महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउस समय शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुभद्रा-कुमारने वैदूर्यमणिकी बनी हुई तीखी धारवाली उसी शक्तिको अपने बाहुबलसे शल्यपर चला दिया ।। ८१ ।।
सा तस्य रथमासाद्य निर्मुक्तभुजगोपमा ।
जघान सूतं शल्यस्य रथाच्चैनमपातयत् ।। ८२ ।।
केंचुलसे छूटकर निकले हुए सर्पके समान प्रतीत होनेवाली उस शक्तिने शल्यके रथपर पहुँचकर उनके सारथिको मार डाला और उसे रथसे नीचे गिरा दिया ।।
ततो विराटद्रुपदौ धृष्टकेतुर्युधिष्ठिरः ।
सात्यकिः केकया भीमो धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ ।। ८३ ।।
यमौ च द्रौपदेयाश्च साधु साध्विति चुक्रुशुः ।
यह देखकर विराट, द्रुपद, धृष्टकेतु, युधिष्ठिर, सात्यकि, केकयराजकुमार, भीमसेन, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, नकुल, सहदेव तथा द्रौपदीके पाँचों पुत्र 'साधु, साधु' (बहुत अच्छा, बहुत अच्छा) कहकर कोलाहल करने लगे ।।
बाणशब्दाश्च विविधाः सिंहनादाश्च पुष्कलाः ।। ८४ ।।
प्रादुरासन् हर्षयन्तः सौभद्रमपलायिनम् ।
उस समय युद्धभूमिमें पीठ न दिखानेवाले सुभद्राकुमार अभिमन्युका हर्ष बढ़ाते हुए नाना प्रकारके बाण-संचालनजनित शब्द और महान् सिंहनाद प्रकट होने लगे ।। ८४ १/२ ।।
तन्नामृष्यन्त पुत्रास्ते शत्रोर्विजयलक्षणम् ।। ८५ ।।
अथैनं सहसा सर्वे समन्तान्निशितैः शरैः ।
अभ्याकिरन् महाराज जलदा इव पर्वतम् ।। ८६ ।।
महाराज! उस समय आपके पुत्र शत्रु की विजयकी सूचना देनेवाले उस सिंहनादको नहीं सह सके। वे सब-के-सब सहसा सब ओरसे अभिमन्युपर पैने बाणोंकी वर्षा करने लगे, मानो मेघ पर्वतपर जलकी धाराएँ बरसा रहे हों ।। ८५-८६ ।।
तेषां च प्रियमन्विच्छन् सूतस्य च पराभवरम् ।
आर्तायनिरमित्रघ्नः क्रुद्धः सौभद्रमभ्ययात् ।। ८७ ।।
अपने सारथिको मारा गया देख कौरवोंका प्रिय करनेकी इच्छावाले शत्रुसूदन शल्यने कुपित होकर सुभद्राकुमारपर पुनः आक्रमण किया ।। ८७ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि अभिमन्युपराक्रमे चतुर्दशोऽध्यायः
।। १४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें अभिमन्युका पराक्रमविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४ ।।