भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1262

प्रभो! इससे कुपित हुए सात्यकिने उन सब योद्धाओं तथा कर्णके अस्त्रोंका अस्त्रोंद्वारा निवारण करके वृषसेनकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३८ ॥ तेन बाणेन निर्विद्धो वृषसेनो विशाम्पते । न्यपतत् स रथे मूढो धनुरुत्सृज्य वीर्यवान् ॥ ३९ ॥ प्रजानाथ! सात्यकिके बाणसे घायल हो बलवान् वृषसेन धनुष छोड़कर मूर्च्छित हो रथपर गिर पड़ा ॥ ३९ ॥ ततः कर्णो हतं मत्वा वृषसेनं महारथम् । पुत्रशोकाभिसंतप्तः सात्यकिं प्रत्यपीडयत् ॥ ४० ॥ तब महारथी वृषसेनको मारा गया मानकर कर्ण पुत्रशोकसे संतप्त हो सात्यकिको पीड़ा देने लगा ॥ ४० ॥ पीड्यमानस्तु कर्णेन युयुधानो महारथः । विव्याध बहुभिः कर्णं त्वरमाणः पुनः पुनः ॥ ४१ ॥ कर्णसे पीड़ित होते हुए महारथी युयुधान बड़ी उतावलीके साथ कर्णको अपने बहुसंख्यक बाणोंद्वारा बारंबार बींधने लगे ॥ ४१ ॥ स कर्णं दशभिर्विद्ध्वा वृषसेनं च सप्तभिः । स हस्तावापधनुषी तयोश्छिच्छेद सात्वतः ॥ ४२ ॥ सात्वतवंशी सात्यकिने कर्णको दस और वृषसेनको सात बाणोंसे घायल करके उन दोनोंके दस्ताने और धनुष काट दिये ॥ ४२ ॥ तावन्ये धनुषी सज्ये कृत्वा शत्रुभयंकरे । युयुधानमविध्येतां समन्तान्निशितैः शरैः ॥ ४३ ॥ तब उन दोनोंने दूसरे शत्रु-भयंकर धनुषोंपर प्रत्यंचा चढ़ाकर सब ओरसे तीखे बाणोंद्वारा युयुधानको बींधना आरम्भ किया ॥ ४३ ॥ वर्तमाने तु संग्रामे तस्मिन् वीरवरक्षये । अतीव शुश्रुवे राजन् गाण्डीवस्य महास्वनः ॥ ४४ ॥ राजन्! जब बड़े-बड़े वीरोंका विनाश करनेवाला वह संग्राम चल रहा था, उसी समय वहाँ गाण्डीव धनुषकी गम्भीर टंकार-ध्वनि बड़े जोर-जोरसे सुनायी देने लगी ॥ श्रुत्वा तु रथनिर्घोषं गाण्डीवस्य च निःस्वनम् । सूतपुत्रोऽब्रवीद् राजन् दुर्योधनमिदं वचः ॥ ४५ ॥ नरेश्वर! अर्जुनके रथका गम्भीर घोष और गाण्डीव धनुषकी टंकार सुनकर सूतपुत्र कर्णने दुर्योधनसे इस प्रकार कहा— ॥ ४५ ॥ एष सर्वां चमूं हत्वा मुख्यांश्चैव नरर्षभान् । पौरवांश्च महेष्वासो विक्षिपन्नुत्तमं धनुः ॥ ४६ ॥ पार्थो विजयते तत्र गाण्डीवनिनदो महान् ।