच्छ महाबाहो न नः कालात्ययो भवेत् । इयं हि द्रवते सेना पार्थसायकपीडिता ॥ ९९ ॥ महाबाहो! जाओ, जाओ। हमारे इस कार्यमें विलम्ब नहीं होना चाहिये। देखो, अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित होकर यह सेना भागी जा रही है ॥ ९९ ॥ शक्तो ह्यसि महाबाहो दिव्येन स्वेन तेजसा । निग्रहे पाण्डुपुत्राणां पञ्चालानां च मानद ॥ १०० ॥ दूसरोंको मान देनेवाले महाबाहु वीर! तुम अपने दिव्य तेजसे पांचालों और पाण्डवोंका निग्रह करनेमें समर्थ हो ॥ १०० ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे दुर्योधनवाक्ये एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें दुर्योधनका वचनविषयक एक सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५९ ॥
१६०-
षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
अश्वत्थामाका दुर्योधनको उपालम्भपूर्ण आश्वासन देकर पांचालोंके साथ युद्ध करते हुए धृष्टद्युम्नके रथसहित सारथिको नष्ट करके उसकी सेनाको भगाकर अद्भुत पराक्रम दिखाना
संजय उवाच
दुर्योधनेनैवमुक्तो द्रौणिराहवदुर्मदः ।
चकारारिवधे यत्नमिन्द्रो दैत्यवधे यथा ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! दुर्योधनके ऐसा कहनेपर रणदुर्मद अश्वत्थामाने उसी प्रकार शत्रुवधके लिये प्रयत्न आरम्भ किया, जैसे इन्द्र दैत्यवधके लिये यत्न करते हैं ॥ १ ॥
प्रत्युवाच महाबाहुस्तव पुत्रमिदं वचः ।
सत्यमेतन्महाबाहो यथा वदसि कौरव ॥ २ ॥
उस समय महाबाहु अश्वत्थामाने आपके पुत्रसे यह वचन कहा—'महाबाहु कौरवनन्दन! तुम जैसा कहते हो, यही ठीक है ॥ २ ॥
प्रिया हि पाण्डवा नित्यं मम चापि पितुश्च मे ।
तथैवावां प्रियौ तेषां न तु युद्धे कुरूद्वह ॥ ३ ॥
'कुरुश्रेष्ठ! पाण्डव मुझे तथा मेरे पिताजीको भी बहुत प्रिय हैं। इसी प्रकार उनको भी हम दोनों पिता-पुत्र प्रिय हैं, किंतु युद्धस्थलमें हमारा यह भाव नहीं रहता ॥ ३ ॥
शक्तितस्तात युध्यामस्त्यक्त्वा प्राणानभीतवत् ।
अहं कर्णश्च शल्यश्च कृपो हार्दिक्य एव च ।
निमेषात् पाण्डवीं सेनां क्षपयेम नृपोत्तम ॥ ४ ॥
'तात! हम अपने प्राणोंका मोह छोड़कर निर्भय-से होकर यथाशक्ति युद्ध करते हैं। नृपश्रेष्ठ! मैं, कर्ण, शल्य, कृप और कृतवर्मा पलक मारते-मारते पाण्डव-सेनाका संहार कर सकते हैं ॥ ४ ॥
ते चापि कौरवीं सेनां निमेषार्धात् कुरूद्वह ।
क्षपयेयुर्महाबाहो न स्याम यदि संयुगे ॥ ५ ॥
'महाबाहु कुरुश्रेष्ठ! यदि युद्धस्थलमें हमलोग न रहें, तो पाण्डव भी आधे निमेषमें ही कौरव-सेनाका संहार कर सकते हैं ॥ ५ ॥
युध्यतां पाण्डवान् शक्त्या तेषां चास्मान् युयुत्सताम् ।
तेजस्तेजः समासाद्य प्रशमं याति भारत ॥ ६ ॥
'हम यथाशक्ति पाण्डवोंसे युद्ध करते हैं और वे हमलोगोंसे युद्ध करना चाहते हैं। भारत! इस प्रकार हमारा तेज परस्पर एक-दूसरेसे टकराकर शान्त हो जाता है ॥ ६ ॥
अशक्या तरसा जेतुं पाण्डवानामनीकिनी ।
जीवत्सु पाण्डुपुत्रेषु तद्धि सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥
