भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1263

श्रूयते रथघोषश्च वासवस्येव नर्दतः ॥ ४७ ॥
‘राजन्! ये महाधनुर्धर कुन्तीकुमार अर्जुन हमारी सारी सेनाका संहार और मुख्य-मुख्य कुरुवंशी श्रेष्ठ पुरुषोंका वध करके अपने उत्तम धनुषकी टंकार करते हुए विजयी हो रहे हैं। उधर गाण्डीव धनुषका महान् घोष तथा गरजते हुए मेघके समान पार्थके रथकी घोर घर्घराहट सुनायी दे रही है ॥ ४६-४७ ॥
करोति पाण्डवो व्यक्तं कर्मौपयिकमात्मनः ।
एषा विदार्यते राजन् बहुधा भारती चमूः ॥ ४८ ॥
‘इससे स्पष्ट जान पड़ता है कि अर्जुन वहाँ अपने अनुरूप पुरुषार्थ कर रहे हैं। राजन्! भरतवंशियोंकी इस सेनाको वे अनेक भागोंमें विदीर्ण (विभक्त) किये देते हैं ॥ ४८ ॥
विप्रकीर्णान्यनेकानि न हि तिष्ठन्ति कर्हिचित् ।
वातेनेव समुद्धूतमभ्रजालं विदीर्यते ॥ ४९ ॥
सव्यसाचिनमासाद्य भिन्ना नौरिव सागरे ।
‘उनके द्वारा तितर-बितर किये हुए हमारे बहुत-से सैन्यदल कहीं भी ठहर नहीं पाते हैं। जैसे हवा घिरे हुए बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनके सामने पड़कर अपनी सारी सेना अनेक टुकड़ियोंमें बँटकर भागने लगी है। उसकी अवस्था समुद्रमें फटी हुई नौकाके समान हो रही है ॥ ४९ १/२ ॥
द्रवतां योधमुख्यानां गाण्डीवप्रेषितैः शरैः ॥ ५० ॥
विद्धानां शतशो राजन् श्रूयते निःस्वनो महान् ।
‘राजन्! गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा विद्ध होकर भागते हुए सैकड़ों मुख्य-मुख्य योद्धाओंका वह महान् आर्तनाद सुनायी पड़ता है ॥ ५० १/२ ॥
शृणु दुन्दुभिनिर्घोषमर्जुनस्य रथं प्रति ॥ ५१ ॥
निशीथे राजशार्दूल स्तनयित्नोरिवाम्बरे ।
‘नृपश्रेष्ठ! इस रात्रिके समय आकाशमें मेघकी गर्जनाके समान जो अर्जुनके रथके समीप नगाड़ोंकी ध्वनि हो रही है, उसे सुनो ॥ ५१ १/२ ॥
हाहाकाररवांश्चैव सिंहनादांश्च पुष्कलान् ॥ ५२ ॥
शृणु शब्दान् बहुविधानर्जुनस्य रथं प्रति ।
‘अर्जुनके रथके आसपास जो भाँति-भाँतिके हाहाकार, बारंबार सिंहनाद तथा अनेक प्रकारके और भी बहुत-से शब्द हो रहे हैं, उनको भी श्रवण करो ॥
अयं मध्ये स्थितोऽस्माकं सात्यकिः सात्वतां वरः ॥ ५३ ॥
इह चेल्लभ्यते लक्ष्यं कृत्स्नान् जेष्यामहे परान् ।
‘ये सात्वतशिरोमणि सात्यकि इस समय हमलोगोंके बीचमें खड़े हैं। यदि यहाँ इन्हें हम अपने बाणोंका निशाना बना सकें तो निश्चय ही सम्पूर्ण शत्रुओंपर विजय पा सकेंगे ॥ ५३ १/२ ॥