भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1345

स वध्यमानो रक्षसा वै निशीथे

दृष्ट्वा राजंस्त्रास्यमानं बलं च ।

महच्छ्रुत्वा निनदं कौरवाणां

मतिं दध्रे शक्तिमोक्षाय कर्णः ॥ ५१ ॥

राजन्! निशीथकालमें राक्षसके प्रहारसे घायल होते हुए कर्णने अपनी सेनाको

भयभीत देख कौरवोंका महान् आर्तनाद सुनकर घटोत्कचपर शक्ति छोड़नेका निश्चय कर

लिया ॥ ५१ ॥

स वै क्रुद्धः सिंह इवात्यमर्षी

नामर्षयत् प्रतिघातं रणेऽसौ ।

शक्तिं श्रेष्ठां वैजयन्तीमसह्यां

समाददे तस्य वधं चिकीर्षन् ॥ ५२ ॥

क्रोधमें भरे हुए सिंहके समान अत्यन्त अमर्षशील कर्ण रणभूमिमें घटोत्कचद्वारा अपने

अस्त्रोंका प्रतिघात न सह सका। उसने उस राक्षसका वध करनेकी इच्छासे श्रेष्ठ एवं असह्य

वैजयन्ती नामक शक्तिको हाथमें लिया ॥ ५२ ॥

यासौ राजन्निहिता वर्षपूगान्

वधायाजौ सत्कृता फाल्गुनस्य ।

यां वै प्रादात् सूतपुत्राय शक्रः

शक्तिं श्रेष्ठां कुण्डलाभ्यां निमाय ॥ ५३ ॥

तां वै शक्तिं लेलिहानां प्रदीप्तां

पाशैर्युक्तामन्तकस्येव जिह्वाम् ।

मृत्योः स्वसारं ज्वलितामिवोल्कां

वैकर्तनः प्राहिणोद् राक्षसाय ॥ ५४ ॥

राजन्! जिसे उसने युद्धमें अर्जुनका वध करनेके लिये कितने ही वर्षोंसे सत्कारपूर्वक

रख छोड़ा था, जिस श्रेष्ठ शक्तिको इन्द्रने सूतपुत्र कर्णके हाथमें उसके दोनों कुण्डलोंके

बदलेमें दिया था, जो सबको चाट जानेके लिये उद्यत हुई यमराजके जिह्वाके समान जान

पड़ती थी तथा जो मृत्युकी सगी बहिन एवं जलती हुई उल्काके समान प्रतीत होती थी,

उसी पाशोंसे युक्त, प्रज्वलित दिव्य शक्तिको सूर्यपुत्र कर्णने राक्षस घटोत्कचपर चला

दिया ॥ ५३-५४ ॥