भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1193

भरतश्रेष्ठ! युद्धस्थलमें इन्द्रके समान अश्वत्थामाके उस महान् कर्मको देखकर पाण्डव-सेना व्यथित हो उठी ।। ५४ १/२ ।।

शतेन च शतं हत्वा पञ्चालानां महारथः ।। ५५ ।।
त्रिभिश्च निशितैर्बाणैर्हत्वा त्रीन् वै महारथान् ।
द्रौणिर्द्रुपदपुत्रस्य फाल्गुनस्य च पश्यतः ।। ५६ ।।
नाशयामास पञ्चालान् भूयिष्ठं ये व्यवस्थिताः ।
महारथी द्रोणकुमारने पहले सौ बाणोंसे सौ पांचाल योद्धाओंका वध करके फिर तीन पैने बाणोंद्वारा उनके तीन महारथियोंको भी मार गिराया और धृष्टद्युम्न तथा अर्जुनके देखते-देखते वहाँ जो बहुसंख्यक पांचाल योद्धा खड़े थे, उन सबको नष्ट कर दिया ।। ५५-५६ १/२ ।।

ते वध्यमानाः पञ्चालाः समरे सह सृञ्जयैः ।। ५७ ।।
अगच्छन् द्रौणिमुत्सृज्य विप्रकीर्णरथध्वजाः ।
समरभूमिमें मारे जाते हुए पांचाल और सृंजय सैनिक अश्वत्थामाको छोड़कर चल दिये, उनके रथ और ध्वजा नष्ट-भ्रष्ट होकर बिखर गये थे ।। ५७ १/२ ।।

स जित्वा समरे शत्रून् द्रोणपुत्रो महारथः ।। ५८ ।।
ननाद सुमहानादं तपान्ते जलदो यथा ।
इस प्रकार रणभूमिमें शत्रुओंको जीतकर महारथी द्रोणपुत्र वर्षाकालके मेघके समान जोर-जोरसे गर्जना करने लगा ।। ४८ १/२ ।।

स निहत्य बहून् शूरानश्वत्थामा व्यरोचत ।
युगान्ते सर्वभूतानि भस्म कृत्वेव पावकः ।। ५९ ।।
जैसे प्रलयकालमें अग्निदेव सम्पूर्ण भूतोंको भस्म करके प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार अश्वत्थामा वहाँ बहुसंख्यक शूरवीरोंका वध करके सुशोभित हो रहा था ।। ५९ ।।

सम्पूज्यमानो युधि कौरवेयै-
र्निर्जित्य संख्येऽरिगणान् सहस्रशः ।
व्यरोचत द्रोणसुतः प्रतापवान्
यथा सुरेन्द्रोऽरिगणान् निहत्य वै ।। ६० ।।
जैसे देवराज इन्द्र शत्रुओंका संहार करके सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार प्रतापी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा संग्राममें सहस्रों शत्रुसमूहोंको परास्त करके कौरवोंद्वारा पूजित एवं प्रशंसित होता हुआ बड़ी शोभा पा रहा था ।। ६० ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धेऽश्वत्थामपराक्रमे षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६० ।।