'राजन्! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि पाण्डवोंके जीते-जी उनकी सेनाको बलपूर्वक जीतना असम्भव है ॥
आत्मार्थं युध्यमानास्ते समर्थाः पाण्डुनन्दनाः ।
किमर्थं तव सैन्यानि न हनिष्यन्ति भारत ॥ ८ ॥
'भरतनन्दन! पाण्डव शक्तिशाली हैं और अपने लिये युद्ध करते हैं, फिर वे किसलिये तुम्हारी सेनाओंका संहार नहीं करेंगे? ॥ ८ ॥
त्वं तु लुब्धतमो राजन् निकृतिज्ञश्च कौरव ।
सर्वाभिशङ्की मानी च ततोऽस्मानभिशङ्कसे ॥ ९ ॥
'कौरवनरेश! तुम तो लोभी और छल-कपटकी विद्याको जाननेवाले हो। सबपर संदेह करनेवाले और अभिमानी हो; इसलिये हमलोगोंपर भी शंका करते हो ॥
मन्ये त्वं कुत्सितो राजन् पापात्मा पापपुरुष ।
अन्यानपि स नः क्षुद्र शङ्कसे पापभावितः ॥ १० ॥
'राजन्! मेरी मान्यता है कि तुम निन्दित, पापात्मा एवं पापपुरुष हो।' क्षुद्र नरेश! तुम्हारा अन्तःकरण पापभावनासे ही पूर्ण है, इसीलिये तुम हमपर तथा दूसरोंपर भी संदेह करते हो ॥ १० ॥
अहं तु यत्नमास्थाय त्वदर्थे त्यक्तजीवितः ।
एष गच्छामि संग्रामं त्वत्कृते कुरुनन्दन ॥ ११ ॥
'कुरुनन्दन! मैं अभी तुम्हारे लिये जीवनका मोह छोड़कर पूरा प्रयत्न करके संग्रामभूमिमें जा रहा हूँ ॥
योत्स्येऽहं शत्रुभिः सार्धं जेष्यामि च वरान् वरान् ।
पञ्चालैः सह योत्स्यामि सोमकैः केकयैस्तथा ॥ १२ ॥
पाण्डवेयैश्च संग्रामे त्वत्प्रियार्थमरिंदम ।
शत्रुदमन! मैं शत्रुओंके साथ युद्ध करूँगा और उनके प्रधान-प्रधान वीरोंपर विजय पाऊँगा। संग्रामभूमिमें तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मैं पांचालों, सोमकों, केकयों तथा पाण्डवोंके साथ भी युद्ध करूँगा ॥ १२ १/२ ॥
अद्य मद्बाणनिर्दग्धाः पञ्चालाः सोमकास्तथा ॥ १३ ॥
सिंहेनेवार्दिता गावो विद्रविष्यन्ति सर्वशः ।
'आज पांचाल और सोमक योद्धा मेरे बाणोंसे दग्ध होकर सिंहसे पीड़ित हुई गौओंके समान सब ओर भाग जायँगे ॥ १३ १/२ ॥
अद्य धर्मसुतो राजा दृष्ट्वा मम पराक्रमम् ।। १४ ।।
अश्वत्थाममयं लोकं मंस्यते सह सोमकैः ।
‘आज सोमकोंसहित धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर मेरा पराक्रम देखकर सम्पूर्ण जगत्को अश्वत्थामासे भरा हुआ मानेंगे ।। १४ १/२ ।।
आगमिष्यति निर्वेदं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।। १५ ।।
दृष्ट्वा विनिहतान् संख्ये पञ्चालान् सोमकैः सह ।
‘सोमकोंसहित पांचालोंको युद्धमें मारा गया देख आज धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके मनमें बड़ा निर्वेद (खेद एवं वैराग्य) होगा ।। १५ १/२ ।।
ये मां युद्धेऽभियोत्स्यन्ति तान् हनिष्यामि भारत ।। १६ ।।
न हि ते वीर मोक्ष्यन्ते मद्बाह्वन्तरमागताः ।
‘भारत! जो लोग रणभूमिमें मेरे साथ युद्ध करेंगे, उन्हें मैं मार डालूँगा। वीर! मेरी भुजाओंके भीतर आकर शत्रुसैनिक जीवित नहीं छूट सकेंगे’ ।। १६ १/२ ।।
एवमुक्त्वा महाबाहुः पुत्रं दुर्योधनं तव ।। १७ ।।
अभ्यवर्तत युद्धाय त्रासयन् सर्वधन्विनः ।
