महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
भयानक शब्द करनेवाली उस विशाल गदाको आती देख भयंकर राक्षस अलायुधने अपनी गदासे उसपर आघात किया और बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ४१ १/२ ॥
तद् दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रस्य घोरं कर्म भयावहम् ॥ ४२ ॥
भीमसेनः प्रहृष्टात्मा गदामाशु परामृशत् ।
राक्षसराज अलायुधके उस भयदायक घोर कर्मको देखकर भीमसेनका हृदय हर्ष और उत्साहसे भर गया और उन्होंने शीघ्र ही गदा हाथमें ले ली ॥ ४२ १/२ ॥
तयोः समभवद् युद्धं तुमुलं नररक्षसोः ॥ ४३ ॥
गदानिपातसंह्रादैर्भुवं कम्पयतोर्भृशम् ।
फिर गदाओंके टकरानेकी आवाजसे भूतलको अत्यन्त कम्पित करते हुए उन दोनों मनुष्य और राक्षसोंमें वहाँ भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ४३ १/२ ॥
गदाविमुक्तौ तौ भूयः समासाद्येतरेतरम् ॥ ४४ ॥
मुष्टिभिर्वज्रसंह्रादैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ।
गदासे छूटते ही वे दोनों फिर एक-दूसरेसे गुथ गये और वज्रपातकी-सी आवाज करनेवाले मुक्कोंसे एक-दूसरेको मारने लगे ॥ ४४ १/२ ॥
रथचक्रैर्युगैरक्षैरधिष्ठानैरुपस्करैः ॥ ४५ ॥
यथासन्नमुपादाय निजघ्नतुरमर्षणौ ।
तत्पश्चात् अमर्षमें भरकर वे दोनों रथके पहियों, जूओं, धुरों, बैठकों और अन्य उपकरणोंसे तथा जो भी वस्तु समीप मिल जाती, उसीको लेकर एक-दूसरेपर चोट करने लगे ॥ ४५ १/२ ॥
तौ विक्षरन्तौ रुधिरं समासाद्येतरेतरम् ॥ ४६ ॥
मत्ताविव महानागौ चकृषाते पुनः पुनः ।
वे मदस्रावी मतवाले गजराजोंके समान अपने अंगोंसे रुधिरकी धारा बहाते हुए एक-दूसरेसे भिड़कर बारंबार खींचातानी करने लगे ॥ ४६ १/२ ॥
तदपश्यद्धृषीकेशः पाण्डवानां हिते रतः ।
स भीमसेनरक्षार्थं हैडिम्बं पर्यचोदयत् ॥ ४७ ॥
पाण्डवोंके हितमें तत्पर रहनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने जब वह युद्ध देखा, तब भीमसेनकी रक्षाके लिये हिडिम्बाकुमार घटोत्कचको भेजा ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धेऽलायुधयुद्धे
सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें अलायुधयुद्धविषयक एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४८ श्लोक हैं।)
१७८-
अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
दोनों सेनाओंमें परस्पर घोर युद्ध और घटोत्कचके द्वारा अलायुधका वध एवं दुर्योधनका पश्चात्ताप
संजय उवाच
संदृश्य समरे भीमं रक्षसा ग्रस्तमन्तिकात् ।
वासुदेवोऽब्रवीद् राजन् घटोत्कचमिदं वचः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! समरभूमिमें राक्षसके चंगुलमें फँसे हुए भीमसेनको निकटसे देखकर भगवान् श्रीकृष्णने घटोत्कचसे यह बात कही— ॥ १ ॥
पश्य भीमं महाबाहो रक्षसा ग्रस्तमाहवे ।
पश्यतां सर्वसैन्यानां तव चैव महाद्युते ॥ २ ॥
‘महातेजस्वी महाबाहु वीर! देखो, युद्धस्थलमें उस राक्षसने सम्पूर्ण सेनाके और तुम्हारे देखते-देखते भीमसेनको वशमें कर लिया है ॥ २ ॥
स कर्णं त्वं समुत्सृज्य राक्षसेन्द्रमलायुधम् ।
जहि क्षिप्रं महाबाहो पश्चात् कर्णं वधिष्यसि ॥ ३ ॥
‘महाबाहो! अतः तुम कर्णको छोड़कर पहले राक्षसराज अलायुधको शीघ्रतापूर्वक मार डालो। पीछे कर्णका वध करना’ ॥ ३ ॥
स वार्ष्णेयवचः श्रुत्वा कर्णमुत्सृज्य वीर्यवान् ।
युयुधे राक्षसेन्द्रेण वकभ्रात्रा घटोत्कचः ॥ ४ ॥
भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर पराक्रमी वीर घटोत्कचने कर्णको छोड़कर वकके भाई राक्षसराज अलायुधके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया ॥ ४ ॥
तयोः सुतुमुलं युद्धं बभूव निशि रक्षसोः ।
अलायुधस्य चैवोग्रं हैडिम्बेश्चापि भारत ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! उस रात्रिके समय अलायुध और हिडिम्बाकुमार घटोत्कच दोनों राक्षसोंमें अत्यन्त भयंकर एवं घमासान युद्ध होने लगा ॥ ५ ॥
अलायुधस्य योधांश्च राक्षसान् भीमदर्शनान् ।
वेगेनापततः शूरान् प्रगृहीतशरासनान् ॥ ६ ॥
आत्तायुधः सुसंक्रुद्धो युयुधानो महारथः ।
नकुलः सहदेवश्च चिच्छिदुर्निशितैः शरैः ॥ ७ ॥
अलायुधके सैनिक राक्षस देखनेमें बड़े भयंकर और शूरवीर थे। वे हाथमें धनुष लेकर बड़े वेगसे आक्रमण करते थे। परंतु अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए
