भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1327

भयानक शब्द करनेवाली उस विशाल गदाको आती देख भयंकर राक्षस अलायुधने अपनी गदासे उसपर आघात किया और बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ४१ १/२ ॥
तद् दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रस्य घोरं कर्म भयावहम् ॥ ४२ ॥
भीमसेनः प्रहृष्टात्मा गदामाशु परामृशत् ।
राक्षसराज अलायुधके उस भयदायक घोर कर्मको देखकर भीमसेनका हृदय हर्ष और उत्साहसे भर गया और उन्होंने शीघ्र ही गदा हाथमें ले ली ॥ ४२ १/२ ॥
तयोः समभवद् युद्धं तुमुलं नररक्षसोः ॥ ४३ ॥
गदानिपातसंह्रादैर्भुवं कम्पयतोर्भृशम् ।
फिर गदाओंके टकरानेकी आवाजसे भूतलको अत्यन्त कम्पित करते हुए उन दोनों मनुष्य और राक्षसोंमें वहाँ भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ४३ १/२ ॥
गदाविमुक्तौ तौ भूयः समासाद्येतरेतरम् ॥ ४४ ॥
मुष्टिभिर्वज्रसंह्रादैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ।
गदासे छूटते ही वे दोनों फिर एक-दूसरेसे गुथ गये और वज्रपातकी-सी आवाज करनेवाले मुक्कोंसे एक-दूसरेको मारने लगे ॥ ४४ १/२ ॥
रथचक्रैर्युगैरक्षैरधिष्ठानैरुपस्करैः ॥ ४५ ॥
यथासन्नमुपादाय निजघ्नतुरमर्षणौ ।
तत्पश्चात् अमर्षमें भरकर वे दोनों रथके पहियों, जूओं, धुरों, बैठकों और अन्य उपकरणोंसे तथा जो भी वस्तु समीप मिल जाती, उसीको लेकर एक-दूसरेपर चोट करने लगे ॥ ४५ १/२ ॥
तौ विक्षरन्तौ रुधिरं समासाद्येतरेतरम् ॥ ४६ ॥
मत्ताविव महानागौ चकृषाते पुनः पुनः ।
वे मदस्रावी मतवाले गजराजोंके समान अपने अंगोंसे रुधिरकी धारा बहाते हुए एक-दूसरेसे भिड़कर बारंबार खींचातानी करने लगे ॥ ४६ १/२ ॥
तदपश्यद्धृषीकेशः पाण्डवानां हिते रतः ।
स भीमसेनरक्षार्थं हैडिम्बं पर्यचोदयत् ॥ ४७ ॥
पाण्डवोंके हितमें तत्पर रहनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने जब वह युद्ध देखा, तब भीमसेनकी रक्षाके लिये हिडिम्बाकुमार घटोत्कचको भेजा ॥ ४७ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धेऽलायुधयुद्धे
सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें अलायुधयुद्धविषयक एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४८ श्लोक हैं।)