भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1183

युध्यमानस्य पार्थेन शार्दूलेनेव हस्तिनः ॥ ८२ ॥ ‘जैसे सिंहके साथ हाथी युद्ध करे तो उसका जीवित रहना असम्भव हो जाता है, उसी प्रकार किरीटधारी कुन्तीकुमार अर्जुनके साथ युद्धमें प्रवृत्त होनेपर कुरुवंशी दुर्योधनके जीवनको मैं दुर्लभ ही मानता हूँ’ ॥ ८२ ॥

मातुलेनैवमुक्तस्तु द्रौणिः शस्त्रभृतां वरः। दुर्योधनमिदं वाक्यं त्वरितः समभाषत ॥ ८३ ॥ मामाके ऐसा कहनेपर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणकुमार अश्वत्थामाने तुरंत ही दुर्योधनके पास जाकर इस प्रकार कहा— ॥ ८३ ॥

मयि जीवति गान्धारे न युद्धं गन्तुमर्हसि। मामनादृत्य कौरव्य तव नित्यं हितैषिणम् ॥ ८४ ॥ ‘गान्धारीनन्दन! कुरुकुलरत्न! मैं सदा तुम्हारा हित चाहनेवाला हूँ। तुम मेरे जीते-जी मेरा अनादर करके स्वयं युद्धमें न जाओ ॥ ८४ ॥

न हि ते सम्भ्रमः कार्यः पार्थस्य विजयं प्रति। अहमावारयिष्यामि पार्थं तिष्ठ सुयोधन ॥ ८५ ॥ ‘सुयोधन! अर्जुनपर विजय पानेके सम्बन्धमें तुम्हें किसी प्रकार संदेह नहीं करना चाहिये। तुम खड़े रहो। मैं अर्जुनको रोकूँगा’ ॥ ८५ ॥

दुर्योधन उवाच

आचार्यः पाण्डुपुत्रान् वै पुत्रवत् परिरक्षति। त्वमप्युपेक्षां कुरुषे तेषु नित्यं द्विजोत्तम ॥ ८६ ॥ दुर्योधन बोला—द्विजश्रेष्ठ! हमारे आचार्य तो अपने पुत्रकी भाँति पाण्डवोंकी रक्षा करते हैं और तुम भी सदा उनकी उपेक्षा ही करते हो ॥ ८६ ॥

मम वा मन्दभाग्यत्वान्मन्दस्ते विक्रमो युधि। धर्मराजप्रियार्थं वा द्रौपद्या वा न विद्म तत् ॥ ८७ ॥ अथवा मेरे दुर्भाग्यसे युद्धमें तुम्हारा पराक्रम मन्द पड़ गया है। तुम धर्मराज युधिष्ठिर अथवा द्रौपदीका प्रिय करनेके लिये ऐसा करते हो, इसका मुझे पता नहीं है ॥ ८७ ॥

धिगस्तु मम लुब्धस्य यत्कृते सर्वबान्धवाः। सुखार्हाः परमं दुःखं प्राप्नुवन्त्यपराजिताः ॥ ८८ ॥ मुझ लोभीको धिक्कार है, जिसके कारण किसीसे पराजित न होनेवाले और सुख भोगनेके योग्य मेरे सभी भाई-बन्धु महान् दुःख उठा रहे हैं ॥ ८८ ॥

को हि शस्त्रविदां मुख्यो महेश्वरसमो युधि। शत्रुं न क्षपयेच्छक्तो यो न स्याद् गौतमीसुतः ॥ ८९ ॥