महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1256, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहामनस्वी योद्धाओंके अस्त्रों, कवचों और मणियोंकी सारी प्रभा उन प्रदीपोंके प्रकाशसे तिरोहित हो गयी थी ।।
तस्मिन् कोलाहले युद्धे वर्तमाने निशामुखे ।। ४७ ।।
न किंचिद् विदुरात्मानमयस्मीति भारत ।
भारत! उस रात्रिके समय जब वह भयंकर कोलाहलपूर्ण संग्राम चल रहा था, तब योद्धाओंको कुछ भी पता नहीं चलता था। वे अपने-आपके विषयमें भी यह नहीं जान पाते थे कि ‘मैं अमुक हूँ’ ।। ४७ १/२ ।।
अवधीत् समरे पुत्रं पिता भरतसत्तम ।। ४८ ।।
पुत्रश्च पितरं मोहात् सखायं च सखा तथा ।
स्वस्त्रीयं मातुलश्चापि स्वस्त्रीयश्चापि मातुलम् ।। ४९ ।।
भरतश्रेष्ठ! उस समरांगणमें मोहवश पिताने पुत्रका वध कर डाला और पुत्रने पिताका। मित्रने मित्रके प्राण ले लिये। मामाने भानजेको मार डाला और भानजेने मामाको ।।
स्वे स्वान् परे परांश्चापि निजघ्नुरितरेतरम् ।
निर्मर्यादमभूद् युद्धं रात्रौ भीरुभयानकम् ।। ५० ।।
अपने पक्षके योद्धा अपने ही सैनिकोंपर तथा शत्रुपक्षके सैनिक भी अपने ही योद्धाओंपर परस्पर घातक प्रहार करने लगे। इस प्रकार रात्रिमें वह युद्ध मर्यादारहित होकर कायरोंके लिये अत्यन्त भयानक हो उठा ।। ५० ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे संकुलयुद्धे एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके समय संकुलयुद्धविषयक एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६९ ।।