चिकीर्षुस्तव पुत्राणां प्रियं प्राणभृतां वरः ।। १८ ।।
आपके पुत्र दुर्योधनसे ऐसा कहकर महाबाहु अश्वत्थामा समस्त धनुर्धरोंको त्रास देता हुआ युद्धके लिये शत्रुओंके सामने डट गया। प्राणियोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामा आपके पुत्रोंका प्रिय करना चाहता था ।। १७-१८ ।।
ततोऽब्रवीत् सकैकेयान् पञ्चालान् गौतमीसुतः ।
प्रहरध्वमितः सर्वे मम गात्रे महारथाः ।। १९ ।।
स्थिरीभूताश्च युध्यध्वं दर्शयन्तोऽस्त्रलाघवम् ।
तदनन्तर गौतमीनन्दन अश्वत्थामाने केकयोंसहित पांचालोंसे कहा—‘महारथियो! अब सब लोग मिलकर मेरे शरीरपर प्रहार करो और अपनी अस्त्र-संचालनकी फुर्ती दिखाते हुए सुस्थिर होकर युद्ध करो’ ।। १९ १/२ ।।
एवमुक्तास्तु ते सर्वे शस्त्रवृष्टीरपातयन् ।। २० ।।
द्रौणिं प्रति महाराज जलं जलधरा इव ।
महाराज! अश्वत्थामाके ऐसा कहनेपर वे सभी वीर उसके ऊपर उसी प्रकार अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे, जैसे मेघ पर्वतपर पानी बरसाते हैं ।। २० १/२ ।।
तान् निहत्य शरान्द्रौणिर्दश वीरानपोथयत् ।। २१ ।।
प्रमुखे पाण्डुपुत्राणां धृष्टद्युम्नस्य च प्रभो ।
प्रभो! द्रोणकुमारने उनके उन बाणोंको नष्ट करके उनमेंसे दस वीरोंको पाण्डवों और धृष्टद्युम्नके सामने ही मार गिराया ।। २१ १/२ ।।
ते हन्यमानाः समरे पञ्चालाः सोमकास्तथा ॥ २२ ॥ परित्यज्य रणे द्रौणिं व्यद्रवन्त दिशो दश । समरांगणमें मारे जाते हुए पांचाल और सोमक द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको छोड़कर दसों दिशाओंमें भाग गये ॥
तान् दृष्ट्वा द्रवतः शूरान् पञ्चालान् सहसोमकान् ॥ २३ ॥ धृष्टद्युम्नो महाराज द्रौणिमभ्यद्रवद् रणे । महाराज! शूरवीर पांचालों और सोमकोंको भागते देख धृष्टद्युम्नने रणक्षेत्रमें अश्वत्थामापर धावा किया ॥
ततः काञ्चनचित्राणां सजलाम्बुदनादिनाम् ॥ २४ ॥ वृतः शतेन शूराणां रथानामनिवर्तिनाम् । पुत्रः पाञ्चालराजस्य धृष्टद्युम्नो महारथः ॥ २५ ॥ द्रौणिमित्यब्रवीद् वाक्यं दृष्ट्वा योधन् निपातितान् । तदनन्तर सुवर्णचित्रित, सजल जलधरके समान गम्भीर घोष करनेवाले तथा युद्धसे कभी पीठ न दिखानेवाले सौ रथों एवं शूरवीर रथियोंसे घिरे हुए पांचाल-राजकुमार महारथी धृष्टद्युम्नने अपने योद्धाओंको मारा गया देख द्रोणकुमार अश्वत्थामासे इस प्रकार कहा— ॥
आचार्यपुत्र दुर्बुद्धे किमन्यैर्निहतैस्तव ॥ २६ ॥ समागच्छ मया सार्धं यदि शूरोऽसि संयुगे । अहं त्वां निहनिष्यामि तिष्ठेदानीं ममाग्रतः ॥ २७ ॥ ‘खोटी बुद्धिवाले आचार्यपुत्र! दूसरोंको मारनेसे तुम्हें क्या लाभ है? यदि शूरमा हो तो रणक्षेत्रमें मेरे साथ भिड़ जाओ। इस समय मेरे सामने खड़े तो हो जाओ, मैं अभी तुम्हें मार डालूँगा’ ॥ २६-२७ ॥
ततस्तमाचार्यसुतं धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् । मर्मभिद्भिः शरैस्तीक्ष्णैर्जघान भरतर्षभ ॥ २८ ॥ भरतश्रेष्ठ! ऐसा कहकर प्रतापी धृष्टद्युम्नने मर्मभेदी एवं पैने बाणोंद्वारा आचार्यपुत्रको घायल कर दिया ॥ २८ ॥
