भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 3237 में से

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पञ्चदशोऽध्यायः

शल्यके साथ भीमसेनका युद्ध तथा शल्यकी पराजय

धृतराष्ट्र उवाच

बहूनि सुविचित्राणि द्वन्द्वयुद्धानि संजय ।
त्वयोक्तानि निशम्याहं स्पृहयामि सचक्षुषाम् ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! तुमने बहुत-से अत्यन्त विचित्र द्वन्द्वयुद्धोंका वर्णन किया है, उनकी कथा सुनकर मैं नेत्रवाले लोगोंके सौभाग्यकी स्पृहा करता हूँ ॥ १ ॥
आश्चर्यभूतं लोकेषु कथयिष्यन्ति मानवाः ।
कुरूणां पाण्डवानां च युद्धं देवासुरोपमम् ॥ २ ॥
देवताओं और असुरोंके समान इस कौरव-पाण्डव-युद्धको संसारके मनुष्य अत्यन्त आश्चर्यकी वस्तु बतायेंगे ॥ २ ॥
न हि मे तृप्तिरस्तीह शृण्वतो युद्धमुत्तमम् ।
तस्मादार्तायनेर्युद्धं सौभद्रस्य च शंस मे ॥ ३ ॥
इस समय इस उत्तम युद्ध-वृत्तान्तको सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है; अतः शल्य और सुभद्राकुमारके युद्धका वृत्तान्त मुझसे कहो ॥ ३ ॥

संजय उवाच

सादितं प्रेक्ष्य यन्तारं शल्यः सर्वायसीं गदाम् ।
समुत्क्षिप्य नदन् क्रुद्धः प्रचस्कन्द रथोत्तमात् ॥ ४ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! राजा शल्य अपने सारथिको मारा गया देख कुपित हो उठे और पूर्णतः लोहेकी बनी हुई गदा उठाकर गर्जते हुए अपने उत्तम रथसे कूद पड़े ॥
तं दीप्तमिव कालाग्निं दण्डहस्तमिवान्तकम् ।
जवेनाभ्यपतद् भीमः प्रगृह्य महतीं गदाम् ॥ ५ ॥
उन्हें प्रलयकालकी प्रज्वलित अग्नि तथा दण्डधारी यमराजके समान आते देख भीमसेन विशाल गदा हाथमें लेकर बड़े वेगसे उनकी ओर दौड़े ॥ ५ ॥
सौभद्रोऽप्यशनिप्रख्यां प्रगृह्य महतीं गदाम् ।
एह्येहीत्यब्रवीच्छल्यं यत्नाद् भीमेन वारितः ॥ ६ ॥
उधरसे अभिमन्यु भी वज्रके समान विशाल गदा हाथमें लेकर आ पहुँचा और 'आओ, आओ' कहकर शल्यको ललकारने लगा। उस समय भीमसेनने बड़े प्रयत्नसे उसको रोका ॥ ६ ॥
वारयित्वा तु सौभद्रं भीमसेनः प्रतापवान् ।

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