भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1332

शमीपीलुकदम्बैश्च चम्पकैश्चैव भारत ॥ २४ ॥ इङ्गुदैर्बदरीभिश्च कोविदारैश्च पुष्पितैः । पलाशैश्चारिमेदैश्च प्लक्षन्यग्रोधपिप्पलैः ॥ २५ ॥ महद्भिः समरे तस्मिन्नन्योन्यमभिजघ्नतुः । विपुलैः पर्वताग्रैश्च नानाधातुभिराचितैः ॥ २६ ॥ भारत! तत्पश्चात् वे एक-दूसरेपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे। लोहेके परिघ, शूल, गदा, मुसल, मुद्गर, पिनाक, खड्ग, तोमर, प्रास, कम्पन, तीखे नाराच, भल्ल, बाण, चक्र, फरसे, लोहेकी गोली, भिन्दिपाल, गोशीर्ष, उलूखल, बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले उखाड़े हुए नाना प्रकारके वृक्ष—शमी, पीलु, कदम्ब, चम्पा, इंगुद, बेर, विकसित कोविदार, पलाश, अरिमेद, बड़े-बड़े पाकड़, बरगद और पीपल—इन सबके द्वारा उस महासमरमें वे एक-दूसरेपर चोट करने लगे। नाना प्रकारकी धातुओंसे व्याप्त विशाल पर्वतशिखरोंद्वारा भी वे परस्पर आघात करते थे ॥ २२—२६ ॥ तेषां शब्दो महानासीद् वज्राणां भिद्यतामिव । युद्धं समभवद् घोरं भैम्यालायुधयोर्नृप ॥ २७ ॥ हरीन्द्रयोर्यथा राजन् वालिसुग्रीवयोः पुरा । उन पर्वत-शिखरोंके टकरानेसे ऐसा महान् शब्द होता था, मानो वज्र फट पड़े हों। नरेश्वर! घटोत्कच और अलायुधका वह भयंकर युद्ध वैसा ही हो रहा था, जैसे पहले त्रेतायुगमें वानरराज बाली और सुग्रीवका युद्ध सुना गया है ॥ २७ १/२ ॥ तौ युद्धा विविधैर्घोरैरायुधैर्विशिखैस्तथा । प्रगृह्य च शितौ खड्गावन्योन्यमभिपेततुः ॥ २८ ॥ नाना प्रकारके भयंकर आयुधों और बाणोंसे युद्ध करके वे दोनों राक्षस तीखी तलवारें लेकर एक-दूसरेपर टूट पड़े ॥ २८ ॥ तावन्योन्यमभिद्रुत्य केशेषु सुमहाबलौ । भुजाभ्यां पर्यगृह्णीतां महाकायौ महाबलौ ॥ २९ ॥ उन दोनों महाबली और विशालकाय राक्षसोंने परस्पर आक्रमण करके दोनों हाथोंसे दोनोंके केश पकड़ लिये ॥ तौ स्विन्नगात्रौ प्रस्वेदं सुस्रुवाते जनाधिप । रुधिरं च महाकायावतिवृष्टाविवाम्बुदौ ॥ ३० ॥ नरेश्वर! अत्यन्त वर्षा करनेवाले दो मेघोंके समान उन विशालकाय राक्षसोंके शरीर पसीनेसे तर हो रहे थे। वे अपने अंगोंसे पसीनोंके साथ-साथ खून भी बहा रहे थे ॥ अथाभिपत्य वेगेन समुद्भ्राम्य च राक्षसम् । बलेनाक्षिप्य हैडिम्बिश्चकर्तास्य शिरो महत् ॥ ३१ ॥

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