भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 139

शल्यमासाद्य समरे तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ ७ ॥
सुभद्राकुमार अभिमन्युको रोककर प्रतापी भीमसेन राजा शल्यके पास जा पहुँचे और समरभूमिमें पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हो गये ॥ ७ ॥
तथैव मद्रराजोऽपि भीमं दृष्ट्वा महाबलम् ।
ससाराभिमुखस्तूर्णं शार्दूल इव कुञ्जरम् ॥ ८ ॥
इसी प्रकार मद्रराज शल्य भी महाबली भीमसेनको देखकर तुरंत उन्हींकी ओर बढ़े, मानो सिंह किसी गजराजपर आक्रमण कर रहा हो ॥ ८ ॥
ततस्तूर्यनिनादाश्च शङ्खानां च सहस्रशः ।
सिंहनादाश्च संजज्ञुर्भेरीणां च महास्वनाः ॥ ९ ॥
उस समय सहस्रों रणवाद्यों और शंखोंके शब्द वहाँ गूँज उठे। वीरोंके सिंहनाद प्रकट होने लगे और नगाड़ोंके गम्भीर घोष सर्वत्र व्याप्त हो गये ॥ ९ ॥
पश्यतां शतशो ह्यासीदन्योन्यमभिधावताम् ।
पाण्डवानां कुरूणां च साधु साध्विति निःस्वनः ॥ १० ॥
एक दूसरेकी ओर दौड़ते हुए सैकड़ों दर्शकों, कौरवों और पाण्डवोंके साधुवादका महान् शब्द वहाँ सब ओर गूँजने लगा ॥ १० ॥
न हि मद्राधिपादन्यः सर्वराजसु भारत ।
सोढुमुत्सहते वेगं भीमसेनस्य संयुगे ॥ ११ ॥
भरतनन्दन! समस्त राजाओंमें मद्रराज शल्यके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं था, जो युद्धमें भीमसेनके वेगको सहनेका साहस कर सके ॥ ११ ॥
तथा मद्राधिपस्यापि गदावेगं महात्मनः ।
सोढुमुत्सहते लोके युधि कोऽन्यो वृकोदरात् ॥ १२ ॥
इसी प्रकार संसारमें भीमसेनके सिवा दूसरा कौन ऐसा वीर है, जो युद्धमें महामनस्वी मद्रराज शल्यकी गदाके वेगको सह सकता है ॥ १२ ॥
पट्टैर्जाम्बूनदैर्बद्धा बभूव जनहर्षणी ।
प्रजज्वाल तदाऽऽविद्धा भीमेन महती गदा ॥ १३ ॥
उस समय भीमसेनके द्वारा घुमायी गयी विशाल गदा सुवर्णपत्रसे जटित होनेके कारण अग्निके समान प्रज्वलित हो रही थी। वह वीरजनोंके हृदयमें हर्ष और उत्साहकी वृद्धि करनेवाली थी ॥ १३ ॥
तथैव चरतो मार्गान् मण्डलानि च सर्वशः ।
महाविद्युत्प्रतीकाशा शल्यस्य शुशुभे गदा ॥ १४ ॥
इसी प्रकार गदायुद्धके विभिन्न मार्गों और मण्डलोंसे विचरते हुए महाराज शल्यकी महाविद्युत्के समान प्रकाशमान गदा बड़ी शोभा पा रही थी ॥ १४ ॥
तौ वृषाविव नर्दन्तौ मण्डलानि विचेरतुः ।