महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1272, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपार्थं सिषिचतुर्बाणैर्गिरिं मेघाविवाम्बुभिः । एक रथपर आरूढ़ हुए पिता और पुत्र दोनों महारथियोंने अर्जुनपर उसी प्रकार बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी, जैसे दो मेघखण्ड अपने जलसे किसी पर्वतको सींच रहे हों ।। ३९ १/२ ।। तौ तु विद्ध्वा महाराज पाण्डवो निशितैःशरैः ।। ४० ।। विद्रावयंस्तव चमूं शतशो व्यधमच्छरैः । महाराज! परंतु पाण्डुनन्दन अर्जुनने उन दोनोंको तीखे बाणोंसे घायल करके आपकी सेनाको भगाते हुए उसे सैकड़ों बाणोंसे छिन्न-भिन्न कर दिया ।। ४० १/२ ।। अनिलेन यथाभ्राणि विच्छिन्नानि समन्ततः ।। ४१ ।। विच्छिन्नानि तथा राजन् बलान्यासन् विशाम्पते । प्रजापालक नरेश! जैसे हवा बादलोंको चारों ओर उड़ा देती है, उसी प्रकार अर्जुनने आपकी सेनाओंको छिन्न-भिन्न कर दिया ।। ४१ १/२ ।। तद् बलं भरतश्रेष्ठ वध्यमानं तदा निशि ।। ४२ ।। प्रदुद्राव दिशः सर्वा वीक्षमाणं भयार्दितम् । भरतश्रेष्ठ! उस समय रात्रिमें अर्जुनद्वारा मारी जाती हुई आपकी सेना भयसे पीड़ित हो सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखती हुई भाग चली ।। ४२ १/२ ।। उत्सृज्य वाहनान् समरे चोदयन्तस्तथा परे ।। ४३ ।। सम्भ्रान्ताः पर्यधावन्त तस्मिंस्तमसि दारुणे । कुछ लोग अपने वाहनोंको समरांगणमें ही छोड़कर भाग चले। दूसरे लोग उन्हें तेजीसे हाँकते हुए भागे और कितने ही सैनिक भ्रान्त होकर उस दारुण अन्धकारमें चारों ओर चक्कर काटते रहे ।। ४३ १/२ ।। विजित्य समरे योधांस्तावकान् भरतर्षभ ।। ४४ ।। दध्मतुर्मुदितौ शङ्खौ वासुदेवधनंजयौ । भरतश्रेष्ठ! रणभूमिमें आपके योद्धाओंको जीतकर प्रसन्नतासे भरे हुए भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन अपना-अपना शंख बजाने लगे ।। ४४ १/२ ।। धृष्टद्युम्नो महाराज द्रोणं विद्ध्वा त्रिभिः शरैः ।। ४५ ।। चिच्छेद धनुषस्तूर्णं ज्यां शरेण शितेन ह । महाराज! उधर धृष्टद्युम्नने तीन बाणोंसे द्रोणाचार्यको बींधकर तुरंत ही तीखे बाणसे उनके धनुषकी प्रत्यंचा काट डाली ।। ४५ १/२ ।। तन्निधाय धनुर्भूमौ द्रोणः क्षत्रियमर्दनः ।। ४६ ।। आददेऽन्यद् धनुः शूरो वेगवत् सारवत्तरम् ।