ते तु पङ्क्तीकृता द्रौणिं शरा विविशुराशुगाः । रुक्मपुङ्खाः प्रसन्नाग्राः सर्वकायावदारणाः ॥ २९ ॥ मध्वर्थिन इवोद्दाम भ्रमराः पुष्पितं द्रुमम् । सुवर्णमय पंख और स्वच्छ धारवाले, सबके शरीरोंको विदीर्ण करनेमें समर्थ वे शीघ्रगामी बाण श्रेणीबद्ध होकर अश्वत्थामाके शरीरमें वैसे ही घुस गये, जैसे मधुके लोभी उद्दाम भ्रमर फूले हुए वृक्षपर बैठ जाते हैं ॥ २९ १/२ ॥
सोऽतिविद्धो भृशं क्रुद्धः पदाक्रान्त इवोरगः ॥ ३० ॥ मानी द्रौणिरसम्भ्रान्तो बाणपाणिरभाषत ।
उन बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर मानी द्रोणकुमार पैरोंसे कुचले गये सर्पके समान अत्यन्त कुपित हो उठा और हाथमें बाण लेकर संभ्रमरहित हो इस प्रकार बोला— ॥
धृष्टद्युम्न स्थिरो भूत्वा मुहूर्तं प्रतिपालय ॥ ३१ ॥ यावत् त्वां निशितैर्बाणैः प्रेषयामि यमक्षयम् । 'धृष्टद्युम्न! स्थिर होकर दो घड़ी और प्रतीक्षा कर लो' तबतक मैं तुम्हें अपने पैने बाणोंद्वारा यमलोक भेज देता हूँ' ॥ ३१ १/२ ॥
द्रौणिरेवमथाभाष्य पार्षतं परवीरहा ॥ ३२ ॥ छादयामास बाणौघैः समन्ताल्लघुहस्तवत् । शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अश्वत्थामाने ऐसा कहकर शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले कुशल योद्धाकी भाँति अपने बलसमूहोंद्वारा धृष्टद्युम्नको सब ओरसे आच्छादित कर दिया ॥ ३२ १/२ ॥
स बाध्यमानः समरे द्रौणिना युद्धदुर्मदः ॥ ३३ ॥ द्रौणिं पाञ्चालतनयो वाग्भिरातर्जयत् तदा । समरांगणमें अश्वत्थामाद्वारा पीड़ित होनेपर रणदुर्मद पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने उसे वाणीद्वारा डाँट बतायी और इस प्रकार कहा— ॥ ३३ १/२ ॥
न जानीषे प्रतिज्ञां मे विप्रोत्पत्तिं तथैव च ॥ ३४ ॥ द्रोणं हत्वा किल मया हन्तव्यस्त्वं सुदुर्मते । 'दुर्बुद्धि ब्राह्मण! क्या तू मेरी प्रतिज्ञा और उत्पत्तिका वृत्तान्त नहीं जानता? निश्चय ही, मुझे पहले द्रोणाचार्यका वध करके फिर तेरा विनाश करना है ॥ ३४ १/२ ॥
ततस्त्वाहं न हन्म्यद्य द्रोणे जीवति संयुगे ॥ ३५ ॥ इमां तु रजनीं प्राप्तामप्रभातां सुदुर्मते । निहत्य पितरं तेऽद्य ततस्त्वामपि संयुगे ॥ ३६ ॥ नेष्यामि प्रेतलोकाय ह्येतन्मे मनसि स्थितम् । 'इसीलिये द्रोणके जीते-जी अभी युद्धस्थलमें तेरा वध नहीं कर रहा हूँ। दुर्मते! इसी रातमें प्रभात होनेसे पहले आज तेरे पिताका वध करके फिर तुझे भी युद्धस्थलमें प्रेतलोकको भेज दूँगा। यही मेरे मनका निश्चित विचार है ॥ ३५-३६ १/२ ॥
यस्ते पार्थेषु विद्वेषो या भक्तिः कौरवेषु च ॥ ३७ ॥ तां दर्शय स्थिरो भूत्वा न मे जीवन् विमोक्ष्यसे । 'कुन्तीके पुत्रोंके प्रति जो तेरा द्वेषभाव और कौरवोंके प्रति जो भक्तिभाव है, उसे स्थिर होकर दिखा। तू जीते-जी मेरे हाथसे छुटकारा नहीं पा सकेगा ॥ ३७ १/२ ॥
यो हि ब्राह्मण्यमुत्सृज्य क्षत्रधर्मरतो द्विजः ॥ ३८ ॥ स वध्यः सर्वलोकस्य यथा त्वं पुरुषाधमः ।