महारथी युयुधान, नकुल और सहदेवने उन सबको अपने पैने बाणोंसे काट डाला ।। ६-७ ।।
सर्वांश्च समरे राजन् किरीटी क्षत्रियर्षभान् ।
परिचिक्षेप बीभत्सुः सर्वतः प्रकिरन् शरान् ।। ८ ।।
राजन्! किरीटधारी अर्जुनने समरांगणमें सब ओर बाणोंकी वर्षा करके कौरवपक्षके समस्त क्षत्रिय-शिरोमणियोंको मार भगाया ।। ८ ।।
कर्णश्च समरे राजन् व्यद्रावयत पार्थिवान् ।
धृष्टद्युम्नशिखण्ड्यादीन् पञ्चालानां महारथान् ।। ९ ।।
नरेश्वर! कर्णने भी रणभूमिमें धृष्टद्युम्न और शिखण्डी आदि पांचाल महारथी नरेशोंको दूर भगा दिया ।। ९ ।।
तान् वध्यमानान् दृष्ट्वाथ भीमो भीमपराक्रमः ।
अभ्ययात् त्वरितः कर्णं विशिखान् प्रकिरन् रणे ।। १० ।।
उन सबको बाणोंकी मारसे पीड़ित होते देख भयंकर पराक्रमी भीमसेनने युद्धस्थलमें अपने बाणोंकी वर्षा करते हुए वहाँ तुरंत ही कर्णपर आक्रमण किया ।।
ततस्तेऽप्याययुर्हत्वा राक्षसान् यत्र सूतजः ।
नकुलः सहदेवश्च सात्यकिश्च महारथः ।। ११ ।।
तत्पश्चात् वे नकुल, सहदेव और महारथी सात्यकि भी राक्षसोंको मारकर वहीं आ पहुँचे, जहाँ सूतपुत्र कर्ण था ।। ११ ।।
ते कर्णं योधयामासुः पञ्चाला द्रोणमेव तु ।
अलायुधस्तु संक्रुद्धो घटोत्कचमरिंदमम् ।
परिघेणातिकायेन ताडयामास मूर्धनि ।। १२ ।।
वे तीनों योद्धा कर्णके साथ युद्ध करने लगे और पांचालदेशीय वीरोंने द्रोणाचार्यका सामना किया। उधर क्रोधमें भरे हुए अलायुधने एक विशाल परिघके द्वारा शत्रुदमन घटोत्कचके मस्तकपर आघात किया ।। १२ ।।
स तु तेन प्रहारेण भैमसेनिर्महाबलः ।
ईषन्मूर्च्छितमात्मानमस्तम्भयत वीर्यवान् ।। १३ ।।
उस प्रहारसे भीमसेनपुत्र घटोत्कचको कुछ मूर्छा आ गयी। परंतु उस महाबली और पराक्रमी वीरने पुनः अपने-आपको सँभाल लिया ।। १३ ।।
ततो दीप्ताग्निसंकाशां शतघण्टामलंकृताम् ।
चिक्षेप तस्मै समरे गदां काञ्चनभूषिताम् ।। १४ ।।
तदनन्तर घटोत्कचने समरांगणमें प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्विनी, एक सौ घंटियोंसे अलंकृत और सुवर्णभूषित अपनी गदा उसके ऊपर चलायी ।। १४ ।।
सा हयांश्च रथं चास्य सारथिं च महास्वना ।
चूर्णयामास वेगेन विसृष्टा भीमकर्मणा ॥ १५ ॥ भयंकर कर्म करनेवाले उस राक्षसद्वारा वेगपूर्वक फेंकी गयी उस भारी आवाज करनेवाली गदाने अलायुधके रथ, सारथि और घोड़ोंको चूर-चूर कर दिया ॥ १५ ॥ स भग्नहयचक्राक्षाद् विशीर्णध्वजकूबरात् । उत्पपात रथात् तूर्णं मायामास्थाय राक्षसीम् ॥ १६ ॥ जिसके घोड़े, पहिये और धुरे नष्ट हो गये थे, ध्वज और कूबर बिखर गये थे, उस रथसे अलायुध राक्षसी मायाका आश्रय लेकर तुरंत ही ऊपरको उड़ गया ॥ १६ ॥ स समास्थाय मायां तु ववर्ष रुधिरं बहु । विद्युद्विभ्राजितं चासीत् तुमलाभ्राकुलं नभः ॥ १७ ॥ उसने मायाका आश्रय लेकर बहुत रक्तकी वर्षा की। उस समय आकाशमें भयंकर मेघोंकी घटा घिर आयी थी और बिजली चमक रही थी ॥ १७ ॥ ततो वज्रनिपाताश्च साशनिस्तनयित्नवः । महांश्चटचटाशब्दस्तत्रासीच्च महाहवे ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् उस महासमरमें वज्रपात, मेघगर्जनाके साथ विद्युत्की गड़गड़ाहट तथा महान् चट-चट शब्द होने लगे ॥ १८ ॥ तां प्रेक्ष्य महतीं मायां राक्षसो राक्षसस्य च । ऊर्ध्वमुत्पत्य हैडिम्बिस्तां मायां माययावधीत् ॥ १९ ॥ राक्षसकी उस विशाल मायाको देखकर राक्षसजातीय हिडिम्बाकुमार घटोत्कचने ऊपर उड़कर अपनी मायासे उस मायाको नष्ट कर दिया ॥ १९ ॥ सोऽभिवीक्ष्य हतां मायां मायावी माययैव हि । अश्मवर्षं सुतुमुलं विससर्ज घटोत्कचे ॥ २० ॥ अपनी मायाको मायासे ही नष्ट हुई देखकर मायावी अलायुध घटोत्कचपर पत्थरोंकी भयंकर वर्षा करने लगा ॥ २० ॥ अश्मवर्षं स तं घोरं शरवर्षेण वीर्यवान् । दिक्षु विध्वंसयामास तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २१ ॥ किंतु पराक्रमी घटोत्कचने बाणोंकी वृष्टि करके उस भयंकर प्रस्तरवर्षाका उन-उन दिशाओंमें ही विध्वंस कर दिया। वह अद्भुत-सा कार्य हुआ ॥ २१ ॥ ततो नानाप्रहरणैरन्योन्यमभिवर्षताम् । आयसैः परिघैः शूलैर्गदामुसलमुद्गरैः ॥ २२ ॥ पिनाकैः करवा लैश्च तोमरप्रासकम्पनैः । नाराचैर्निशितैर्भल्लैः शरैश्चक्रैः परश्वधैः । अयोगुडैर्भिन्दिपालैर्गोशीर्षोलूखलैरपि ॥ २३ ॥ उत्पाटितैर्महाशाखैर्विविधैर्जगतीरुहैः ।
