महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1252, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंऊरू निर्भिद्य चैकेन नकुलः पाण्डुनन्दनः ।। १५ ।।
श्येनं सपक्षं व्याधेन पातयामास तं तदा ।
इसके बाद एक पानीदार पैने एवं तीखे बाणसे पाण्डुनन्दन नकुलने शकुनिकी दोनों जाँघोंको विदीर्ण करके व्याधद्वारा विद्ध हुए पंखयुक्त बाज पक्षीके समान उसे गिरा दिया ।। १५ १/२ ।।
सोऽतिविद्धो महाराज रथोपस्थ उपाविशत् ।। १६ ।।
ध्वजयष्टिं परिक्क्लिश्य कामुकः कामिनीं यथा ।
महाराज! उस बाणसे अत्यन्त घायल हुआ शकुनि, जैसे कामी पुरुष कामिनीका आलिंगन करता है, उसी प्रकार ध्वज-यष्टि (ध्वजाके डंडे)-को दोनों भुजाओंसे पकड़कर रथके पिछले भागमें बैठ गया ।। १६ १/२ ।।
तं विसंज्ञं निपतितं दृष्ट्वा श्यालं तवानघ ।। १७ ।।
अपोवाह रथेनाशु सारथिर्ध्वजिनीमुखात् ।
निष्पाप नरेश! आपके सालेको बेहोश पड़ा देख सारथि रथके द्वारा शीघ्र ही उसे सेनाके आगेसे दूर हटा ले गया ।। १७ १/२ ।।
ततः संचुक्रुशुः पार्था ये च तेषां पदानुगाः ।। १८ ।।
निर्जित्य च रणे शत्रुं नकुलः शत्रुतापनः ।
अब्रवीत् सारथिं क्रुद्धो द्रोणानीकाय मां वह ।। १९ ।।
फिर तो कुन्तीके पुत्र और उनके सेवक बड़े जोरसे सिंहनाद करने लगे। इस प्रकार रणभूमिमें शत्रुको परास्त करके क्रोधमें भरे हुए शत्रुसंतापी नकुलने अपने सारथिसे कहा—‘सूत! मुझे द्रोणाचार्यकी सेनाके पास ले चलो’ ।। १८-१९ ।।
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा माद्रीपुत्रस्य सारथिः ।
प्रायात् तेन तदा राजन् यत्र द्रोणो व्यवस्थितः ।। २० ।।
राजन्! माद्रीकुमारका वह वचन सुनकर सारथि उस रथके द्वारा जहाँ द्रोणाचार्य खड़े थे, वहाँ तत्काल जा पहुँचा ।। २० ।।
शिखण्डिनं तु समरे द्रोणप्रेप्सुं विशाम्पते ।
कृपः शारद्वतो यत्तः प्रत्यगच्छत् सवेगितः ।। २१ ।।
प्रजानाथ! द्रोणाचार्यके साथ युद्धकी इच्छावाले शिखण्डीका समरभूमिमें सामना करनेके लिये प्रयत्नशील हो शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य बड़े वेगसे आगे बढ़े ।। २१ ।।
गौतमं द्रुतमायान्तं द्रोणानीकमरिंदमम् ।
विव्याध नवभिर्भल्लैः शिखण्डी प्रहसन्निव ।। २२ ।।
शत्रुओंको दमन करनेवाले, द्रोणरक्षक, गौतमगोत्रीय कृपाचार्यको शीघ्रतापूर्वक आते देख हँसते हुए-से शिखण्डीने उन्हें नौ भल्लोंसे बींध डाला ।। २२ ।।
तमाचार्यो महाराज विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः ।