महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1344, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंते जानुभिर्जगतीमन्वपद्यन् गतासवो निर्दशनाक्षिजिह्वाः ॥ ४६ ॥ इसी समय घटोत्कचने एक शतघ्नी छोड़ी, जिसमें पहिये लगे हुए थे। उस शतघ्नीने कर्णके चारों घोड़ोंको एक साथ ही मार डाला। उन घोड़ोंने प्राणशून्य होकर धरतीपर घुटने टेक दिये। उनके दाँत, नेत्र और जीभें बाहर निकल आयी थीं ॥ ४६ ॥
ततो हताश्वादवरुह्य याना- दन्तर्मनाः कुरुषु प्राद्रवत्सु । दिव्ये चास्त्रे मायया वध्यमाने नैवामुह्यच्चिन्तयन् प्राप्तकालम् ॥ ४७ ॥ तब कर्ण उस अश्वहीन रथसे उतरकर मनको एकाग्र करके कुछ सोचने लगा। उस समय सारे कौरव-सैनिक भाग रहे थे। उसके दिव्यास्त्र भी घटोत्कचकी मायासे नष्ट होते जा रहे थे, तो भी वह समयोचित कर्तव्यका चिन्तन करता हुआ मोहमें नहीं पड़ा ॥ ४७ ॥
ततोऽब्रुवन् कुरवः सर्व एव कर्णं दृष्ट्वा घोररूपां च मायाम् । शक्त्या रक्षो जहि कर्णाद्य तूर्णं नश्यन्त्येते कुरवो धार्तराष्ट्राः ॥ ४८ ॥ तत्पश्चात् राक्षसकी उस भयंकर मायाको देखकर सभी कौरव कर्णसे इस प्रकार बोले—‘कर्ण! तुम आज (इन्द्रकी दी हुई) शक्तिसे तुरंत इस राक्षसको मार डालो, नहीं तो ये धृतराष्ट्रके पुत्र और कौरव नष्ट होते जा रहे हैं ॥ ४८ ॥
करिष्यतः किञ्च नो भीमपार्थौ तपन्तमेनं जहि पापं निशीथे । यो नः संग्रामाद् घोररूपाद् विमुच्येत् स नः पार्थान् सबलान् योधयेत ॥ ४९ ॥ ‘भीमसेन और अर्जुन हमारा क्या कर लेंगे? आधी रातके समय संताप देनेवाले इस पापी राक्षसको मार डालो। हममेंसे जो भी इस भयानक संग्रामसे छुटकारा पायेगा वही सेनासहित पाण्डवोंके साथ युद्ध करेगा ॥ ४९ ॥
तस्मादेनं राक्षसं घोररूपं शक्त्या जहि त्वं दत्तया वासवेन । मा कौरवाः सर्व एवेन्द्रकल्पा रात्रियुद्धे कर्ण नेशुः सयोधाः ॥ ५० ॥ ‘इसलिये तुम इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे इस घोर रूपधारी राक्षसको मार डालो। कर्ण! कहीं ऐसा न हो कि ये इन्द्रके समान पराक्रमी समस्त कौरव रात्रियुद्धमें अपने योद्धाओंके साथ नष्ट हो जायें' ॥ ५० ॥