शमीपीलुकदम्बैश्च चम्पकैश्चैव भारत ॥ २४ ॥ इङ्गुदैर्बदरीभिश्च कोविदारैश्च पुष्पितैः । पलाशैश्चारिमेदैश्च प्लक्षन्यग्रोधपिप्पलैः ॥ २५ ॥ महद्भिः समरे तस्मिन्नन्योन्यमभिजघ्नतुः । विपुलैः पर्वताग्रैश्च नानाधातुभिराचितैः ॥ २६ ॥ भारत! तत्पश्चात् वे एक-दूसरेपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे। लोहेके परिघ, शूल, गदा, मुसल, मुद्गर, पिनाक, खड्ग, तोमर, प्रास, कम्पन, तीखे नाराच, भल्ल, बाण, चक्र, फरसे, लोहेकी गोली, भिन्दिपाल, गोशीर्ष, उलूखल, बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले उखाड़े हुए नाना प्रकारके वृक्ष—शमी, पीलु, कदम्ब, चम्पा, इंगुद, बेर, विकसित कोविदार, पलाश, अरिमेद, बड़े-बड़े पाकड़, बरगद और पीपल—इन सबके द्वारा उस महासमरमें वे एक-दूसरेपर चोट करने लगे। नाना प्रकारकी धातुओंसे व्याप्त विशाल पर्वतशिखरोंद्वारा भी वे परस्पर आघात करते थे ॥ २२—२६ ॥ तेषां शब्दो महानासीद् वज्राणां भिद्यतामिव । युद्धं समभवद् घोरं भैम्यालायुधयोर्नृप ॥ २७ ॥ हरीन्द्रयोर्यथा राजन् वालिसुग्रीवयोः पुरा । उन पर्वत-शिखरोंके टकरानेसे ऐसा महान् शब्द होता था, मानो वज्र फट पड़े हों। नरेश्वर! घटोत्कच और अलायुधका वह भयंकर युद्ध वैसा ही हो रहा था, जैसे पहले त्रेतायुगमें वानरराज बाली और सुग्रीवका युद्ध सुना गया है ॥ २७ १/२ ॥ तौ युद्धा विविधैर्घोरैरायुधैर्विशिखैस्तथा । प्रगृह्य च शितौ खड्गावन्योन्यमभिपेततुः ॥ २८ ॥ नाना प्रकारके भयंकर आयुधों और बाणोंसे युद्ध करके वे दोनों राक्षस तीखी तलवारें लेकर एक-दूसरेपर टूट पड़े ॥ २८ ॥ तावन्योन्यमभिद्रुत्य केशेषु सुमहाबलौ । भुजाभ्यां पर्यगृह्णीतां महाकायौ महाबलौ ॥ २९ ॥ उन दोनों महाबली और विशालकाय राक्षसोंने परस्पर आक्रमण करके दोनों हाथोंसे दोनोंके केश पकड़ लिये ॥ तौ स्विन्नगात्रौ प्रस्वेदं सुस्रुवाते जनाधिप । रुधिरं च महाकायावतिवृष्टाविवाम्बुदौ ॥ ३० ॥ नरेश्वर! अत्यन्त वर्षा करनेवाले दो मेघोंके समान उन विशालकाय राक्षसोंके शरीर पसीनेसे तर हो रहे थे। वे अपने अंगोंसे पसीनोंके साथ-साथ खून भी बहा रहे थे ॥ अथाभिपत्य वेगेन समुद्भ्राम्य च राक्षसम् । बलेनाक्षिप्य हैडिम्बिश्चकर्तास्य शिरो महत् ॥ ३१ ॥
तदनन्तर बड़े वेगसे झपटकर हिडिम्बाकुमार घटोत्कचने उस राक्षसको पकड़ लिया और उसे घुमाकर बलपूर्वक पटक दिया। फिर उसके विशाल मस्तकको उसने काट डाला ॥ ३१ ॥
सोऽपहृत्य शिरस्तस्य कुण्डलाभ्यां विभूषितम् ।
तदा सुतुमुलं नादं ननाद सुमहाबलः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार महाबली घटोत्कचने उसके कुण्डलमण्डित मस्तकको काटकर उस समय बड़ी भयानक गर्जना की ॥ ३२ ॥
हतं दृष्ट्वा महाकायं वकज्ञातिमरिंदमम् ।
पञ्चालाः पाण्डवाश्चैव सिंहनादान् विनेदिरे ॥ ३३ ॥
बकासुरके विशालकाय भ्राता शत्रुदमन अलायुधको मारा गया देख पांचाल और पाण्डव सिंहनाद करने लगे ॥
ततो भेरीसहस्राणि शङ्खानांमयुतानि च ।
अवादयन् पाण्डवेया राक्षसे निहते युधि ॥ ३४ ॥
युद्धस्थलमें उस राक्षसके मारे जानेपर पाण्डवदलके सैनिकोंने सहस्रों नगाड़े और हजारों शंख बजाये ॥ ३४ ॥
अतीव सा निशा तेषां बभूव विजयावहा ।
विद्योतमाना विबभौ समन्ताद् दीपमालिनी ॥ ३५ ॥
चारों ओरसे दीपावलियोंद्वारा प्रकाशित होनेवाली वह रात्रि उनके लिये विजयदायिनी होकर अत्यन्त शोभा पाने लगी ॥ ३५ ॥
अलायुधस्य तु शिरो भैमेसेनिर्महाबलः ।
दुर्योधनस्य प्रमुखे चिक्षेप गतचेतसः ॥ ३६ ॥
उस समय दुर्योधन अचेत-सा हो रहा था। महाबली घटोत्कचने अलायुधका वह मस्तक दुर्योधनके सामने फेंक दिया ॥ ३६ ॥
अथ दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा हतमलायुधम् ।
बभूव परमोद्विग्नः सह सैन्येन भारत ॥ ३७ ॥
भारत! अलायुधको मारा गया देख सेनासहित राजा दुर्योधन अत्यन्त उद्विग्न हो उठा ॥ ३७ ॥
तेन ह्यस्य प्रतिज्ञातं भीमसेनमहं युधि ।
हन्तेति स्वयमागम्य स्मरता वैरमुत्तमम् ॥ ३८ ॥
अलायुधने अपने भारी वैरीको याद करते हुए स्वयं आकर दुर्योधनके सामने यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं युद्धमें भीमसेनको मार डालूँगा ॥ ३८ ॥
ध्रुवं स तेन हन्तव्य इत्यमन्यत पार्थिवः ।
जीवितं चिरकालं हि भ्रातॄणां चाप्यमन्यत ॥ ३९ ॥
इससे राजा दुर्योधन यह मान बैठा था कि अलायुध निश्चय ही भीमसेनको मार डालेगा और यही सोचकर उसने यह भी समझ लिया था कि अभी मेरे भाइयोंका जीवन चिरस्थायी है ॥ ३९ ॥
