महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1192, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनृत्यमानाविव रणे मण्डलीकृतकार्मुकौ । परस्परवधे यत्तौ सर्वभूतभयङ्करौ ॥ ४७ ॥ उस रणक्षेत्रमें धनुषको मण्डलाकार करके वे दोनों नृत्य-सा कर रहे थे। एक-दूसरेके वधके लिये प्रयत्नशील होकर समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर बन गये थे ॥ ४७ ॥
अयुध्येतां महाबाहू चित्रं लघु च सुष्ठु च । सम्पूज्यमानौ समरे योधमुख्यैः सहस्रशः ॥ ४८ ॥ वे महाबाहु वीर समरांगणमें समस्त श्रेष्ठ योद्धाओंद्वारा हजारों बार प्रशंसित होते हुए शीघ्रतापूर्वक और सुन्दर ढंगसे विचित्र युद्ध कर रहे थे ॥ ४८ ॥
तौ प्रबुद्धौ रणे दृष्ट्वा वने वन्यौ गजाविव । उभयोः सेनयोर्हर्षस्तुमुलः समपद्यत ॥ ४९ ॥ वनमें लड़नेवाले दो जंगली हाथियोंके समान उन दोनोंको युद्धमें जागरूक देखकर दोनों सेनाओंमें तुमुल हर्षनाद छा गया ॥ ४९ ॥
सिंहनादरवाश्चासन् दध्मुः शङ्खांश्च सैनिकाः । वादित्राण्यभ्यवाद्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ५० ॥ सब ओर सिंहनाद होने लगा। सैनिक शंखध्वनि करने लगे तथा सैकड़ों एवं सहस्रों प्रकारके रणवाद्य बजने लगे ॥ ५० ॥
तस्मिंस्तु तुमुले युद्धे भीरूणां भयवर्धने । मुहूर्तंमपि तद् युद्धं समरूपं तदाभवत् ॥ ५१ ॥ कायरोंका भय बढ़ानेवाले उस तुमुल संग्राममें दो घड़ीतक उन दोनोंका समान रूपसे युद्ध चलता रहा ॥
ततो द्रौणिर्महाराज पार्षतस्य महात्मनः । ध्वजं धनुस्तथा छत्रमुभौ च पार्ष्णिसारथी ॥ ५२ ॥ सूतमश्वांश्च चतुरो निहत्याभ्यद्रवद् रणे । महाराज! तदनन्तर द्रोणकुमारने महामना धृष्टद्युम्नके ध्वज, धनुष, छत्र, दोनों पार्श्वरक्षक, सारथि तथा चारों घोड़ोंको नष्ट करके उस युद्धमें बड़े वेगसे धावा किया ॥ ५२ ½ ॥
पञ्चालांश्चैव तान् सर्वान् बाणैः संनतपर्वभिः ॥ ५३ ॥ व्यद्रावयदमेयात्मा शतशोऽथ सहस्रशः । अनन्त आत्मबलसे सम्पन्न अश्वत्थामाने झुकी हुई गाँठवाले सैकड़ों और सहस्रों बाणोंद्वारा उन समस्त पांचालोंको दूर भगा दिया ॥ ५३ ½ ॥
ततस्तु विव्यथे सेना पाण्डवी भरतर्षभ ॥ ५४ ॥ दृष्ट्वा द्रौणेर्महत् कर्म वासवस्येव संयुगे ।