महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1331, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंचूर्णयामास वेगेन विसृष्टा भीमकर्मणा ॥ १५ ॥ भयंकर कर्म करनेवाले उस राक्षसद्वारा वेगपूर्वक फेंकी गयी उस भारी आवाज करनेवाली गदाने अलायुधके रथ, सारथि और घोड़ोंको चूर-चूर कर दिया ॥ १५ ॥ स भग्नहयचक्राक्षाद् विशीर्णध्वजकूबरात् । उत्पपात रथात् तूर्णं मायामास्थाय राक्षसीम् ॥ १६ ॥ जिसके घोड़े, पहिये और धुरे नष्ट हो गये थे, ध्वज और कूबर बिखर गये थे, उस रथसे अलायुध राक्षसी मायाका आश्रय लेकर तुरंत ही ऊपरको उड़ गया ॥ १६ ॥ स समास्थाय मायां तु ववर्ष रुधिरं बहु । विद्युद्विभ्राजितं चासीत् तुमलाभ्राकुलं नभः ॥ १७ ॥ उसने मायाका आश्रय लेकर बहुत रक्तकी वर्षा की। उस समय आकाशमें भयंकर मेघोंकी घटा घिर आयी थी और बिजली चमक रही थी ॥ १७ ॥ ततो वज्रनिपाताश्च साशनिस्तनयित्नवः । महांश्चटचटाशब्दस्तत्रासीच्च महाहवे ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् उस महासमरमें वज्रपात, मेघगर्जनाके साथ विद्युत्की गड़गड़ाहट तथा महान् चट-चट शब्द होने लगे ॥ १८ ॥ तां प्रेक्ष्य महतीं मायां राक्षसो राक्षसस्य च । ऊर्ध्वमुत्पत्य हैडिम्बिस्तां मायां माययावधीत् ॥ १९ ॥ राक्षसकी उस विशाल मायाको देखकर राक्षसजातीय हिडिम्बाकुमार घटोत्कचने ऊपर उड़कर अपनी मायासे उस मायाको नष्ट कर दिया ॥ १९ ॥ सोऽभिवीक्ष्य हतां मायां मायावी माययैव हि । अश्मवर्षं सुतुमुलं विससर्ज घटोत्कचे ॥ २० ॥ अपनी मायाको मायासे ही नष्ट हुई देखकर मायावी अलायुध घटोत्कचपर पत्थरोंकी भयंकर वर्षा करने लगा ॥ २० ॥ अश्मवर्षं स तं घोरं शरवर्षेण वीर्यवान् । दिक्षु विध्वंसयामास तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २१ ॥ किंतु पराक्रमी घटोत्कचने बाणोंकी वृष्टि करके उस भयंकर प्रस्तरवर्षाका उन-उन दिशाओंमें ही विध्वंस कर दिया। वह अद्भुत-सा कार्य हुआ ॥ २१ ॥ ततो नानाप्रहरणैरन्योन्यमभिवर्षताम् । आयसैः परिघैः शूलैर्गदामुसलमुद्गरैः ॥ २२ ॥ पिनाकैः करवा लैश्च तोमरप्रासकम्पनैः । नाराचैर्निशितैर्भल्लैः शरैश्चक्रैः परश्वधैः । अयोगुडैर्भिन्दिपालैर्गोशीर्षोलूखलैरपि ॥ २३ ॥ उत्पाटितैर्महाशाखैर्विविधैर्जगतीरुहैः ।