स तं दृष्ट्वा विनिहतं भीमसेनात्मजेन वै ।
प्रतिज्ञां भीमसेनस्य पूर्णामेवाभ्यमन्यत ॥ ४० ॥
परंतु भीमसेनपुत्र घटोत्कचके द्वारा अलायुधको मारा गया देख उसने यह निश्चित रूपसे मान लिया कि अब भीमसेनकी प्रतिज्ञा पूरी होकर ही रहेगी ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि
रात्रियुद्धेऽलायुधवधेऽष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके समय अलायुधका वधविषयक एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७८ ॥
१७९-
एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
घटोत्कचका घोर युद्ध तथा कर्णके द्वारा चलायी हुई इन्द्रप्रदत्त शक्तिसे उसका वध
संजय उवाच
निहत्यालायुधं रक्षः प्रहृष्टात्मा घटोत्कचः ।
ननाद विविधान् नादान् वाहिन्याः प्रमुखे तव ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! राक्षस अलायुधका वध करके घटोत्कच मन-ही-मन बड़ा प्रसन्न हुआ और वह आपकी सेनाके सामने खड़ा हो नाना प्रकारसे सिंहनाद करने लगा ॥ १ ॥
तस्य तं तुमुलं शब्दं श्रुत्वा कुञ्जरकम्पनम् ।
तावकानां महाराज भयमासीत् सुदारुणम् ॥ २ ॥
महाराज! उसकी वह भयंकर गर्जना हाथियोंको भी कँपा देनेवाली थी। उसे सुनकर आपके योद्धाओंके मनमें अत्यन्त दारुण भय समा गया ॥ २ ॥
अलायुधविषक्तं तु भैमसैनिं महाबलम् ।
दृष्ट्वा कर्णो महाबाहुः पञ्चालान् समुपाद्रवत् ॥ ३ ॥
जिस समय महाबली घटोत्कच अलायुधके साथ उलझा हुआ था, उस समय उसे उस अवस्थामें देखकर महाबाहु कर्णने पांचालोंपर धावा किया ॥ ३ ॥
दशभिर्दशभिर्बाणैर्धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ ।
दृढैः पूर्णायतोत्सृष्टैर्बिभेद नतपर्वभिः ॥ ४ ॥
उसने पूर्णतः खींचकर छोड़े गये झुकी हुई गाँठवाले दस-दस सुदृढ़ बाणोंद्वारा धृष्टद्युम्न और शिखण्डीको घायल कर दिया ॥ ४ ॥
ततः परमनाराचैर्युधामन्यूत्तमौजसौ ।
सात्यकिं च रथोदारं कम्पयामास मार्गणैः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् उसने अच्छे-अच्छे नाराचोंद्वारा युधामन्यु और उत्तमौजाको तथा अनेक बाणोंसे उदार महारथी सात्यकिको भी कम्पित कर दिया ॥ ५ ॥
तेषामप्यस्यतां संख्ये सर्वेषां सव्यदक्षिणम् ।
मण्डलान्येव चापानि व्यदृश्यन्त जनाधिप ॥ ६ ॥
नरेश्वर! वे सात्यकि आदि भी बायें-दायें बाण चला रहे थे। उस समय उन सबके धनुष भी मण्डलाकार ही दिखायी देते थे ॥ ६ ॥
तेषां ज्यातलनिर्घोषो रथनेमिस्वनश्च ह ।
मेघानामिव घर्मान्ते बभूव तुमलो निशि ॥ ७ ॥ उस रात्रिके समय उनकी प्रत्यंचाकी टंकार तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटका शब्द वर्षाकालके मेघोंकी गर्जनाके समान भयंकर जान पड़ता था ॥ ७ ॥ ज्यानेमिघोषस्तनयित्नुमान् वै धनुस्तडिन्मण्डलकेतुशृङ्गः । शरौघवषाकुलवृष्टिमांश्च संग्राममेघः स बभूव राजन् ॥ ८ ॥ राजन्! वह संग्राम वर्षाकालीन मेघके समान प्रतीत होता था। प्रत्यंचाकी टंकार और पहियोंकी घर्घराहटका शब्द ही उस मेघकी गर्जनाके समान था। धनुष ही विद्युन्मण्डलके समान प्रकाशित होता था और ध्वजाका अग्रभाग ही उस मेघका उच्चतम शिखर था तथा बाण-समूहोंकी वृष्टि ही उसके द्वारा की जानेवाली वर्षा थी ॥ ८ ॥ तदद्भुतं शैल इवाप्रकम्पो वर्षं महाशैलसमानसारः । विध्वंसयामास रणे नरेन्द्र वैकर्तनः शत्रुगणावमर्दी ॥ ९ ॥ नरेन्द्र! महान् पर्वतके समान शक्तिशाली एवं अविचल रहनेवाले शत्रुदलसंहारक सूर्यपुत्र कर्णने रणभूमिमें उस अद्भुत बाणवर्षाको नष्ट कर दिया ॥ ९ ॥ ततोऽतुलैर्वज्रनिपातकल्पैः शितैः शरैः काञ्चनचित्रपुङ्खैः । शत्रून् व्यपोहत् समरे महात्मा वैकर्तनः पुत्रहिते रतस्ते ॥ १० ॥ तत्पश्चात् आपके पुत्रके हितमें तत्पर रहनेवाले महामनस्वी वैकर्तन कर्णने समरांगणमें सोनेके विचित्र पंखोंसे युक्त एवं वज्रपातके तुल्य भयंकर, तुलनारहित तीखे बाणोंद्वारा शत्रुओंका संहार आरम्भ किया ॥ १० ॥ संछिन्नभिन्नध्वजिनश्च केचित् केचिच्छरैर्दितभिन्नदेहाः । केचिद् विसूता विहयाश्च केचिद् वैकर्तनेनाशु कृता बभूवुः ॥ ११ ॥ वैकर्तन कर्णने वहाँ शीघ्र ही किन्हींकी ध्वजाके टुकड़े-टुकड़े कर दिये, किन्हींके शरीरोंको बाणोंसे पीड़ित करके विदीर्ण कर डाला, किन्हींके सारथि नष्ट कर दिये और किन्हींके घोड़े मार डाले ॥ ११ ॥ अविन्दमानास्त्वथ शर्म संख्ये यौधिष्ठिरं ते बलमभ्यपद्यन् ।
