महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1378, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनित्यं च पुरुषव्याघ्र धर्ममेवानुचिन्तय । आनृशंस्यं तपो दानं क्षमां सत्यं च पाण्डव ॥ ६६ ॥ सेवेथाः परमप्रीतो यतो धर्मस्ततो जयः । पुरुषसिंह पाण्डुनन्दन! तुम सदा धर्मका ही चिन्तन करो तथा कोमलता (दयाभाव), तपस्या, दान, क्षमा और सत्य आदि सद्गुणोंका ही अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक सेवन करो; क्योंकि जिस पक्षमें धर्म है, उसीकी विजय होती है ॥
इत्युक्त्वा पाण्डवं व्यासस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ६७ ॥ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर महर्षि व्यास वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ६७ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे व्यासवाक्ये त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें व्यासवाक्यविषयक एक सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८३ ॥