महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1271, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंडाला ।। ३१ ।। भुजैश्छिन्नैर्महीपाल हस्तिहस्तोपमैर्मृधे । समाकीर्णा मही भाति पञ्चास्यैरिव पन्नगैः ।। ३२ ।। भूपाल! हाथीकी सूँड़के समान मोटी एवं कटी हुई भुजाओंसे आच्छादित हुई वह रणभूमि पाँच मुँहवाले सर्पोंसे ढकी हुई-सी जान पड़ती थी ।। ३२ ।। शिरोभिः सकीरीटैश्च सुनसैश्चारुकुण्डलैः । संदष्टौष्ठपुटैः क्रुद्धैस्तथैवोद्धृतलोचनैः ।। ३३ ।। निष्कचूडामणिधरैः क्षत्रियाणां प्रियंवदैः । पङ्कजैरिव विन्यस्तैः पतितैर्विबभौ मही ।। ३४ ।। जिनपर किरीट शोभा देता था, जो सुन्दर नासिका और मनोहर कुण्डलोंसे विभूषित थे, जिन्होंने क्रोधपूर्वक अपने ओठोंको दाँतोंसे दबा रखा था, जिनकी आँखें बाहर निकल आयी थीं तथा जो निष्क एवं चूडामणि धारण करते और प्रिय वचन बोलते थे, क्षत्रियोंके वे मस्तक वहाँ कटकर गिरे हुए थे। उनके द्वारा रणभूमिकी वैसी ही शोभा हो रही थी, मानो वहाँ कमल बिछा दिये गये हों ।। ३३-३४ ।। कृत्वा तत् कर्म बीभत्सुरुग्रमुग्रपराक्रमः । विव्याध शकुनिं भूयः पञ्चभिर्नतपर्वभिः ।। ३५ ।। अताडयदूलूकं च त्रिभिरेव तथा शरैः । भयंकर पराक्रमी अर्जुनने वह वीरोचित कर्म करके झुकी हुई गाँठवाले पाँच बाणोंद्वारा पुनः शकुनिको घायल किया। साथ ही तीन बाणोंसे उलूकको भी व्यथित कर दिया ।। ३५ १/२ ।। उलूकस्तु तथा विद्धो वासुदेवमताडयत् ।। ३६ ।। ननाद च महानादं पूरयन्निव मेदिनीम् । इस प्रकार घायल होनेपर उलूकने भगवान् श्रीकृष्णपर प्रहार किया और पृथ्वीको गुँजाते हुए-से बड़े जोरसे गर्जना की ।। ३६ १/२ ।। अर्जुनः शकुनेश्चापं सायकैरच्छिनद् रणे ।। ३७ ।। निन्ये च चतुरो वाहन् यमस्य सदनं प्रति । उस समय अर्जुनने रणभूमिमें अपने बाणोंद्वारा शकुनिका धनुष काट दिया और उसके चारों घोड़ोंको भी यमलोक भेज दिया ।। ३७ १/२ ।। ततो रथादवप्लुत्य सौबलो भरतर्षभ ।। ३८ ।। उलूकस्य रथं तूर्णमारुरोह विशाम्पते । प्रजापालक भरतश्रेष्ठ! तब सुबलपुत्र शकुनि अपने रथसे कूदकर तुरंत ही उलूकके रथपर जा चढ़ा ।। ३८ १/२ ।। तावेकरथमारूढौ पितापुत्रौ महारथौ ।। ३९ ।।