तान् प्रेक्ष्य भग्नान् विमुखीकृतांश्च घटोत्कचो रोषमतीव चक्रे ॥ १२ ॥ योद्धालोग युद्धमें किसी तरह चैन न पाकर युधिष्ठिरकी सेनामें घुसने लगे। उन्हें तितर-बितर और युद्धसे विमुख हुआ देख घटोत्कचको बड़ा रोष हुआ ॥ १२ ॥
आस्थाय तं काञ्चनरत्नचित्रं रथोत्तमं सिंहवत् संननाद । वैकर्तनं कर्णमुपेत्य चापि विव्याध वज्रप्रतिमैः पृषत्कैः ॥ १३ ॥ वह सुवर्ण एवं रत्नोंसे जटित होनेके कारण विचित्र शोभायुक्त उत्तम रथपर आरूढ़ हो सिंहके समान गर्जना करने लगा और वैकर्तन कर्णके पास जाकर उसे वज्रतुल्य बाणोंद्वारा बींधने लगा ॥ १३ ॥
तौ कर्णिनाराचशिलीमुखैश्च नालीकदण्डासनवत्सदनैः । वराहकर्णैः सविपाठशृङ्गैः क्षुरप्रवर्षैश्च विनेदतुः खम् ॥ १४ ॥ वे दोनों कर्णी, नाराच, शिलीमुख, नालीक, दण्ड, असन, वत्सदन्त, वाराहकर्ण, विपाठ, सींग तथा क्षुरप्रोंकी वर्षा करते हुए अपनी गर्जनासे आकाशको गुँजाने लगे ॥ १४ ॥
तद् बाणधारावृतमन्तरिक्षं तिर्यग्गताभिः समरे रराज । सुवर्णपुङ्खज्वलितप्रभाभि- र्विचित्रपुष्पाभिरिव स्रजाभिः ॥ १५ ॥ समरांगणमें बाणधाराओंसे भरा हुआ आकाश उन बाणोंके सुवर्णमय पंखोंकी तिरछी दिशामें फैलनेवाली देदीप्यमान प्रभाओंसे ऐसी शोभा पा रहा था, मानो वह विचित्र पुष्पोंवाली मनोहर मालाओंसे अलंकृत हो ॥ १५ ॥
समाहितावप्रतिमप्रभावा- वन्योन्यमाजघ्नतुरुत्तमास्त्रैः । तयोर्हि वीरोत्तमयोर्न कश्चिद् ददर्श तस्मिन् समरे विशेषम् ॥ १६ ॥ दोनोंके ही चित्त एकाग्र थे; दोनों ही अनुपम प्रभावशाली थे और उत्तम अस्त्रोंद्वारा एक-दूसरेको चोट पहुँचा रहे थे। उन दोनों वीरशिरोमणियोंमेंसे कोई भी युद्धमें अपनी विशेषता न दिखा सका ॥ १६ ॥
अतीव तच्चित्रमतुल्यरूपं
बभूव युद्धं रविभीमसून्योः ।
समाकुलं शस्त्रनिपातघोरं
दिवीव राह्वंशुमतोः प्रमत्तम् ॥ १७ ॥
सूर्यपुत्र कर्ण और भीमकुमार घटोत्कचका वह अत्यन्त विचित्र एवं घमासान युद्ध आकाशमें राहु और सूर्यके उन्मत्त संग्राम-सा प्रतीत होता था। उसकी कहीं तुलना नहीं थी। शस्त्रोंके प्रहारसे वह बड़ा भयंकर जान पड़ता था ॥ १७ ॥
संजय उवाच
घटोत्कचं यदा कर्णो न विशेषयते नृप ।
ततः प्रादुश्चकारोग्रमस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥ १८ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! जब अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ कर्ण घटोत्कचसे अपनी विशेषता न दिखा सका, तब उसने एक भयंकर अस्त्र प्रकट किया ॥ १८ ॥
तेनास्त्रेणावधीत् तस्य रथं सहयसारथिम् ।
विरथश्चापि हैडिम्बिः क्षिप्रमन्तरधीयत ॥ १९ ॥
उस अस्त्रके द्वारा उसने घटोत्कचके रथको घोड़े और सारथिसहित नष्ट कर दिया। रथहीन होनेपर घटोत्कच शीघ्र ही वहाँसे अदृश्य हो गया ॥ १९ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्नन्तर्हिते तूर्णं कूटयोधिनि राक्षसे ।
मामकैः प्रतिपन्नं यत् तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ २० ॥
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! बताओ, माया-युद्ध करनेवाले उस राक्षसके तत्काल अदृश्य हो जानेपर मेरे पुत्रोंने क्या सोचा और क्या किया? ॥ २० ॥
संजय उवाच
अन्तर्हितं राक्षसेन्द्रं विदित्वा
सम्प्राक्रोशन् कुरवः सर्व एव ।
कथं नायं राक्षसः कूटयोधी
हन्यात् कर्णं समरेऽदृश्यमानः ॥ २१ ॥
संजयने कहा—महाराज! राक्षसराज घटोत्कचको अदृश्य हुआ जानकर समस्त कौरवयोद्धा चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे ‘मायाद्वारा युद्ध करनेवाला यह निशाचर जब रणभूमिमें स्वयं दिखायी ही नहीं देता है, तब कर्णको कैसे नहीं मार डालेगा?' ॥ २१ ॥
ततः कर्णो लघुचित्रास्त्रयोधी
सर्वा दिशः प्रावृणोद् बाणजालैः ।
न वै किञ्चित् प्रापतत् तत्र भूतं
