भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1273, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1273

तब क्षत्रियमर्दन शूरवीर द्रोणाचार्यने उस धनुषको भूमिपर रखकर दूसरा अत्यन्त प्रबल और वेगशाली धनुष हाथमें लिया ।। ४६ १/२ ।। धृष्टद्युम्नं ततो द्रोणो विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः ।। ४७ ।। सारथिं पञ्चभिर्बाणै राजन् विव्याध संयुगे । राजन्! तत्पश्चात् द्रोणने युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नको सात बाणोंसे बींधकर उनके सारथिको पाँच बाँणोंसे घायल कर दिया ।। ४७ १/२ ।। तं निवार्य शरैस्तूर्णं धृष्टद्युम्नो महारथः ।। ४८ ।। व्यधमत् कौरवीं सेनामासुरीं मघवानिव । महारथी धृष्टद्युम्नने तुरंत ही अपने बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको रोककर कौरव-सेनाका उसी प्रकार विनाश आरम्भ किया, जैसे इन्द्र आसुरी सेनाका संहार करते हैं ।। ४८ १/२ ।। वध्यमाने बले तस्मिंस्तव पुत्रस्य मारिष ।। ४९ ।। प्रावर्तत नदी घोरा शोणितौघतरङ्गिणी । माननीय नरेश! इस प्रकार जब आपके पुत्रकी उस सेनाका वध होने लगा, तब वहाँ रक्तराशिके प्रवाहसे तरंगित होनेवाली एक भयंकर नदी बह चली ।। ४९ १/२ ।। उभयोः सेनयोर्मध्ये नराश्वद्विपवाहिनी ।। ५० ।। यथा वैतरणी राजन् यमराजपुरं प्रति । राजन्! दोनों सेनाओंके बीचमें बहनेवाली वह नदी मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंको भी बहाये लिये जाती थी, मानो वैतरणी नदी यमराजपुरीकी ओर जा रही हो ।। ५० १/२ ।। द्रावयित्वा तु तत् सैन्यं धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् ।। ५१ ।। अभ्यराजत तेजस्वी शक्रो देवगणेष्विव । उस सेनाको भगाकर प्रतापी धृष्टद्युम्न देवताओंके समूहमें तेजस्वी इन्द्रके समान सुशोभित होने लगे ।। ५१ १/२ ।। अथ दध्मुर्महाशङ्खान् धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ ।। ५२ ।। यमौ च युयुधानश्च पाण्डवश्च वृकोदरः । तदनन्तर धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, नकुल, सहदेव, सात्यकि तथा पाण्डुपुत्र भीमसेनने भी अपने महान् शंखको बजाया ।। ५२ १/२ ।। जित्वा रथसहस्राणि तावकानां महारथाः । सिंहनादरवांश्चक्रुः पाण्डवा जितकाशिनः ।। ५३ ।। पश्यतस्तव पुत्रस्य कर्णस्य च रणोत्कटाः । तथा द्रोणस्य शूरस्य द्रौणेश्चैव विशाम्पते ।। ५४ ।। प्रजानाथ! विजयसे उल्लसित होनेवाले रणोन्मत्त पाण्डव महारथी आपके पुत्र दुर्योधन, कर्ण, द्रोणाचार्य तथा शूरवीर अश्वत्थामाके देखते-देखते आपकी सेनाके सहस्रों

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