भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1185

मैं तुमसे यह सच कहता हूँ कि तुम्हारे बाणोंके मार्गमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी नहीं ठहर सकते; फिर कुन्तीके पुत्रों और पांचालोंकी तो बिसात ही क्या है? ॥ न त्वां समर्थाः संग्रामे पाण्डवाः सह सोमकैः । बलाद् योधयितुं वीर सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ९८ ॥ वीर! सोमकोंसहित पाण्डव संग्राममें तुम्हारे साथ बलपूर्वक युद्ध करनेमें समर्थ नहीं हैं। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ ॥ ९८ ॥ गच्छ गच्छ महाबाहो न नः कालात्ययो भवेत् । इयं हि द्रवते सेना पार्थसायकपीडिता ॥ ९९ ॥ महाबाहो! जाओ, जाओ। हमारे इस कार्यमें विलम्ब नहीं होना चाहिये। देखो, अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित होकर यह सेना भागी जा रही है ॥ ९९ ॥ शक्तो ह्यसि महाबाहो दिव्येन स्वेन तेजसा । निग्रहे पाण्डुपुत्राणां पञ्चालानां च मानद ॥ १०० ॥ दूसरोंको मान देनेवाले महाबाहु वीर! तुम अपने दिव्य तेजसे पांचालों और पाण्डवोंका निग्रह करनेमें समर्थ हो ॥ १०० ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे दुर्योधनवाक्ये एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें दुर्योधनका वचनविषयक एक सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५९ ॥