तमोभूते सायकैरन्तरिक्षे ॥ २२ ॥ तब शीघ्रतापूर्वक विचित्र रीतिसे अस्त्रयुद्ध करनेवाले कर्णने अपने बाणोंके समूहसे सम्पूर्ण दिशाओंको ढक दिया। उस समय बाणोंसे आकाशमें अँधेरा छा गया था तो भी वहाँ कोई प्राणी ऊपरसे मरकर गिरा नहीं ॥ २२ ॥ नैवाददानो न च संदधानो न चेषुधीः स्पृश्यमानः कराग्रैः । अदृश्यद् वै लाघवात् सूतपुत्रः सर्वं बाणैश्छादयानोऽन्तरिक्षम् ॥ २३ ॥ सूतपुत्र कर्ण जब शीघ्रतापूर्वक बाणोंद्वारा समूचे आकाशको आच्छादित कर रहा था, उस समय यह नहीं दिखायी देता था कि वह कब अपने हाथकी अंगुलियोंसे तरकसको छूता है, कब बाण निकालता है और कब उसे धनुषपर रखता है ॥ २३ ॥ ततो मायां दारुणामन्तरिक्षे घोरां भीमां विहितां राक्षसेन । अपश्याम लोहिताभ्रप्रकाशां देदीप्यन्तीमग्निशिखामिवोग्राम् ॥ २४ ॥ तदनन्तर हमने अन्तरिक्षमें उस राक्षसद्वारा रची गयी घोर, दारुण एवं भयंकर माया देखी। पहले तो वह लाल रंगके बादलोंके रूपमें प्रकाशित हुई, फिर आगकी भयंकर लपटोंके समान प्रज्वलित हो उठी ॥ २४ ॥ ततस्तस्यां विद्युतः प्रादुरास- न्नुल्काश्चापि ज्वलिताः कौरवेन्द्र । घोषश्चास्याः प्रादुरासीत् सुघोरः सहस्रशो नदतां दुन्दुभीनाम् ॥ २५ ॥ कौरवराज! तत्पश्चात् उससे बिजलियाँ प्रकट हुईं और जलती हुई उल्काएँ गिरने लगीं। साथ ही हजारों दुन्दुभियोंके बजनेके समान बड़ी भयानक आवाज होने लगी ॥ २५ ॥ ततः शराः प्रापतन् रुक्मपुङ्खाः शक्त्यृष्टिप्रासमुसलान्यायुधानि । परश्वधास्तैलधौताश्च खड्गाः प्रदीप्ताग्रास्तोমরাः पट्टिशाश्च ॥ २६ ॥ मयूखिनः परिघा लोहबद्धा गदाश्चित्राः शितधाराश्च शूलाः । गुर्व्यो गदा हेमपट्टावनद्धाः शतघ्न्यश्च प्रादुरासन् समन्तात् ॥ २७ ॥
फिर उससे सोनेके पंखवाले बाण गिरने लगे। शक्ति, ऋष्टि, प्रास, मुसल आदि आयुध, फरसे, तेलमें साफ किये गये खड्ग, चमचमाती हुई धारवाले तोमर, पट्टिश, तेजस्वी परिघ, लोहेसे बँधी हुई विचित्र गदा, तीखी धारवाले शूल, सोनेके पत्रसे मढ़ी गयी भारी गदाएँ और शतघ्नियां चारों ओर प्रकट होने लगीं ।। २६-२७ ।।
महाशिलाश्चापतंस्तत्र तत्र सहस्रशः साशनयश्च वज्राः । चक्राणि चानेकशतक्षुराणि प्रादुर्बभूवुर्ज्वलनप्रभाणि ।। २८ ।।
जहाँ-तहाँ हजारों बड़ी-बड़ी शिलाएँ गिरने लगीं, बिजलियोंसहित वज्र पड़ने लगे और अग्निके समान दीप्तिमान् कितने ही चक्रों तथा सैकड़ों छुरोंका प्रादुर्भाव होने लगा ।। २८ ।।
तां शक्तिपाषाणपरश्वधानां प्रासासिवज्राशनिमुद्गराणाम् । वृष्टिं विशालां ज्वलितां पतन्तीं कर्णः शरौघैर्न शशाक हन्तुम् ।। २९ ।।
शक्ति, प्रस्तर, फरसे, प्रास, खड्ग, वज्र, बिजली और मुद्गरोंकी गिरती हुई उस ज्वालापूर्ण विशाल वर्षाको कर्ण अपने बाणसमूहोंद्वारा नष्ट न कर सका ।।
शराहतानां पततां हयानां वज्राहतानां च तथा गजानाम् । शिलाहतानां च महारथानां महान् निनादः पततां बभूव ।। ३० ।।
बाणोंसे घायल होकर गिरते हुए घोड़ों, वज्रसे आहत होकर धराशायी होते हुए हाथियों तथा शिलाओंकी मार खाकर गिरते हुए महारथियोंका महान् आर्तनाद वहाँ सुनायी देता था ।। ३० ।।
सुभीमनानाविधशस्त्रपातै- र्घटोत्कचेनाभिहतं समन्तात् । दौर्योधनं वै बलमार्तरूप- मावर्तमानं ददृशे भ्रमत् तत् ।। ३१ ।।
घटोत्कचके द्वारा चलाये हुए अत्यन्त भयंकर एवं नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंके प्रहारसे हताहत हुई दुर्योधनकी सेना आर्त होकर चारों ओर घूमती और चक्कर काटती दिखायी देने लगी ।। ३१ ।।
हाहाकृतं सम्परिवर्तमानं संलीयमानं च विषण्णरूपम् ।
ते त्वार्यभावात् पुरुषप्रवीराः पराङ्मुखा नो बभूवुस्तदानीम् ॥ ३२ ॥ साधारण सैनिक विषादकी मूर्ति बनकर हाहाकार करते हुए सब ओर भाग-भागकर छिपने लगे; परंतु जो पुरुषोंमें श्रेष्ठ वीर थे, वे आर्यपुरुषोंके धर्मपर स्थित रहनेके कारण उस समय भी युद्धसे विमुख नहीं हुए ॥ ३२ ॥
तां राक्षसीं भीमरूपां सुघोरां वृष्टिं महाशस्त्रमयीं पतन्तीम् । दृष्ट्वा बलौघांश्च निपात्यमानान् महद् भयं तव पुत्रान् विवेश ॥ ३३ ॥ राक्षसद्वारा की हुई बड़े-बड़े अस्त्र-शस्त्रोंकी वह अत्यन्त घोर एवं भयानक वर्षा तथा अपने सैन्य-समूहोंका विनाश देखकर आपके पुत्रोंके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ॥ ३३ ॥
शिवाश्च वैश्वानरदीप्तजिह्वाः सुभीमनादाः शतशो नदन्तीः । रक्षोगणान् नर्दतश्चापि वीक्ष्य नरेन्द्र योधा व्यथिता बभूवुः ॥ ३४ ॥ नरेन्द्र! अग्निके समान जलती हुई जीभ और भयंकर शब्दवाली सैकड़ों गीदड़ियोंको चीत्कार करते तथा राक्षससमूहोंको गर्जते देखकर आपके सैनिक व्यथित हो उठे ॥ ३४ ॥
ते दीप्तजिह्वानलतीक्ष्णदंष्ट्रा विभीषणाः शैलनिकाशकायाः । नभोगताः शक्तिविषक्तहस्ता मेघा व्यमुञ्चन्निव वृष्टिमुग्राम् ॥ ३५ ॥ पर्वतके समान विशाल शरीरवाले और प्रज्वलित जिह्वासे आग उगलनेवाले तीखी दाढ़ोंसे युक्त भयानक राक्षस हाथोंमें शक्ति लिये आकाशमें पहुँचकर मेघोंके समान कौरवदलपर शस्त्रोंकी उग्र वर्षा करने लगे ॥ ३५ ॥
