महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1337, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतान् प्रेक्ष्य भग्नान् विमुखीकृतांश्च घटोत्कचो रोषमतीव चक्रे ॥ १२ ॥ योद्धालोग युद्धमें किसी तरह चैन न पाकर युधिष्ठिरकी सेनामें घुसने लगे। उन्हें तितर-बितर और युद्धसे विमुख हुआ देख घटोत्कचको बड़ा रोष हुआ ॥ १२ ॥
आस्थाय तं काञ्चनरत्नचित्रं रथोत्तमं सिंहवत् संननाद । वैकर्तनं कर्णमुपेत्य चापि विव्याध वज्रप्रतिमैः पृषत्कैः ॥ १३ ॥ वह सुवर्ण एवं रत्नोंसे जटित होनेके कारण विचित्र शोभायुक्त उत्तम रथपर आरूढ़ हो सिंहके समान गर्जना करने लगा और वैकर्तन कर्णके पास जाकर उसे वज्रतुल्य बाणोंद्वारा बींधने लगा ॥ १३ ॥
तौ कर्णिनाराचशिलीमुखैश्च नालीकदण्डासनवत्सदनैः । वराहकर्णैः सविपाठशृङ्गैः क्षुरप्रवर्षैश्च विनेदतुः खम् ॥ १४ ॥ वे दोनों कर्णी, नाराच, शिलीमुख, नालीक, दण्ड, असन, वत्सदन्त, वाराहकर्ण, विपाठ, सींग तथा क्षुरप्रोंकी वर्षा करते हुए अपनी गर्जनासे आकाशको गुँजाने लगे ॥ १४ ॥
तद् बाणधारावृतमन्तरिक्षं तिर्यग्गताभिः समरे रराज । सुवर्णपुङ्खज्वलितप्रभाभि- र्विचित्रपुष्पाभिरिव स्रजाभिः ॥ १५ ॥ समरांगणमें बाणधाराओंसे भरा हुआ आकाश उन बाणोंके सुवर्णमय पंखोंकी तिरछी दिशामें फैलनेवाली देदीप्यमान प्रभाओंसे ऐसी शोभा पा रहा था, मानो वह विचित्र पुष्पोंवाली मनोहर मालाओंसे अलंकृत हो ॥ १५ ॥
समाहितावप्रतिमप्रभावा- वन्योन्यमाजघ्नतुरुत्तमास्त्रैः । तयोर्हि वीरोत्तमयोर्न कश्चिद् ददर्श तस्मिन् समरे विशेषम् ॥ १६ ॥ दोनोंके ही चित्त एकाग्र थे; दोनों ही अनुपम प्रभावशाली थे और उत्तम अस्त्रोंद्वारा एक-दूसरेको चोट पहुँचा रहे थे। उन दोनों वीरशिरोमणियोंमेंसे कोई भी युद्धमें अपनी विशेषता न दिखा सका ॥ १६ ॥
अतीव तच्चित्रमतुल्यरूपं