भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1253

पुनर्विव्याध विंशत्या पुत्राणां प्रियकृत् तव ।। २३ ।। महाराज! तब आपके पुत्रोंका प्रिय करनेवाले कृपाचार्यने शिखण्डीको पाँच बाणोंसे बींधकर फिर बीस बाणोंसे घायल कर दिया ।। २३ ।।

महद् युद्धं तयोरासीद् घोररूपं भयानकम् । यथा देवासुरे युद्धे शम्बरामरराजयोः ।। २४ ।। पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर शम्बरासुर और इन्द्रमें जैसा युद्ध हुआ था, वैसा ही घोर भयानक एवं महान् युद्ध उन दोनोंमें भी हुआ ।। २४ ।।

शरजालावृतं व्योम चक्रतुस्तौ महारथौ । मेघाविव तपापाये वीरौ समरदुर्मदौ ।। २५ ।। उन दोनों रणदुर्मद वीर महारथियोंने वर्षाकालके दो मेघोंके समान आकाशको बाणसमूहोंसे व्याप्त कर दिया ।।

प्रकृत्या घोररूपं तदासीद् घोरतरं पुनः । रात्रिश्च भरतश्रेष्ठ योधानां युद्धशालिनाम् ।। २६ ।। कालरात्रिनिभा ह्यासीद् घोररूपा भयानका । भरतश्रेष्ठ! स्वभावसे ही भयंकर दिखायी देनेवाला आकाश उस समय और भी घोरतर हो उठा। युद्धभूमिमें शोभा पानेवाले योद्धाओंके लिये वह घोर एवं भयानक रात्रि कालरात्रिके समान प्रतीत होती थी ।। २६ १/२ ।।

शिखण्डी तु महाराज गौतमस्य महद् धनुः ।। २७ ।। अर्धचन्द्रेण चिच्छेद सज्यं सविशिखं तदा । महाराज! शिखण्डीने उस समय अर्धचन्द्राकार बाण मारकर प्रत्यंचा और बाणसहित कृपाचार्यके विशाल धनुषको काट दिया ।। २७ १/२ ।।

तस्य क्रुद्धः कृपो राजन् शक्तिं चिक्षेप दारुणाम् ।। २८ ।। स्वर्णदण्डामकुण्ठाग्रां कर्मारपरिमार्जिताम् । राजन्! तब कृपाचार्यने कुपित होकर सोनेके दण्ड और अप्रतिहत धारवाली तथा कारीगरके द्वारा साफ की हुई एक भयंकर शक्ति उसके ऊपर चलायी ।। २८ १/२ ।।

तामापतन्तीं चिच्छेद शिखण्डी बहुभिः शरैः ।। २९ ।। साऽपतन्मेदिनीं दीप्ता भासयन्ती महाप्रभा । अपने ऊपर आती हुई उस शक्तिको शिखण्डीने बहुत-से बाण मारकर काट दिया। वह अत्यन्त कान्तिमती एवं प्रकाशमान शक्ति खण्डित हो सब ओर प्रकाश बिखेरती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ी ।। २९ १/२ ।।

अथान्यद् धनुरादाय गौतमो रथिनां वरः ।। ३० ।। प्राच्छादयच्छितैर्बाणैर्महाराज शिखण्डिनम् ।