तैराहतास्ते शरशक्तिशूलै- र्गदाभिरुग्रैः परिघैश्च दीप्तैः । वज्रैः पिनाकैरशनिप्रहारैः शतघ्निचक्रैर्मथिताश्च पेतुः ॥ ३६ ॥ उन निशाचरोंके बरसाये हुए बाण, शक्ति, शूल, गदा, उग्र प्रज्वलित परिघ, वज्र, पिनाक, बिजली, शतघ्नी और चक्र आदि अस्त्र-शस्त्रोंके प्रहारोंसे रौंदे गये कौरव-योद्धा मर-मरकर पृथ्वीपर गिरने लगे ॥ ३६ ॥
शूला भुशुण्ड्योऽश्मगुडाः शतघ्न्यः
स्थूणाश्च कार्ष्णायसपट्टनद्धाः । तेऽवाकिरंस्तव पुत्रस्य सैन्यं ततो रौद्रं कश्मलं प्रादुरासीत् ॥ ३७ ॥ राजन्! वे राक्षस आपके पुत्रकी सेनापर लगातार शूल, भुशुण्डी, पत्थरोंके गोले, शतघ्नी और लोहेके पत्त्रोंसे मढ़े गये स्थूणाकार* शस्त्र बरसाने लगे। इससे आपके सैनिकोंपर भयंकर मोह छा गया ॥ ३७ ॥ विकीर्णान्त्रा विहतैरुत्तमाङ्गैः सम्भग्नाङ्गाः शिश्यिरे तत्र शूराः । छिन्ना हयाः कुञ्जराश्चापि भग्नाः संचूर्णिताश्चैव रथाः शिलाभिः ॥ ३८ ॥ उस समय पत्थरोंकी मारसे आपके शूरवीरोंके मस्तक कुचल गये थे, अंग-भंग हो गये थे, उनकी आँतें बाहर निकलकर बिखर गयी थीं और इस अवस्थामें वे वहाँ पृथ्वीपर पड़े हुए थे। घोड़ोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये थे, हाथियोंके सारे अंग कुचल गये थे और रथ चूर-चूर हो गये ॥ ३८ ॥ एवं महच्छस्त्रवर्षं सृजन्त- स्ते यातुधाना भुवि घोररूपाः । मायासृष्टास्तत्र घटोत्कचेन नामुञ्चन् वै याचमानं न भीतम् ॥ ३९ ॥ इस प्रकार बड़ी भारी शस्त्रवर्षा करते हुए वे निशाचर इस भूतलपर भयंकर रूप धारण करके प्रकट हुए थे। घटोत्कचकी मायासे उनकी सृष्टि हुई थी। वे डरे हुए तथा प्राणोंकी भिक्षा माँगते हुएको भी नहीं छोड़ते थे ॥ ३९ ॥ तस्मिन् घोरे कुरुवीरावमर्दे कालोत्सृष्टे क्षत्रियाणामभावे । ते वै भग्नाः सहसा व्यद्रवन्त प्राक्रोशन्तः कौरवाः सर्व एव ॥ ४० ॥ कौरववीरोंका विनाश करनेवाला वह घोर संग्राम मानो क्षत्रियोंका अन्त करनेके लिये साक्षात् कालद्वारा उपस्थित किया गया था। उसमें विद्यमान सभी कौरवयोध्दा हतोत्साह हो निम्नांकित रूपसे चीखते-चिल्लाते हुए सहसा भाग चले ॥ ४० ॥ पलायध्वं कुरवो नैतदस्ति सेन्द्रा देवा घ्नन्ति नः पाण्डवार्थे । तथा तेषां मज्जतां भारतानां तस्मिन् द्वीपः सूतपुत्रो बभूव ॥ ४१ ॥
'कौरवो! भागो, भागो, अब किसी तरह यह सेना बच नहीं सकती। पाण्डवोंके लिये इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता हमें आकर मार रहे हैं।' इस प्रकार उस समर-सागरमें डूबते हुए कौरव-सैनिकोंके लिये सूतपुत्र कर्ण द्वीपके समान आश्रयदाता बन गया ॥ ४१ ॥
तस्मिन् संक्रन्दे तुमुले वर्तमाने सैन्ये भग्ने लीयमाने कुरूणाम् । अनीकानां प्रविभागेऽप्रकाशे नाज्ञायन्त कुरवो नेतरे च ॥ ४२ ॥
उस घमासान युद्धके आरम्भ होनेपर जब कौरव-सेना भागकर छिप गयी और सैनिकोंके विभाग लुप्त हो गये, उस समय कौरव अथवा पाण्डवयोध्दा पहचाने नहीं जाते थे ॥ ४२ ॥
निर्मर्यादे विद्रवे घोररूपे सर्वा दिशः प्रेक्षमाणाः स्म शून्याः । तां शस्त्रवृष्टिमुरसा गाहमानं कर्णं स्मैकं तत्र राजन्नपश्यन् ॥ ४३ ॥
उस मर्यादारहित और भयंकर युद्धमें जब भगदड़ पड़ गयी, उस समय भागे हुए सैनिक सारी दिशाओंको सूनी देखते थे। राजन्! वहाँ लोगोंको एकमात्र कर्ण ही उस शस्त्रवर्षाको छातीपर झेलता हुआ दिखायी दिया ॥
ततो बाणैरावृणोदन्तरिक्षं दिव्यां मायां योधयन् राक्षसस्य । ह्रीमान् कुर्वन् दुष्करं चार्यकर्म नैवामुह्यत् संयुगे सूतपुत्रः ॥ ४४ ॥
तदनन्तर राक्षसकी दिव्य मायाके साथ युद्ध करते हुए लज्जाशील सूतपुत्र कर्णने आकाशको अपने बाणोंसे ढक दिया और युद्धमें वह श्रेष्ठ वीरोचित दुष्कर कर्म करता हुआ भी मोहके वशीभूत नहीं हुआ ॥ ४४ ॥
ततो भीताः समुदैक्षन्त कर्णं राजन् सर्वे सैन्धवा बाह्लिकाश्च । असंमोहं पूजयन्तोऽस्य संख्ये सम्पश्यन्तो विजयं राक्षसस्य ॥ ४५ ॥
राजन्! तब सिन्धु और बाह्लीकदेशके योद्धा युद्धस्थलमें राक्षसकी विजय देखकर भी कर्णके मोहित न होनेकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उसकी ओर भयभीत होकर देखने लगे ॥ ४५ ॥
तेनोत्सृष्टा चक्रयुक्ता शतघ्नी समं सर्वांश्चतुरोऽश्वाञ्जघान ।
