भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1338

बभूव युद्धं रविभीमसून्योः ।
समाकुलं शस्त्रनिपातघोरं
दिवीव राह्वंशुमतोः प्रमत्तम् ॥ १७ ॥
सूर्यपुत्र कर्ण और भीमकुमार घटोत्कचका वह अत्यन्त विचित्र एवं घमासान युद्ध आकाशमें राहु और सूर्यके उन्मत्त संग्राम-सा प्रतीत होता था। उसकी कहीं तुलना नहीं थी। शस्त्रोंके प्रहारसे वह बड़ा भयंकर जान पड़ता था ॥ १७ ॥

संजय उवाच
घटोत्कचं यदा कर्णो न विशेषयते नृप ।
ततः प्रादुश्चकारोग्रमस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥ १८ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! जब अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ कर्ण घटोत्कचसे अपनी विशेषता न दिखा सका, तब उसने एक भयंकर अस्त्र प्रकट किया ॥ १८ ॥
तेनास्त्रेणावधीत् तस्य रथं सहयसारथिम् ।
विरथश्चापि हैडिम्बिः क्षिप्रमन्तरधीयत ॥ १९ ॥
उस अस्त्रके द्वारा उसने घटोत्कचके रथको घोड़े और सारथिसहित नष्ट कर दिया। रथहीन होनेपर घटोत्कच शीघ्र ही वहाँसे अदृश्य हो गया ॥ १९ ॥

धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्नन्तर्हिते तूर्णं कूटयोधिनि राक्षसे ।
मामकैः प्रतिपन्नं यत् तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ २० ॥
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! बताओ, माया-युद्ध करनेवाले उस राक्षसके तत्काल अदृश्य हो जानेपर मेरे पुत्रोंने क्या सोचा और क्या किया? ॥ २० ॥

संजय उवाच
अन्तर्हितं राक्षसेन्द्रं विदित्वा
सम्प्राक्रोशन् कुरवः सर्व एव ।
कथं नायं राक्षसः कूटयोधी
हन्यात् कर्णं समरेऽदृश्यमानः ॥ २१ ॥
संजयने कहा—महाराज! राक्षसराज घटोत्कचको अदृश्य हुआ जानकर समस्त कौरवयोद्धा चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे ‘मायाद्वारा युद्ध करनेवाला यह निशाचर जब रणभूमिमें स्वयं दिखायी ही नहीं देता है, तब कर्णको कैसे नहीं मार डालेगा?' ॥ २१ ॥
ततः कर्णो लघुचित्रास्त्रयोधी
सर्वा दिशः प्रावृणोद् बाणजालैः ।
न वै किञ्चित् प्रापतत् तत्र भूतं