महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! तब रथियोंमें श्रेष्ठ कृपाचार्यने दूसरा धनुष हाथमें लेकर पैने बाणोंद्वारा शिखण्डीको ढक दिया ।। स च्छाद्यमानः समरे गौतमेन यशस्विना ।। ३१ ।। न्यषीदत रथोपस्थे शिखण्डी रथिनां वरः । समरभूमिमें यशस्वी कृपाचार्यद्वारा बाणोंसे आच्छादित किया जाता हुआ रथियोंमें श्रेष्ठ शिखण्डी रथके पिछले भागमें शिथिल होकर बैठ गया ।। ३१ १/२ ।। सीदन्तं चैनमालोक्य कृपः शारद्वतो युधि ।। ३२ ।। आजघ्ने बहुभिर्बाणैर्जिघांसन्निव भारत । भरतनन्दन! युद्धस्थलमें शिखण्डीको शिथिल हुआ देख शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने उसपर बहुत-से बाणोंका प्रहार किया, मानो वे उसे मार डालना चाहते हों ।। ३२ १/२ ।। विमुखं तु रणे दृष्ट्वा याज्ञसेनिं महारथम् ।। ३३ ।। पञ्चालाः सोमकाश्चैव परिवव्रुः समन्ततः । राजा द्रुपदके उस महारथी पुत्रको युद्धविमुख हुआ देख पांचालों और सोमकोंने उसे चारों ओरसे घेरकर अपने बीचमें कर लिया ।। ३३ १/२ ।। तथैव तव पुत्राश्च परिवव्रुर्द्विजोत्तमम् ।। ३४ ।। महत्या सेनया सार्धं ततो युद्धमवर्तत । इसी प्रकार आपके पुत्रोंने भी विशाल सेनाके साथ आकर द्विजश्रेष्ठ कृपाचार्यको अपने बीचमें कर लिया। फिर दोनों दलोंमें घोर युद्ध होने लगा ।। ३४ १/२ ।। रथानां च रणे राजन्नन्योन्यमभिधावताम् ।। ३५ ।। बभूव तुमुलः शब्दो मेघानां गर्जतामिव । राजन्! रणभूमिमें परस्पर धावा करनेवाले रथोंकी घर्घराहटका भयंकर शब्द मेघोंकी गर्जनाके समान जान पड़ता था ।। ३५ १/२ ।। द्रवतां सादिनां चैव गजानां च विशाम्पते ।। ३६ ।। अन्योन्यमभितो राजन् क्रूरमायोधनं बभौ । प्रजापालक नरेश! चारों ओर एक-दूसरेपर आक्रमण करनेवाले घुड़सवारों और हाथीसवारोंके संघर्षसे वह रणभूमि अत्यन्त दारुण प्रतीत होने लगी ।। ३६ १/२ ।। पत्तीनां द्रवतां चैव पादशब्देन मेदिनी ।। ३७ ।। अकम्पत महाराज भयत्रस्तेव चाङ्गना । महाराज! दौड़ते हुए पैदल सैनिकोंके पैरोंकी धमकसे यह पृथ्वी भयभीत अबलाके समान काँपने लगी ।। ३७ १/२ ।। रथिनो रथमारुह्य प्रद्रुता वेगवत्तरम् ।। ३८ ।। अगृह्णन् बहवो राजन् शलभान् वायसा इव ।