भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1184

कृपीकुमार अश्वत्थामाके सिवा दूसरा कौन ऐसा वीर है, जो शस्त्रवेत्ताओंमें प्रधान, महादेवजीके समान पराक्रमी तथा शक्तिशाली होकर भी युद्धमें शत्रुके संहार नहीं करेगा ।। ८९ ।।

अश्वत्थामन् प्रसीदस्व नाशयैतान् ममाहितान् । तवास्त्रगोचरे शक्ताः स्थातुं देवा न दानवाः ।। ९० ।। अश्वत्थामन्! प्रसन्न होओ। मेरे इन शत्रुओंका नाश करो। तुम्हारे अस्त्रोंके मार्गमें देवता और दानव भी नहीं ठहर सकते हैं ।। ९० ।।

पञ्चालान् सोमकांश्चैव जहि द्रौणे सहानुगान् । वयं शेषान् हनिष्यामस्त्वयैव परिरक्षिताः ।। ९१ ।। द्रोणकुमार! तुम अनुगामियोंसहित पांचालों और सोमकोंको मार डालो; फिर तुमसे ही सुरक्षित हो हमलोग अपने शेष शत्रुओंका संहार कर डालेंगे ।। ९१ ।।

एते हि सोमका विप्र पञ्चालाश्च यशस्विनः । मम सैन्येषु संक्रुद्धा विचरन्ति दवाग्निवत् ।। ९२ ।। तान् वारय महाबाहो केकयांश्च नरोत्तम । पुरा कुर्वन्ति निःशेषं रक्ष्यमाणाः किरीटिना ।। ९३ ।। विप्रवर! वे यशस्वी पांचाल और सोमक क्रोधमें भरकर दावानलके समान मेरी सेनाओंमें विचर रहे हैं। इन्हींके साथ केकय भी हैं। महाबाहो! नरश्रेष्ठ! वे किरीटधारी अर्जुनसे सुरक्षित हो मेरी सेनाका सर्वनाश न कर डालें। अतः पहले ही उन्हें रोको ।। ९२-९३ ।।

अश्वत्थामंस्त्वरायुक्तो याहि शीघ्रमरिंदम । आदौ वा यदि वा पश्चात् तवेदं कर्म मारिष ।। ९४ ।। शत्रुओंका दमन करनेवाले माननीय भाई अश्वत्थामा! तुम शीघ्र ही जाओ। पहले करो या पीछे; यह कार्य तुम्हारे ही वशका है ।। ९४ ।।

त्वमुत्पन्नो महाबाहो पञ्चालानां वधं प्रति । करिष्यसि जगत् सर्वमपाञ्चालं किलोद्यतः ।। ९५ ।। महाबाहो! तुम पांचालोंका वध करनेके लिये ही उत्पन्न हुए हो। यदि तुम तैयार हो जाओ तो निश्चय ही सारे जगत्‌को पांचालोंसे शून्य कर दोगे ।। ९५ ।।

एवं सिद्धाऽब्रुवन् वाचो भविष्यति च तत् तथा । तस्मात्त्वं पुरुषव्याघ्र पञ्चालाञ्जहि सानुगान् ।। ९६ ।। पुरुषसिंह! सिद्ध पुरुषोंने तुम्हारे विषयमें ऐसी ही बातें कही हैं। वे उसी रूपमें सत्य होंगी। अतः तुम सेवकोंसहित पांचालोंका वध करो ।। ९६ ।।

न तेऽस्त्रगोचरे शक्ताः स्थातुं देवाः सवासवाः । किमु पार्थाः सपाञ्चालाः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। ९७ ।।