ते जानुभिर्जगतीमन्वपद्यन् गतासवो निर्दशनाक्षिजिह्वाः ॥ ४६ ॥ इसी समय घटोत्कचने एक शतघ्नी छोड़ी, जिसमें पहिये लगे हुए थे। उस शतघ्नीने कर्णके चारों घोड़ोंको एक साथ ही मार डाला। उन घोड़ोंने प्राणशून्य होकर धरतीपर घुटने टेक दिये। उनके दाँत, नेत्र और जीभें बाहर निकल आयी थीं ॥ ४६ ॥
ततो हताश्वादवरुह्य याना- दन्तर्मनाः कुरुषु प्राद्रवत्सु । दिव्ये चास्त्रे मायया वध्यमाने नैवामुह्यच्चिन्तयन् प्राप्तकालम् ॥ ४७ ॥ तब कर्ण उस अश्वहीन रथसे उतरकर मनको एकाग्र करके कुछ सोचने लगा। उस समय सारे कौरव-सैनिक भाग रहे थे। उसके दिव्यास्त्र भी घटोत्कचकी मायासे नष्ट होते जा रहे थे, तो भी वह समयोचित कर्तव्यका चिन्तन करता हुआ मोहमें नहीं पड़ा ॥ ४७ ॥
ततोऽब्रुवन् कुरवः सर्व एव कर्णं दृष्ट्वा घोररूपां च मायाम् । शक्त्या रक्षो जहि कर्णाद्य तूर्णं नश्यन्त्येते कुरवो धार्तराष्ट्राः ॥ ४८ ॥ तत्पश्चात् राक्षसकी उस भयंकर मायाको देखकर सभी कौरव कर्णसे इस प्रकार बोले—‘कर्ण! तुम आज (इन्द्रकी दी हुई) शक्तिसे तुरंत इस राक्षसको मार डालो, नहीं तो ये धृतराष्ट्रके पुत्र और कौरव नष्ट होते जा रहे हैं ॥ ४८ ॥
करिष्यतः किञ्च नो भीमपार्थौ तपन्तमेनं जहि पापं निशीथे । यो नः संग्रामाद् घोररूपाद् विमुच्येत् स नः पार्थान् सबलान् योधयेत ॥ ४९ ॥ ‘भीमसेन और अर्जुन हमारा क्या कर लेंगे? आधी रातके समय संताप देनेवाले इस पापी राक्षसको मार डालो। हममेंसे जो भी इस भयानक संग्रामसे छुटकारा पायेगा वही सेनासहित पाण्डवोंके साथ युद्ध करेगा ॥ ४९ ॥
तस्मादेनं राक्षसं घोररूपं शक्त्या जहि त्वं दत्तया वासवेन । मा कौरवाः सर्व एवेन्द्रकल्पा रात्रियुद्धे कर्ण नेशुः सयोधाः ॥ ५० ॥ ‘इसलिये तुम इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे इस घोर रूपधारी राक्षसको मार डालो। कर्ण! कहीं ऐसा न हो कि ये इन्द्रके समान पराक्रमी समस्त कौरव रात्रियुद्धमें अपने योद्धाओंके साथ नष्ट हो जायें' ॥ ५० ॥
स वध्यमानो रक्षसा वै निशीथे
दृष्ट्वा राजंस्त्रास्यमानं बलं च ।
महच्छ्रुत्वा निनदं कौरवाणां
मतिं दध्रे शक्तिमोक्षाय कर्णः ॥ ५१ ॥
राजन्! निशीथकालमें राक्षसके प्रहारसे घायल होते हुए कर्णने अपनी सेनाको
भयभीत देख कौरवोंका महान् आर्तनाद सुनकर घटोत्कचपर शक्ति छोड़नेका निश्चय कर
लिया ॥ ५१ ॥
स वै क्रुद्धः सिंह इवात्यमर्षी
नामर्षयत् प्रतिघातं रणेऽसौ ।
शक्तिं श्रेष्ठां वैजयन्तीमसह्यां
समाददे तस्य वधं चिकीर्षन् ॥ ५२ ॥
क्रोधमें भरे हुए सिंहके समान अत्यन्त अमर्षशील कर्ण रणभूमिमें घटोत्कचद्वारा अपने
अस्त्रोंका प्रतिघात न सह सका। उसने उस राक्षसका वध करनेकी इच्छासे श्रेष्ठ एवं असह्य
वैजयन्ती नामक शक्तिको हाथमें लिया ॥ ५२ ॥
यासौ राजन्निहिता वर्षपूगान्
वधायाजौ सत्कृता फाल्गुनस्य ।
यां वै प्रादात् सूतपुत्राय शक्रः
शक्तिं श्रेष्ठां कुण्डलाभ्यां निमाय ॥ ५३ ॥
तां वै शक्तिं लेलिहानां प्रदीप्तां
पाशैर्युक्तामन्तकस्येव जिह्वाम् ।
मृत्योः स्वसारं ज्वलितामिवोल्कां
वैकर्तनः प्राहिणोद् राक्षसाय ॥ ५४ ॥
राजन्! जिसे उसने युद्धमें अर्जुनका वध करनेके लिये कितने ही वर्षोंसे सत्कारपूर्वक
रख छोड़ा था, जिस श्रेष्ठ शक्तिको इन्द्रने सूतपुत्र कर्णके हाथमें उसके दोनों कुण्डलोंके
बदलेमें दिया था, जो सबको चाट जानेके लिये उद्यत हुई यमराजके जिह्वाके समान जान
पड़ती थी तथा जो मृत्युकी सगी बहिन एवं जलती हुई उल्काके समान प्रतीत होती थी,
उसी पाशोंसे युक्त, प्रज्वलित दिव्य शक्तिको सूर्यपुत्र कर्णने राक्षस घटोत्कचपर चला
दिया ॥ ५३-५४ ॥
तामुत्तमां परकायावहन्त्रीं दृष्ट्वा शक्तिं बाहुसंस्थां ज्वलन्तीम् । भीतं रक्षो विप्रदुद्राव राजन् कृत्वाऽऽत्मानं विन्ध्यतुल्यप्रमाणम् ।। ५५ ।। राजन्! दूसरेके शरीरको विदीर्ण कर डालनेवाली उस उत्तम एवं प्रज्वलित शक्तिको कर्णके हाथमें देखकर भयभीत हुआ राक्षस घटोत्कच अपने शरीरको विन्ध्यपर्वतके समान विशाल बनाकर भागा ।। ५५ ।। दृष्ट्वा शक्तिं कर्णबाह्वन्तरस्थां नेदुर्भूतान्यन्तरिक्षे नरेन्द्र । ववुर्वातास्तुमुलाश्चापि राजन् सनिर्घाता चाशनिर्गां जगाम ।। ५६ ।। नरेन्द्र! कर्णके हाथमें उस शक्तिको स्थित देख आकाशके प्राणी भयसे कोलाहल करने लगे। राजन्! उस समय भयंकर आँधी चलने लगी और घोर गड़गड़ाहटके साथ पृथ्वीपर वज्रपात हुआ ।। ५६ ।। सा तां मायां भस्म कृत्वा ज्वलन्ती भित्त्वा गाढं हृदयं राक्षसस्य ।