महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजन्! जैसे कौए दौड़-दौड़कर टिड्डियोंको पकड़ते हैं, उसी प्रकार रथपर बैठकर बड़े वेगसे धावा करनेवाले बहुसंख्यक रथी शत्रुपक्षके सैनिकोंको दबोच लेते थे ।। ३८½ ।।
तथा गजान् प्रभिन्नांश्च सम्प्रभिन्ना महागजाः ।। ३९ ।।
तस्मिन्नेव पदे यत्ता निगृह्णन्ति स्म भारत ।
भरतनन्दन! मदस्रावी विशाल हाथी मदकी धारा बहानेवाले दूसरे गजराजोंसे सहसा भिड़कर एक-दूसरेको यत्नपूर्वक काबूमें कर लेते थे ।। ३९½ ।।
सादी सादिनमासाद्य पत्तयश्च पदातिनम् ।। ४० ।।
समासाद्य रणेऽन्योन्यं संरब्धा नातिचक्रमुः ।
रणभूमिमें घुड़सवार घुड़सवारोंसे और पैदल पैदलोंसे भिड़कर परस्पर कुपित होते हुए भी एक-दूसरेको लाँघकर आगे नहीं बढ़ पाते थे ।। ४०½ ।।
धावतां द्रवतां चैव पुनरावर्ततामपि ।। ४१ ।।
बभूव तत्र सैन्यानां शब्दः सुविपुलो निशि ।
उस रात्रिके समय दौड़ते, भागते और पुनः लौटते हुए सैनिकोंका महान् कोलाहल सुनायी पड़ता था ।। ४१½ ।।
दीप्यमानाः प्रदीपाश्च रथवारणवाजिषु ।। ४२ ।।
अदृश्यन्त महाराज महोल्का इव खाच्च्युताः ।
महाराज! रथों, हाथियों और घोड़ोंपर चलती हुई मशालें आकाशसे गिरी हुई बड़ी-बड़ी उल्काओंके समान दिखायी देती थीं ।। ४२½ ।।
सा निशा भरतश्रेष्ठ प्रदीपैरवभासिता ।। ४३ ।।
दिवसप्रतिमा राजन् बभूव रणमूर्धनि ।
भरतभूषण नरेश! प्रदीपोंसे प्रकाशित हुई वह रात्रि युद्धके मुहानेपर दिनके समान हो गयी थी ।। ४३½ ।।
आदित्येन यथा व्याप्तं तमो लोके प्रणश्यति ।। ४४ ।।
तथा नष्टं तमो घोरं दीपैरदीप्तैरितस्ततः ।
जैसे सूर्यके प्रकाशसे सम्पूर्ण जगत्में फैला हुआ अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार इधर-उधर जलती हुई मशालोंसे वहाँका भयानक अँधेरा नष्ट हो गया था ।। ४४½ ।।
द्यौश्चैव पृथिवी चापि दिशश्च प्रदिशस्तथा ।। ४५ ।।
रजसा तमसा व्याप्ता द्योतिताः प्रभया पुनः ।
धूल और अन्धकारसे व्याप्त आकाश, पृथ्वी, दिशा और विदिशाएँ प्रदीपोंकी प्रभासे पुनः प्रकाशित हो उठी थीं ।। ४५½ ।।
अस्त्राणां कवचानां च मणीनां च महात्मनाम् ।। ४६ ।।
अन्तर्दधुः प्रभाः सर्वा दीपैस्तैरवभासिताः ।